किताब कैफे (Kitaab Cafe): जंतर मंतर पर भूख हड़ताल पे बैठे सोनम वांगचुक को वहां से जबरन हटा दिया गया है। उनकी जगह अब कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं। इस मुद्दे पर खूब राजनीति भी हो रही है। इन सबके बीच एक सवाल बार-बार मन में आना लाजमी है कि आखिर भूख विरोध का इतना बड़ा हथियार कैस बन जाती है? आखिर कैसे कोई इंसान अपने शरीर को कष्ट पहुंचाकर सामने वाले को झुका देने का दम रखता है। किसी व्यक्ति का अपना शरीर राजनीतिक संदेश कैसे बन सकता है?
किताब कैफे: द फास्ट्स ऑफ महात्मा गांधी (AI Generated Image)
भूख हड़ताल से जुड़े ऐसे ही ना जाने कितने सवालों के जवाब देती है महात्मा गांधी के अनशनों पर लिखी शानदार किताब The Fasts of Mahatma Gandhi: Politics as Prayer. इस चर्चित किताब के राइटर हैं मशहूर ब्रिटिश इतिहासकार थॉमस वेबर।
अगर आप अनशन और भूख हड़ताल के इतिहास को केवल घटनाओं से नहीं, उसके दर्शन, मनोविज्ञान और राजनीति के नजरिए से समझना चाहते हैं, तो यह किताब आपके लिए सबसे जरूरी बन जाती है। इस बुक का टाइटल ही इसकी सबसे बड़ी खूबी है। पॉलिटिक्स ऐज प्रेयर, यानी प्रार्थना के रूप में राजनीति।
किसी को हराने का हथियार नहीं है अनशन
इस किताब में थॉमस वेबर बताते हैं कि गांधी के लिए अनशन किसी को हराने का हथियार नहीं था। वह पहले खुद को बदलने की प्रक्रिया थी। गांधी का मानना था कि अगर किसी व्यक्ति को नैतिक रूप से झकझोरना है, तो पहले स्वयं कष्ट सहना होगा। यही वजह थी कि उनके अनशन का उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी को पराजित करना नहीं, उसके अंत:करण को जगाना था। वेबर लिखते हैं कि गांधी के अनशन की ताकत उनके इसी नैतिक विश्वास में थी।
इस किताब की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह गांधी के अनशनों को एक जैसा नहीं मानती। अहमदाबाद मिल मजदूरों की हड़ताल, खिलाफत आंदोलन, हिंदू-मुस्लिम एकता, अस्पृश्यता के खिलाफ संघर्ष, पूना पैक्ट और 47 के सांप्रदायिक दंगे, हर अनशन की पृष्ठभूमि, उद्देश्य और परिणाम अलग-अलग थे।
थॉमस वेबर हर अनशन को उसके ऐतिहासिक संदर्भ में रखते हैं। वे बताते हैं कि गांधी कब, क्यों और किन परिस्थितियों में भूख हड़ताल का सहारा लेते थे। इससे पाठक समझ पाता है कि गांधी के लिए अनशन आखिरी विकल्प था, पहली प्रतिक्रिया नहीं।
अनशन के पीछे छिपा मनोविज्ञान
यह किताब केवल राजनीतिक घटनाओं का दस्तावेज नहीं है। इसमें अनशन के मनोवैज्ञानिक पक्ष पर भी गंभीर चर्चा मिलती है। गांधी क्यों मानते थे कि स्वेच्छा से सहा गया कष्ट, हिंसा से ज्यादा प्रभावशाली होता है? भूख कैसे विरोध की भाषा बन जाती है? किसी व्यक्ति का अपना शरीर राजनीतिक संदेश कैसे बन सकता है? इन सवालों के जवाब किताब को सामान्य जीवनी से अलग बनाते हैं।
आज के आंदोलनों को समझने में भी मददगार
आज जब दुनिया भर में भूख हड़तालें अब भी विरोध के एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल होती हैं, तब यह किताब और भी प्रासंगिक हो जाती है। सोनम वांगचुक-अभीजीत दीपके का मौजूदा भूख हड़ताल हो , इरोम शर्मिला का 16 साल लंबा अनशन हो या अन्ना हजारे का जनलोकपाल आंदोलन। इन सबको समझने के लिए गांधी के मॉडल को समझना जरूरी है। थॉमस वेबर की यह किताब उसी बुनियादी समझ की नींव रखती है।
अगर आप सिर्फ यह जानना चाहते हैं कि गांधी ने कितनी बार अनशन किया, तो इंटरनेट पर जानकारी मिल जाएगी। वहीं अगर आप यह समझना चाहते हैं कि एक व्यक्ति का खाना छोड़ देना कैसे करोड़ों लोगों की राजनीति, नैतिकता और इतिहास को प्रभावित कर सकता है, तो यह किताब पढ़नी होगी।
The Fasts of Mahatma Gandhi: Politics as Prayer की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यह अनशन को केवल भूख हड़ताल नहीं मानती, उसे आत्मसंयम, नैतिक शक्ति और लोकतांत्रिक प्रतिरोध की एक गहरी भाषा के रूप में सामने रखती है।
यही वजह है कि गांधी पर लिखी गई सैकड़ों किताबों के बीच थॉमस वेबर की यह कृति आज भी उन चुनिंदा पुस्तकों में गिनी जाती है, जो बताती हैं कि इतिहास में कभी-कभी सबसे शक्तिशाली आवाज वह होती है, जो बिना एक शब्द बोले सिर्फ भूख के जरिए सुनाई देती है।
