जब मिर्जा गालिब ने हमेशा के लिए अल्फ़ाज़ छोड़ दिए, अखबारों की कलम से कुछ यूं निकली थी गालिब की मौत की ख़ामोशी

Mirza Ghalib: यह कहना कहीं से गलत नहीं होगा कि ग़ालिब के बिना उर्दू अधूरी है और शायद इश्क़ भी। उर्दू अदब की दुनिया में गालिब की रुखसती ने ऐसा सूनापन पैदा कर दिया जिसकी भरपाई कभी ना हो सकी। गालिब की मौत 15 फरवरी 1869 में हुई थी। हालांकि उनके निधन की खबर 2 दिन बाद अखबारों में छपी और लोग इस मनहूस खबर से रूबरू हो सके।

मिर्ज़ा ग़ालिब सिर्फ एक शायर नहीं थे, वे उर्दू जुबान की आबरू और शायरी की मांग का सिंदूर थे। उनकी शायरी इश्क़ की टीस, वक़्त की बेरुख़ी और ज़िंदगी की जटिलताओं का आईना है। ग़ालिब ने शब्दों को महज़ कविता नहीं, भावना की धड़कन बना दिया था। उनकी कलम से निकली पंक्तियां आज भी दिल के सबसे छुपे हुए जज़्बात को छू जाती हैं।

Mirza Ghalib (2)

मिर्ज़ा ग़ालिब

अपना शेर - हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले.., कहते हुए उन्होंने चाहत की चुभन को शायराना अंदाज़ में अमर कर दिया। ग़ालिब की ज़िंदगी खुद एक कविता थी। कर्ज़, तन्हाई, शोहरत और दर्द से बुनी हुई। लेकिन उनका अंदाज़-ए-बयां इतना ऊंचा था कि दर्द भी नज़्म बन गया और तन्हाई भी साथी। दिल्ली की गलियों से उठकर, वे दुनिया की अदबी फिज़ाओं में गूंजते रहे। उनके शब्द आज भी महफिलों में गूंजते हैं, दीवारों पर लिखे जाते हैं और टूटे दिलों को जोड़ते हैं।

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