Josh Malihabadi Birth Anniversary: उर्दू अदब में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनका जिक्र आते ही इस जुबान की धड़कन तेज हो जाती है। जोश मलीहाबादी उन्हीं में से एक थे। शब्दों के सुल्तान, बगावत के शायर और इंसानी जज्बात के बड़े पैमाने के चित्रकार। 5 दिसंबर, 1898 में उत्तर प्रदेश में मलीहाबाद के एक पढ़े-लिखे परिवार में जन्मे शब्बीर हसन खानशुरू से ही तेवर और ख्याल दोनों में अनोखे थे। जोश उनका तखल्लुस था और मलीहाबाद में पैदा होने के कारण वह जोश मलीहाबादी कहलाए। उनकी तालीम किताबों के साथ ही समाज की हलचल, आजादी की लड़ाई और इंसानी तकलीफों के बीच भी हुई थी।
- हां कौन पूछता है ख़ुशी का नहुफ़्ता राज़
- शबाब-ए-रफ़्ता के क़दम की चाप सुन रहा हूं मैं
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जोश की शायरी उर्दू की सबसे धारदार आवाजों में गिनी जाती है। वे नर्म लफ्जों के शायर नहीं थे। वे आग का लहजा रखते थे, जो जुल्म के खिलाफ, अन्याय के खिलाफ और हर उस ताकत के खिलाफ था जो इंसान को कमजोर बनाती है। उनकी नज्में इंकलाबी कविता का दूसरा नाम बन गईं। वह कहते थे सुनो ऐ दुनिया वालों, ये ‘जोश’ की पुकार है। सचमुच, उनका हर शेर तेज गूंजता हुआ, दिल के अंदर उतरता हुआ किसी पुकार की तरह लगता है।
- काम है मेरा तग़य्युर नाम है मेरा शबाब
- वहां से है मिरी हिम्मत की इब्तिदा वल्लाह
मगर जोश सिर्फ क्रांति के शायर नहीं थे। उनके अंदर एक शानदार रोमांटिक, नाजुक एहसासात वाला कलाकार भी था। इश्क, हुस्न और इंसान की रूहानी तड़प को भी उन्होंने उसी शिद्दत से लिखा, जैसे जंग और जुल्म को। उनकी शायरी में गजल की नफासत और नज्म की व्यापकता, दोनों का संगम मिलता है। यही वजह है कि वह फैज, फिराक और जिगर जैसे बड़े नामों के बीच भी अपनी एक अलग पहचान बनाए रखते हैं।
- दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया
- मुझ को तो होश नहीं तुम को ख़बर हो शायद
- इस का रोना नहीं क्यूं तुम ने किया दिल बर्बाद
जोश का जीवन भी उनकी शायरी की तरह संघर्षों से भरा था। भारत-पाक विभाजन के बाद वे पाकिस्तान चले गए, मगर दिल के किसी कोने में अपने मुल्क और अपनी मिट्टी को हमेशा याद करते रहे। उनकी आत्मकथा यादों की बरात उर्दू की सबसे बेबाक और जीवंत आत्मकथाओं में मानी जाती है, जिसमें राजनीति, साहित्य, प्रेम और दोस्ती सब कुछ ईमानदारी से दर्ज है।
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- मेरे रोने का जिस में क़िस्सा है
- हद है अपनी तरफ़ नहीं मैं भी
- एक दिन कह लीजिए जो कुछ है दिल में आप के
जोश मलीहाबादी ने उर्दू को सिर्फ शायरी नहीं दी। उन्होंने उसे सर उठाकर जीने का, सोचने का, सवाल पूछने का एक रवैया दिया। उर्दू भाषा को लेकर उनकी दीवानगी को कुछ लोग सनक भी कहा करते थे। इसी सनक का नतीजा था कि गलत उर्दू के लिए उन्होंने पीएम या प्रेसिडेंट को भी नहीं बख्शा।
- इंसान के लहू को पियो इज़्न-ए-आम है
- तबस्सुम की सज़ा कितनी कड़ी है
पाकिस्तान के प्रेसिडेंट को 'सिखाई' ही उर्दू
जोश मलीहाबादी के पोते फ़र्रुख जमाल ने अपनी किताब में लिखा है कि एक बार पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब खां की मुलाकात जोश मलीहाबादी से हुई। अयूब खां ने उन्हें खुश करने के लिए कहा कि आप बहुत बड़े आलम हैं। अपनी तारीफ में कहे ये शब्द सुनकर जोश ने राष्ट्रपति अयूब खां को टोक दिया। उन्होंने कहा सही लफ्ज आलिम है न कि आलम। इतना सुन जनरल अयूब नाराज हो गए। इस वाकये के बाद उन्होंने सरकार के संबंधित मंत्री को आदेश दे दिया कि जोश को दी गई सीमेंट एजेंसी उनसे वापस ले ली जाए। ऐसा ही हुआ भी।
- कश्ती-ए-मय को हुक्म-ए-रवानी भी भेज दो
- वहां से है मिरी हिम्मत की इब्तिदा वल्लाह
प्रधानमंत्री नेहरू को भी गलत उर्दू के लिए टोका
एक बार भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी जोश के सामने गलत उर्दू के फेर में फंस गए थे। हुआ ये था कि जोश ने एक किताब पंडित नेहरू को गिफ्ट की तो उधर से जवाब मिला कि मैं आपका मशकूर हूं। यहां जोश ने तुरंत नेहरू को टोका और कहा कि मशकूर गलत शब्द है, आपका कहना चाहिए कि मैं आपका शाकिर हूं। जोश मलीहाबादी की जीवनी यादों की बारात में इस वाकये का बखूबी जिक्र है।
- आड़े आया न कोई मुश्किल में
- आप से हम को रंज ही कैसा
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अधूरी रह गई आखिरी ख्वाहिश
पाकिस्तान के इस्लामाबाद में 1982 में जोश मलीहाबादी ने आखिरी सांस ली। मरते दम तक जोश मलीहाबादी की यही आखिरी ख्वाहिश रही कि जब भी मेरा इंतकाल हो तो मैं भारत की मिट्टी में दफनाया जाऊं। मगर बंटवारे का खेल ऐसा था कि उनकी यह ख्वाहिश पूरी न हो सकी। उनके हिस्से बस यही आया कि इस्लामाबाद में मलीहाबाद की मिट्टी से उनकी कब्र बनाई गई।
- इधर तेरी मशिय्यत है उधर हिकमत रसूलों की
- पहचान गया सैलाब है उस के सीने में अरमानों का
कभी नहीं मरते जोश
आज जब हम उनकी नज्में पढ़ते हैं, तो महसूस होता है कि वह सिर्फ अपने जमाने के शायर नहीं थे। वह हर दौर के लिए लिखे गए थे। जोश की शायरी आज भी उतनी ही ताजा, उतनी ही तेज और उतनी ही जरूरी है, क्योंकि उनके अल्फाजों में इंसानियत की बुलंद आवाज बसती है।
