देश के मशहूर एड गुरु पीयूष पांडे का गुरुवार को निधन हो गया। 70 वर्ष की उम्र में मुंबई में उन्होंने अंतिम सांस ली। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वह किसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या से पीड़ित थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत देश की तमाम बड़ी हस्तियों ने उनके निधन पर शोक जताया है। Gen Z पीयूष पांडे को 'अबकी बार मोदी सरकार' कैंपेन के शिल्पकार के तौर पर पहचानती है, लेकिन उनसे एक पीढ़ी पहले वालों के लिए पीयूष पांडे वह शख्सियत थे जिन्होंने पूरे देश को 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' के धागे में पिरोया।
बड़े परिवार में पले, बड़े सपने देखे
1955 को राजस्थान के जयपुर में जन्मे पीयूष पांडे 9 भाई-बहन थे। मशहूर गायिका इला अरुण पीयूष की बहन और जाने माने निर्देशक प्रसून पांडे उनके भाई हैं। पिता बैंक में काम करते थे। बड़े परिवार में पले बढ़े पीयूष पांडे के सपने भी हमेशा से बड़े थे। उन्होंने जयपुर के सेंट जेवियर्स स्कूल से स्कूलिंग के बाद दिल्ली का रुख कर लिया। यहां उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से ग्रेजुएएशन किया। दिल्ली से ही इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन भी किया। किताबों की दुनिया से निकले तो उन्होंने रेडियो से दिल लगा लिया। वहां वह डेली यूज वाले साधारण प्रोडट्क्स के लिए जिंगल्स लिखने और पढ़ने लगे। इसी दरम्यान वह अपने क्रिकेट के शौक को भी जीते थे।
अपनी बहनों के साथ पीयूष पांडे (Photo: Bharat Tiwari fb)
27 साल की उम्र में रखा विज्ञापन की दुनिया में कदम
कई तरह के रोजगार में हाथ आजमाने के बाद 1982 में 27 साल की उम्र में पीयूष पांडे ने कमर्शियल ऐड की दुनिया में कदम रखा। उस वक्त भारत की ऐड इंडस्ट्री को शायद ही ये अंदाजा हो कि यह शख्स यहां नई इबारत लिखने आया है। आते ही पीयूष ने दिखा दिया कि सितारों के आगे जहां और भी है। उन्होंने कई प्रॉडक्ट्स के लाजवाब और यादगार ऐड डिजाइन किये। 'चल मेरी लूना' वाले ऐड से उन्होंने अपनी बड़ी पहचान बना ली। आपको जानकर हैरानी होगी कि अपना यह ऐड उन्होंने पहली बार अपने पड़ोसी के टेलीविज़न पर देखा और वह भी उसकी खिड़की के शीशे से। दरअसल पीयूष के पास उन दिनों टीवी नहीं हुआ करता था।
पद्मश्री से सम्मानित पीयूष पांडे (Photo: PTI)
जब पीयूष पांडे ने छेड़ा 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' का राग
फिर आया साल 1988। तारीख थी 15 अगस्त। देश आजादी के जश्न में डूबा था। तब एकमात्र टीवी चैनल था दूरदर्शन। उस दिन दूरदर्शन पर देश के नाम प्रधानमंत्री का संबोधन समाप्त होते ही राष्ट्रीय एकता के एक गीत ने लोगों के टीवी स्क्रीन पर दस्तक दी। यह गीत कम और पूरे देश को एक सूत्र में पिरोने का कैंपेन ज्यादा था। इस कैंपेन में उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक, पूरे देश की आवाज शामिल थी। देश के मशहूर खिलाड़ियों से संगीत और सिनेमा तक की दुनिया के दिग्गज चेहरे शामिल हुए। इस कैंपेन को संगीत से सजाया था शास्त्रीय संगीत के सरताज पंडित भीमसेन जोशी और अशोक पटकी ने। गीत को लिखने वाला कोई और नहीं बल्कि पीयूष पांडे थे।
पीयूष पांडे के शब्दों से बुना यह गीत कुछ इस तरह से समूचे हिंदुस्तान के जेहन में उतरा कि देखते ही देखते देश की धड़कन बन गया। गीत सुनते ही लोगों की जुबान पर चढ़ गया। हम जिस गीत की बात कर रहे हैं वह अमर गीत था - मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा। इस गीत के बोल आज 37 साल भी प्रासंगिक बने हुए हैं:
मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा
सुर की नदियाँ हर दिशा से बहते सागर में मिलें
बादलों का रूप ले कर बरसे हल्के हल्के
मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा
मिले सुर मेरा तुम्हारा
मिले सुर मेरा तुम्हारा..
मिले सुर मेरा तुम्हारा (Photo: You Tube)
इस गीत से पहले महज एक ही गीत था जिसने एक सुर में पूरे हिंदुस्तान के दिल पर दस्तक दी थी। वह गीत था कवि प्रदीप का लिखा और लता मंगेशकर का गाया- ऐ मेरे वतन के लोगों। मिले सुर मेरा तुम्हारा के जरिए पीयूष पांडे ने पहली बार राष्ट्रीय एकता के संदेश को अपनी कलम से सजा लोगों के दिल जीत लिये।
भावनाओं को बनाया विज्ञापन का जान
पीयूष यहीं नहीं रुकने वाले थे। आने वाले सालों में उन्होंने भारतीय विज्ञापन की दुनिया को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। उन्होंने भारतीयों की भावना और भावुकता को अपने ऐड कैंपेन्स की आत्मा के तौर पर पेश किया। 1989 में पीयूष पांडे ने बजाज के लिए टीवी ऐड बनाया। ऐड के बोल थे- हमारा कल...हमारा आज, बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर...हमारा बजाज। पीयूष ने इस ऐड को इतनी खूबसूरती और भारतीयता के साथ तैयार किया कि हिंदुस्तान में स्कूटर का मतलब ही बजाज हो चला।
आगे उन्होंने ऐसे ही तमाम यादगार टीवी कमर्शिल्यस बनाए। फिर चाहे वह छोटी सी बस पर चिपके लोगों की भीड़ वाला फेविकोल का ऐड हो या फिर हर घर कुछ कहता है की भावना से रूबरू करवाता एशियन पेंटेस का कमर्शियल हो। उन्होंने भावनाओं का तड़का लगा टीवी ऐड की दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव ला दिया। वह इस इंडस्ट्री का सबसे चमकता सितारा बन गए।
पीयूश पांडे का बनाया यादगार विज्ञापन (Photo: Fevicol)
पीयूष की कलम से निकली 'दो बूंद जिंदगी की'
वह पीयूष पांडे ही थे जिन्होंने पोलियो की वैक्सीन को दो बूंद जिंदगी के रंग में ऐसा उतारा कि पूरा देश उसमें रंगता दिखा। यह सरकारी कैंपेन हर किसी की जुबान पर चढ़ा। आज जब पोलियो लगभग देश से पूरी तरह गायब है, पीयूष पांडे की कलम से निकली दो बूंद जिंदगी की हिंदुस्तान के विज्ञापन जगत में हमेशा के लिए अमर हो चुकी है।
कुछ खास है जिंदगी
साल 2007 में आए कैडबरीज़ के उस ऐड को कोई कैसे भूल सकता है। उसमें 99 के स्कोर पर छक्का लगाते ही क्रिकेटर की प्रेमिका सारे सुरक्षाकर्मियों को छकाते हुए बीच मैदान में आकर नाचने लगती है। पीयूष के मुताबिक हर इंसान में एक बच्चा छिपा होता है जो कभी ना कभी खुशी में बाहर जरूर आता है। उन्होंने इसी सोच को उस ऐड की पंचलाइन बना डाला- कुछ खास है जिंदगी।कुछ खास है जिंदगी (Photo: Youtube)
आज पीयूष पांडे विज्ञापन की दुनिया में अपने पीछे ऐसी विरासत छोड़ गए हैं जो आने वाली पीढ़ियों के लिए किसी ग्रंथ से कम साबित नहीं होंगी। उन्होंने देश दुनिया को सिखाया कि लोगों के दिल तक पहुंचना है तो उनकी भावनाओं का सम्मान करना ही होगा। पीयूष पांडे को विज्ञापन के क्षेत्र में उनके काम के लिए साल 2016 में भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया।
