किताबें तो खरीद लाए पर पढ़ने का नहीं हुआ मन, जानिए कैसे मोटिवेशन से गिल्ट तक पहुंच जाती है ये आदत

कई बार लोग सिर्फ किताबें इकट्ठा करने के शौकीन होते हैं। उन्हें ऐसा भ्रम होता है कि घर में अच्छी और बड़ी किताबें होने मात्र से उनका बौद्धिक स्तर बढ़ रहा है।

क्या आपके घर में भी ऐसी कई किताबें रखी हैं जिन्हें आपने कभी खोला तक नहीं है? यह सिर्फ आपकी अकेली की समस्या नहीं है। दुनिया भर में अनगिनत लोग खुद को बेहतर बनाने, नई आदतें सीखने या प्रेरित होने की उम्मीद में किताबें खरीद तो लेते हैं, लेकिन वे अलमारी की शोभा बनकर रह जाती हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इसके पीछे एक गहरा मानसिक चक्र काम करता है।

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किताबें तो खरीद लाए पर पढ़ने का नहीं हुआ मन, जानिए कैसे मोटिवेशन से गिल्ट तक पहुंच जाती है ये आदत (Photo: iStock)

किताब खरीदने से मिलती है संतुष्टि

जब हम सेल्फ-हेल्प या किसी प्रेरणादायक किताब को खरीदते हैं, तो हमारा मस्तिष्क एक अजीब सी खुशी महसूस करता है। हमें ऐसा लगता है कि जैसे ही हमने किताब खरीदी, हमने उस समस्या का समाधान भी पा लिया। यह तात्कालिक संतुष्टि हमें उस पल के लिए एक बेहतर इंसान होने का अहसास कराती है, भले ही हमने उसका एक पन्ना भी न पढ़ा हो।

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