Shayari of the day: अल्लामा मुहम्मद इकबाल का नाम शायरी की दुनिया में बेहद अदब से लिया जाता है। 9 नवंबर 1877 को पाकिस्तान के सियालकोट में जन्मे अल्लामा इकबाल शायर-ए-मशरिक और मुस्लिम रिनेसॉस का पुरोधा भी कहा जाता है। इकबाल की शायरी में जीवन के हर रंग बड़ी खूबसूरती से दिखते थे। उन्होंने मानवीय एहसास और समाज की हर जरूरत पर शेर लिखे हैं। उनके कई शेर ऐसे हैं जो आज भी प्रासंगिक हैं और लोग आम बातचीत में भी इस्तेमाल करते हैं। अल्लामा इकबाल का ऐसा ही एक मशहूर कलाम है:
आज की शायरी (Photo: iStock)
"माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूं मैं, तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख"
क्या हैं इस शेर के मायने
अल्लामा इक़बाल का यह शेर मोहब्बत, विनम्रता और इंतजार की गहरी भावना को बेहद खूबसूरती से व्यक्त करता है। शेर के पहले मिसरे में शायर अपनी कमी और खुद की नाकाबिलियत को स्वीकार करता है। यहां वह यह मान रहा है कि शायद वह उस मुकाम पर नहीं है कि उसे अपने महबूब का दीदार (दर्शन) नसीब हो सके। यही विनम्रता प्रेम की असली सच्चाई है, जहां इंसान अपने अहंकार को छोड़कर खुद को छोटा मान लेता है।
शेर का दूसरा मिसरा है- तू मेरा शौक देख मिरा इंतिजार देख। यहां शायर अपनी सच्ची मोहब्बत का प्रमाण देता है। वह कहता है कि भले ही वह दीदार के लायक न हो, लेकिन उसके दिल में जो चाहत है, जो तड़प है और जो इंतजार है, उसे देखो। यहां शौक शायर के प्रेम की गहराई और लगन को दर्शाता है, जबकि इंतिजार उस धैर्य और समर्पण का प्रतीक है जो सच्चे प्रेम में होता है।
इस शेर का मूल भाव यह है कि सच्चा प्रेम किसी योग्य या अयोग्य होने की शर्तों पर नहीं टिका होता, बल्कि उसमें चाहत, धैर्य और समर्पण ही सबसे बड़ी बात होती है। यह शेर हमें सिखाता है कि अगर दिल में सच्ची लगन हो, तो इंतजार भी इबादत बन जाता है और प्रेम अपनी सबसे पवित्र अवस्था में पहुंच जाता है।
अल्लाम इकबाल के मशहूर शेर
प्यार के एहसास पर अल्लामा इकबाल ने ऐसे ही कई खूबसूरत शेर लिखे हैं जो आज भी लोगों की जुबान पर हैं। आइए पढ़ते हैं अल्लामा इकबाल के चंद मशहूर शेर:
1. सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं
2. अपने मन में डूब कर पा जा सुराग़-ए-ज़ि़ंदगी
तू अगर मेरा नहीं बनता न बन अपना तो बन
3. तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ
4. नशा पिला के गिराना तो सब को आता है
मज़ा तो जब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी
5. फ़क़त निगाह से होता है फ़ैसला दिल का
न हो निगाह में शोख़ी तो दिलबरी क्या है
6. अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल
लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे
7. तमन्ना दर्द-ए-दिल की हो तो कर ख़िदमत फ़क़ीरों की
नहीं मिलता ये गौहर बादशाहों के ख़ज़ीनों में
