Times Now Navbharat
live-tv
Premium

Mithila Paag: महज सिर का ताज नहीं सम्मान का सिंबल भी है पाग, जानिए मिथिला पाग इतना क्यों है खास

पाग का चलन सदियों से मजबूत था, लेकिन 20वीं सदी में कम हुआ। शहरीकरण, वेस्टर्न कपड़ों ने इसे पीछे धकेला है। हालांकि पाग संस्कृति को बचाने के लिए प्रयास हो रहे।

Image
Mithila Paag: महज सिर का ताज नहीं सम्मान का सिंबल भी है पाग, जानिए मिथिला पाग इतना क्यों है खास
Authored by: सुनीत सिंह
Updated Nov 9, 2025, 17:43 IST
Follow on Google News

Mithila Paag: हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार चुनाव के दौरान सिर पर एक खास तरह की टोपी पहने दिखे। इस टोपी को मिथिला पाग कहा जाता है। इस चुनाव में मैथिली ठाकुर समेत तमाम बड़े नेता इस पाग में दिख चुके हैं। यह पाग सिर्फ सिर की शोभा बढ़ाने वाला कपड़े का एक टुकड़ा नहीं है। इसे पूरे मिथिला का स्वाभिमान भी माना जाता है। इस आर्टिकल में हम इसी मिथिला पाग की संस्कृति और इसके महत्व को अच्छी तरह से समझने की कोशिश करेंगे।

मिथिला पाग का इतिहास

मिथिला पाग का संबंध मिथिला के गौरवशाली इतिहास से है। इतिहासकारों के मुताबिक, 8वीं से 12वीं शताब्दी के प्राक्कालीन मैथिली साहित्य में पाग का जिक्र मिलता है। विद्यापति (1350-1448), मैथिली के आदि कवि ने अपने भक्ति और प्रेम गीतों में पाग को राजसी वैभव का प्रतीक बताया। गर्भाधान से श्राद्ध तक के 16 संस्कारों में पाग का महत्व है। सबसे पहले उपनयन (जनेऊ) में, फिर विवाह में। पुराने समय में 'साठा पाग' चलता था। साठ हाथ कपड़े से बनी। इसे धारण करना कठिन था। थोड़ा झुकते ही गिर जाता। मैथिली में 'पाग गिरना' मुहावरा भी है। इसका मतलब होता है इज्जत गंवाना।

4

4

मुगल काल में भी पाग ने अपनी चमक बरकरार रखी। दरभंगा राज के महाराजा कामेश्वर सिंह जैसे शासकों ने इसे संरक्षित किया। ब्रिटिश राज में, मैथिल ब्राह्मणों ने पाग को अपनी पहचान बनाए रखा। डॉ. सुभद्र झा जैसे विद्वान, जो मैथिली साहित्य के रत्न हैं, ने 'फॉर्मेशन ऑफ मैथिली लैंग्वेज' में लिखा कि पाग मिथिला की मौखिक परंपराओं का हिस्सा था। आज, जब मैथिली संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल है, पाग उसकी सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक बन गया।

पाग में बसती है मिथिला की आत्मा

मिथिला की संस्कृति बौद्धिकता, मर्यादा और कला की भूमि है। पाग यहां सिर्फ ब्राह्मण और कायस्थों में प्रचलित है। अन्य समुदायों में नहीं। ये मैथिल ब्राह्मणों की एकता का प्रतीक है। परिवार का सम्मानित व्यक्ति पाग पहनता। चाहे पिता हो या दादा। विवाह में दुल्हन का सात फेरों के बाद दूल्हा पाग बांधता है। धार्मिक अवसरों पर पाग अनिवार्य माना जाता है।

8

8

मैथिली संस्कृति में पाग का रंग-रूप मौसम और अवसर पर बदलता। पीला रंग हल्दी या नींबू से, हरा बेल वृक्ष की पत्तियों से, सफेद चावल के चूर्ण से। ये रंग नेचुरल होते हैं। बिल्कुल मिथिला की लोककला मधुबनी पेंटिंग की तरह।

कितने तरह का होता मिथिला पाग

मैथिली पाग की खूबसूरती इसकी वैरायटी में है। इसका हर रंग कुछ कहता है। पारंपरिक रूप से इसके लिए साटन या सिल्क का कपड़ा इस्तेमाल होता था। अलग-अलग मौकों के लिए अलग अलग रंग के पाग का चलन है:

लाल पाग: विवाह या शुभ कार्यों के लिए। लाल रंग सौभाग्य का प्रतीक। शादी में दूल्हा लाल पाग बांधता है।

पीला पाग: पीला पा पहनते हैं उपनयन संस्कार में। पीला रंग ज्ञान और पवित्रता दर्शाता। जनेऊ के साथ पहनना ब्राह्मण बनने का प्रतीक माना जाता रहा है।

सफेद पाग: धार्मिक अनुष्ठानों में सफेद पाग पहना जाता है। दरअसल सफेद या हल्का रंग शुद्धता का प्रतीक माना जाता है।

साठा पाग: यह पाग का काफी पुराना स्टाइल है। इसका चलन आज कम है लेकिन फिर भी गांव देहात के पुराने लोग साठा पाग पहने दिख जाते हैं।

6

6

कैसे बनता है मिथिला पाग

पाग बनाने की प्रक्रिया बेहद नाज़ुक और मेहनत भरा काम है, जिसमें कला के साथ धैर्य और निपुणता की भी ज़रूरत होती है। सबसे पहले मज़बूत कागज़ और पतली प्लाई शीट को काटकर उसका सांचा (ढांचा) तैयार किया जाता है। फिर उसे सफेद या लाल रंग के कागज़ से ढककर नई शक्ल दी जाती है। इसके बाद इस ढांचे पर लाल, पीले और उजले रंगों के कपड़े चढ़ाकर पाग का आकार तय किया जाता है।

जब ढांचा तैयार हो जाता है, तब उस पर महीन कपड़े की कई परतें चढ़ाई जाती हैं और फिर मिथिला पेंटिंग के पारंपरिक डिज़ाइनों और सुनहरी किनारों से उसे सजाया जाता है। खास मौकों जैसे शादी या धार्मिक समारोहों के लिए ‘लाल पाग’ और ‘मखमली पाग’ बनाई जाती हैं, जिनमें सुनहरी ज़री का बारीक काम होता है।

5

5

यह पूरा काम पूरी तरह हाथ से किया जाता है और एक सुंदर पाग बनाने में कारीगर को लगभग 2 से 3 घंटे का वक्त लगता है। हर पाग सिर्फ़ सिर का वस्त्र नहीं, बल्कि मिथिला की परंपरा, मेहनत और शिल्पकला की पहचान होती है।

कितनी आती है पाग बनाने की लागत

मिथिला के कारीगरों की मानें तो एक पाग तैयार करने की लागत करीब 15 रुपये पड़ती है, जिसमें कागज, कपड़ा, गोंद और बुनियादी सजावट का खर्च शामिल होता है। तैयार होने के बाद ये पाग स्थानीय थोक व्यापारियों को 50 रु प्रति पीस के हिसाब से बेचे जाते हैं। वहीं, साधारण या सादा पाग सीधे बाजार में भी ₹50 में बिक जाता है।

अगर बात मिथिला पेंटिंग वाले पाग की करें, तो उसमें करीब 20 रुपये अतिरिक्त खर्च आता है, क्योंकि उस पर बारीक हाथों से पारंपरिक मिथिला डिजाइन और सुनहरी किनारी का काम किया जाता है। ऐसे पाग की कीमत बाजार में 70 रु तक रखी जाती है। कुल मिलाकर देखा जाए तो एक पाग पर औसतन 30 से 35 रु तक की लागत आती है और बिक्री मूल्य 50 से 70 रु के बीच होती है। यानी कारीगरों को बहुत मामूली मुनाफा होता है।

9

9

पाग का चलन सदियों से मजबूत था, लेकिन 20वीं सदी में कम हुआ। शहरीकरण, वेस्टर्न कपड़ों ने इसे पीछे धकेला है। हालांकि पाग संस्कृति को बचाने के लिए प्रयास हो रहे। बिहार सरकार के 'वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट' स्कीम में पाग शामिल है। इसके अलावा कई संस्थाओं के द्वारा ‘पाग दिवस’ मनाने की परंपरा शुरू की है। मिथिला के लोगों का मानना है कि उनका यह पाग केवल किसी तरह की पगड़ी का रूप नहीं है, बल्कि सम्मान, परंपरा और एकता का प्रतीक भी है, जिसे हर हाल में जीवित रखना जरूरी है।

End of Article