Exclusive: पिता की एक सीख ने बदल दी थी इस संगीतकार की जिंदगी, जानिए कैसे प्रसिद्ध बांसुरी वादक के रूप में उभरे पद्म श्री रोणू मजूमदार

  • Agency by: Agency
  • Updated Feb 18, 2025, 02:51 PM IST

Ronu Majumdar Padma Shri Award: भारत कलाकारों का देश माना जाता है। बांसुरी, जो क‍ि एक ऐसा लोक वाद्य है जिसकी धुन सभी का मन मोह लेती है। भारतीय संगीतकारों की श्रृंखला में एक नाम ऐसे बांसुरी वादक का आता है जिन्होंने विश्व मंच पर कई बार अपनी मुरली की तान से भारतीय संगीत को गौर्वांगित किया है। हम बात कर रहे हैं पद्म श्री रोणू मजूमदार की। हमसे एक खास मुलाकात में उन्‍होंने अपनी संगीत यात्रा के बारे में दिल खोलकर बात की।

Ronu Majumdar Padma Shri Award: वैसे तो कई संगीतकारों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत के नाम को रोशन करने में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दिया है, लेकिन बांसुरी वादक रोणू मजूमदार ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के कैनवास पर अपनी बांसुरी की धुन से कुछ अलग ही रंग बिखेरे हैं। रोणू मजूमदार ने पंडित रवि शंकर जैसे प्रसिद्ध संगीतकारों के साथ Passages और Chants of India जैसे एल्बमों में अपना सहयोग दिया है। 30 से अधिक ऑडियो रिलीज के साथ, उन्हें 1999 में संगीत और संस्कृति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के लिए आदित्य विक्रम बिड़ला पुरस्कार से सम्मानित किया गया और 2001 में सहारा इंडिया परिवार के द्वारा इन्हें आजीवन उपलब्धि पुरस्कार(Life Time Achievement) से सम्मानित किया गया। 2014 में, इन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। 26 जनवरी, 2025 को इन्हें भारत सरकार ने इन्हें प्रतिष्ठित पद्म श्री से सम्मानित किया है। टाइम्स नाउ नवभारत (डिजिटल) के साथ भारतीय बांसुरी वादक रोणू मजूमदार की एक खास और दिलचस्प बात-चीत हुई, जिसमें उन्होंने ने अपने बचपन, गुरुओं, करियर और जीवन यात्रा साझा की है। ये लेख इसी बात चीत पर आधारित है।

Ronu Majumdar Life story, Biography, Profile, रोणू मजूमदार

पद्म श्री रोणू मजूमदार

6 साल की उम्र से जुड़ा बांसुरी से साथ

रोणू मजूमदार का जन्म बनारस के सारनाथ में 22 जून 1963 को हुआ था। यहां इनका बचपन भी बीता। इनके पिता एक होम्योपैथी चिकित्सक और अपने समय के प्रसिद्ध आयल पेंटर आर्टिस्ट थे। इनके पिता को बांसुरी बजाने का शौक था। बांसुरी के साथ अपनी यात्रा को याद करते हुए रोणू कहते हैं कि जब वह छह साल के थे, तब लड़कपन में आकर मैंने अपने पिता की बांसुरी खो दी। इसके दण्ड स्वरूप पिता जी ने मुझे 6 घंटे तक बांसुरी बजाने का अभ्यास करने को कहा। बस यहीं से बांसुरी की धुन के साथ मेरे तार जुड़ गए। यही वजह है कि रोणू आज भी अपने पिता को पहला गुरु मानकर पूजते हैं।

End of Feed