Royal Rasoi (रॉयल रसोई): मुगलों का शाही रसोई से निकली पाक कला की खुशबू आज भी भारतीयों के किचन में महसूस की जा सकती है। हमारी रसोई के बहुत से जायके और तरीके मुगलों की देन हैं। मुगलों का का खान-पान ऐसा था कि उसके किस्से आज भी सुने और सुनाए जाते हैं। इतिहास के पन्ने उनकी नायाब पाक कला के नमूनों से पटे पड़े हैं।
नूरजहां की शाही रसोई (AI Image)
जब भी कोई सम्राट या खास मुगल दरबार का मेहमान बनता तो उसके लिए ऐसा दस्तरखान बिछता कि उसका स्वाद सात समुंदर पार तक फैल जाता। तमाम बादशाहों ने अपने हिसाब से शाही रसोई को चलाया। बादशाह की पसंद और नापसंद के हिसाब से रसोई चला करती थी। लेकिन 25 मई 1611 के बाद ये रिवाज टूटा। शाही रसोई का रिवाज तोड़ा था बेगम नूरजहां ने।
जहांगीर की 20वीं बेगम थीं नूरजहां
नूरजहां जहांगीर की 20वीं बेगम थीं। मुगलों के इतिहास में नूरजहां से ज्यादा ताकतवर महिला कोई नहीं रही। नूरजहां का असली नाम मेहरुनिसा था। लेकिन वो जिस तरह की शख्सियत थीं उसे देखते हुए जहांगीर ने उन्हें नूरजहां नाम दिया। नूरजहां का मतलब होता है- पूरी दुनिया में रोशनी फैलाने वाली। दरअसल नूरजहां का दखल महज जहांगीर के निजी जीवन पर ही नहीं था, वह सत्ता, सेना, युद्ध, समझौते से लेकर रसोई तक पर अपनी पकड़ रखती थीं।
गजब थी स्वाद की परख
शाही रसोई को हमेशा नूरजहां के हुक्म पर चली। वो ही तय करती थीं कि बादशाह को क्या परोसा जाएगा। कौन से मसाले पड़ेंगे और पकाने का तरीका क्या होगा, नूरजहां इन सब पर निगरानी रखती थी। नूरजहां का नफीस स्वाद और शाही खानपान से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं। फारसी संस्कृति में पली-बढ़ी नूरजहां ने शाही रसोई के व्यंजनों को नया रंग और नई नजाकत दी।
द एम्परर्स टेबल – द आर्ट ऑफ मुगल कुजीन के मुताबिक नूरजहां को खुशबूदार और हल्के मसालों से बने व्यंजन बहुत पसंद थे। केसर, गुलाबजल, दालचीनी, इलायची और सूखे मेवों का इस्तेमाल उनके पसंदीदा पकवानों में खूब होता था। शाही रसोई में उनके लिए तरह-तरह के पुलाव, कबाब, कोरमे और मेवों से बनी मिठाइयां तैयार की जाती थीं। फलों का भी उन्हें खास शौक था।
फूड हिस्टोरियन सलमा हुसैन लिखती हैं कि यखनी नूरजहां का पसंदीदा मांसाहार था। ये मटन या चिकन का बेहद हल्के शोरबे का व्यंजन था, जो साबुत मसाले और बिना मिर्च या कम मिर्च से बनता था। कोरमा भी नूरजहां का पसंदीदा था, जो दही या बादाम , खसखस की हल्की ग्रेवी से बनता था।
स्वाद के साथ पेशकश भी थी खास
नूरजहां के लिए जितना महत्व भोजन के स्वाद का था उससे भी ज्यादा उसे परोसने के तरीके का था। वह व्यंजनों के पेशकश को लेकर किसी तरह का समझौता नहीं करती थीं। आपको जानकर हैरानी होगी कि हिंदुस्तानी खाने में फूड कलर के इस्तेमाल का श्रेय भी नूरजहां को ही जाता है। नूरजहां अनार, तरबूज या फिर जामुन जैसे फलों के रस से भोजन को रंगीन बनवा दिया करती थीं।
नूरजहां ने अपने स्वाद के हिसाब से शाही रसोई में एक नायाब चीज ईजाद की थी। ये बात किसी किसी को भी हैरान करने के लिए काफी है कि नूरजहां जो दही खाती थीं वो सात रंगों की होती थी। ये सतरंगी दही एक ही कटोरी में परोसी जाती थी। नूरजहां ने अपने खास रसोइयों को इस तरह की सतरंगी दही जमाने में निपुण कर दिया था। धीरे-धीरे शर्बत से लेकर बिरयानी तक को नूरजहां ने रंगीन बनाना शुरू कर दिया।
नूरजहां से खौफ खाती थी शाही रसोई
भोजन, उसके स्वाद और उसकी पेशकश को लेकर नूरजहां इतनी सख्त थीं कि गलती करने वाले रसोइयों को बख्शा नहीं जाता था। जहांगीर की आत्मकथा तुज़ुक-ए-जहांगीरी में ऐसे कई किस्से हैं जब मामूली सी गलती पर शाही रसोइयों को नौकरी और महल से बेदखल कर दिया गया। कई बार तो पूरी शाही रसोई को नूरजहां का प्रकोप झेलना पड़ा।
आधुनिक इतिहासकार मानते हैं कि खाने को लेकर नूरजहां की नाराजगी सत्ता, अनुशासन और शाही गरिमा बनाए रखने का तरीका था। एक बार तो छोटी सी गलती पर शाही खानसामे से उसका पद छीनते हुए नूरजहां ने भरे दरबार में कह दिया था कि मुगल दरबार दुनिया का आईना है, अगर स्वाद में संतुलन नहीं, तो शान में भी नहीं।
नूरजहां ने ताउम्र स्वाद में कमी को शाही अपमान माना। उनका हमेशा मानना था कि, 'शाही रसोई में बनने वाला भोजन किसी आम आदमी का नहीं, बादशाह-ए-हिंद का भोजन है। यहां गलती लापरवाही नहीं, बेअदबी कहलाएगी।' इन 'बेअदबियों' के भी बहुत से किस्से हैं। इन किस्सों पर हम नजर डालेंगे रॉयल रसोई के अपने अगले अंक में।
