साल 1959 में हीरा-मोती नाम की एक फिल्म आई थी। फिल्म में अभिनेत्री निरूपा रॉय और शुभा खोटे पर एक भोजपुरी गाना फिल्माया गया था। यह गाना ऐसे थे कि निरूपा राय चक्की चला रही हैं और गा रही हैं -
जतसार गीत: पिसता अनाज और छलकता दर्द, जांता के साथ कहां गुम हो गई जतसारी
कौन रंग मूंगवा कौन रंग मोतिया कऊन रंग ननदी तोरे बिरना
सबज रंग मूंगवा सफेद रंग मोतिया संवर रंग भऊजी, मोरे बिरना..
इस गीत में भाभी, ननद से कह रही है कि बताओ ननद मूंग किस रंग की होती है, मोती किस रंग की होती है और तुम्हारे भैया किस रंग के हैं। इस पर ननद गाकर जवाब देती है कि मूंग हरे रंग की है, मोती सफेद रंग के हैं और मेरे भैया सांवले-सलोने हैं।
ननद फिर कहती है- टूट गइले मूंगवा, बिखर गइले मोतिया बिसर गइले, हाये भऊजी मोरे बिरना (मूंग टूटकर बिखर गई, मोती भी बिखर गई और भाई मेरे भैया क्यों नाराज हो गए हैं?) तब भाभी जवाब देती है - बीन लिबो मूंगवा बटोर लेबो मोतिया मनाये लेबो हाय... ननदी तोरे बिरना हो हो हो हो जी (सुनो ननद! मूंग बीन लूंगी और मोती बटोर लूंगी और सुनो, तुम्हारे भैया को भी मैं मना लूंगी।)
ननद भाभी के बीच हाथ से चक्की पीसते हुए गाने के रूप में जो प्यार भरा संवाद हो रहा है भोजपुरी में वह जतसार गीत कहलाता है। जतसार गीतों की परंपरा यूपी और बिहार में बहुत पुरानी है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर ये जतसार क्या होता है। क्या है इसका सांस्कृतिक महत्व। आज के दौर में कहां खो गए ऐसे लोकगीत। इन सारे सवालों का जवाब आपको यहां मिल जाएगा।
क्या होता है जतसार गीत
जतसार जांता और सार से मिलकर बना है। जांता कहते हैं पत्थर की चक्की को और सार कहते हैं गीत को। मतलब कि जांता चलाते हुए जो गीत गाया जाता है उसे जतसार कहते हैं। भोजपुरी लोक परंपराओं में हर तरह के श्रम के लिए एक गीत है। जैसे जब धान की रोपनी होती है उस वक्त के लिए खास गीत है तो वहीं जब फसल की कटाई होती है तो उसके लिए चैता जैसे लोकगीत हैं। जतसार भी एक तरह का श्रमगीत है।
जतसार गीत
अगर हम बहुत ज्यादा पीछे ना जाकर सिर्फ 3 दशक भी पीछे जाएं तो याद करेंगे कि वह ऐसा दौर था जब बहुत कम लोग ही गेहूं या फिर कोई दूसरा अनाज पिसवाने चक्की पर जाया करते थे। हालांकि उस दौर में बहुत ज्यादा आटा चक्कियां थी भी नहीं। तब गांव-घर की औरतें इतनी सक्षम थीं की वे जांता में हीं गेहूं या दूसरे अनाज पीस लेतीं।
अनाज पीसने का काम तब होता था जब घर के सारे काम से महिलाएं फारिग हो जातीं। घर की कोई ऐसी जगह चुनतीं जहां ज्यादा लोग आराम से बैठ सकें। परिवार की महिलाएं जिनमें सास, जेठानी, देवरानी, ननद-भाभी से लेकर चाची-काकी, मौसी-बुआ और आजी तक शामिल रहती थीं, उनकी मंडली बैठती। उस मंडली के बीच रखी जाती पत्थर की जांत। 12-1 बजे दोपहर में ये मंडली बैठती और कई कई किलो अनाज पीस देती। इस मंडली को 'जतसारी' कहा जाता था। ये किसी एक दिन का काम नहीं था। ये सिलसिला तब तक चलता रहता जब तक सारे अनाज को पीस नहीं लिया जाता। लेकिन ये काम इतना आसान तो था नहीं। कठिन मेहनत वाले इस काम को आसान बनाते थे जतसार गीत।
जतसार: मेहनत का गीत
जांत के मुंह में मुट्ठी भर अनाज डालने के बाद हाथ से चक्की घुमाई जाती। मुट्ठी भर अनाज को जांत में डालने की प्रक्रिया झींक डालना कहते हैं। हर झींक के बाद जांत चलता और शुरू हो जाता मंडली का जतसार गीत। एक झींक डालने के बाद औरतें जांत चलातीं, साथ में जतसार गीत भी गाती जाती थीं। जतसार गीत की स्वर लहरी एक निश्चित अंतराल के बाद उभरती थी ताकि बीच बीच में दम लिया जा सके। जब जब झींक डाला जाता तब गले को दम मिलता। चक्की चलती रहती थी। उसकी घिर्र-घिर्र की आवाज ही संगीत हो जाया करती थी और इसी धुन पर गाए जाते थे जतसार गीत। इन गीतों के बोल रोज़मर्रा की ज़िंदगी, प्रेम, विरह, परिवार और सामाजिक रिश्तों के इर्द-गिर्द होते थे।
जांता के संगीत से सजे जतसार गीत
ये जतसार ना सिर्फ कठिन श्रम के दर्द को कम करते थे बल्कि इन्हीं गीतों के जरिए महिलाएं एक दूसरे का हालचाल भी लेती थीं। अपना दुख दर्द भी बांटती। उदाहरण के लिए ये जतसार गीत देखिए:
बाबा काहे लागी बढ़ल लामी लामी केसिया,
बाबा काहे लागी भईल मोर बैरिन जवानियां।
बाबा हो जे बाटे गईल पियवा मधुबनवा ,
से बटिया तुहुं बताई रे दिहत ना।
इस जतसार गीत में एक लड़की है जिसकी शादी तय हुई थी लेकिन किसी कारण से रिश्ता टूट गया है। वह बेटी गीत के जरिए अपने पिता से पूछ रही है कि बाबा! मेरे बाल इतने लंबे-लंबे क्यों हो गए हैं और क्यों मैं जवान हो गई हूं। जिस रास्ते मेरा पिया मधुबन चला गया है, वह किधर है। पिता जवाब देते हैं कि बिटिया अपने लंबे बालों को बांध कर रखो और यौवन को आंचल में कस लो क्योंकि जिस रास्ते तेरा पिया मधुबन को गया उसका तो निशान मिटता दिख रहा है।
बेटी झारिलअ लामी लामी केसिया,
कस के बान्हि ल आपन अंचरिया।
जे बाटे गईल तोर पियवा मधुबनवा,
से बटिया भईल रे मलिनवा ना।
पिसते अनाज के साथ छलकता दर्द
जैसा कि हमने बताया कि ये जांत चलाना इतना आसान भी नहीं होता था। जिसकी आदत ना हो उसका पूरा शरीर दर्द का घर बन जाता। एक बड़ा मशहूर जतसार गीत है जिसमें नई बहू अपनी सास से जांता चलाने की थकान की शिकायत कर सकती है। उसकी यह व्यथा सुनकर दूसरी महिलाएं हंसती हैं और कोरस में उसके साथ उसके दर्द को गाती हैं:
रामा चले नाहीं छोट छोट हाथवा रे ना।
बड़ बड़ दतवां के बड़ लागे जतवां रे ना।
सासु दिहली गहुंआ , ननद दिहली चंगेलिया।
गोतनी बैरनियां कहे गावअ जतसरिया।
जतसार गीत का सांस्कृतिक महत्व
जतसार का महत्व
जतसार गीत बस एक लोकगीत मात्र नहीं है। यह हमारे ग्रामीण ग्रामीण भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान का प्रतीक भी है। इसके अपने कई बेहद खास मायने हैं:
1. महिलाओं का सशक्तिकरण: भारतीय ग्रामीण समाज महिलाओं को बहुत ज्यादा आजादी नहीं होती थी। उनकी आवाज़ अक्सर दबी रहती थी। जतसार गीत उन्हें अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का अवसर देते हैं। ये गीत महिलाओं को सामाजिक बंधनों से परे अपनी बात कहने की आज़ादी देते थे, चाहे वह हास्य के माध्यम से हो या गंभीर भावनाओं के।
2. सामुदायिक एकता: जतसार गीत सामूहिक गायन के माध्यम से सामुदायिक एकता को बढ़ावा देते हैं। यह परंपरा गांव की महिलाओं को एक साथ लाती है, जिससे सामाजिक बंधन मज़बूत होते हैं। यह एकता ग्रामीण समाज की ताकत का प्रतीक है।
महिलाओं का अपनी आवाज
3. लोक संगीत की धरोहर: जतसार गीत उत्तर भारत के लोक संगीत की अनमोल धरोहर हैं। ये गीत स्थानीय बोलियों और संगीतमय शैलियों को संरक्षित करते हैं, जो आधुनिक संगीत के प्रभाव में खो रही हैं।
4. श्रम की गरिमा: भारतीय संस्कृति में श्रम को पूजनीय माना जाता है। जतसार गीत इस दर्शन को जीवंत करते हैं, क्योंकि वे कठिन मेहनत को सृजनात्मक और आनंदमय बनाते हैं। यह परंपरा श्रम की गरिमा को रेखांकित करती है।
5. आध्यात्मिक और भावनात्मक संतुलन: जतसार गीतों में अक्सर आध्यात्मिक और भक्ति तत्व शामिल होते हैं। ये गीत महिलाओं को भावनात्मक रूप से संतुलित रखते हैं और उन्हें जीवन की चुनौतियों का सामना करने की प्रेरणा देते हैं।
आधुनिक दौर में कहां है जतसार
आधुनिक दौर में जतसार
पिछले तीन दशक में जिस तरह से शहरीकरण, औद्योगीकरण और तकनीकीकरण ने जोर पकड़ा उसने जतसार गीत की परंपरा को प्रभावित किया है। आटा चक्की मशीनों और प्री-ग्राइंड अनाज की उपलब्धता ने जांता और चक्की का उपयोग कम कर दिया है। इससे जतसार गीत गाने की परंपरा भी धीरे-धीरे लुप्त हो रही है। फिर भी इस परंपरा को जीवित रखने के लिए कई प्रयास किए जा रहे हैं:
1. लोक संगीत के मंच: अभी भी कुछ लोक कलाकार ऐसे हैं जतसार गीतों को मंचों और सोशल मीडिया के माध्यम से लोकप्रिय बना रहे हैं। उनके प्रयासों ने शहरी दर्शकों तक इस परंपरा को पहुंचाया है।
2. सांस्कृतिक उत्सव: उत्तर भारत में लोक संगीत और सांस्कृतिक उत्सवों में जतसार गीतों को शामिल किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास के मेलों या बिहार के मिथिला उत्सवों में ये गीत सुने जा सकते हैं।
3. शैक्षिक पहल: कुछ विश्वविद्यालय और शोध संस्थान लोक संगीत और परंपराओं पर शोध कर रहे हैं। जतसार गीतों को दस्तावेज़ीकरण और संरक्षण के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
गुम हो गई जतसारी
4. सोशल मीडिया का प्रभाव: Instagram और YouTube पर अकसर जतसार गीतों के वीडियो नजर आ जाते हैं। ये पहल युवा पीढ़ी को इस परंपरा से जोड़ रही है। मालिनी अवस्थी का यह जतसार गीत सोशळ मीडिया में काफी वायरल है, जिसमें वर्षा ऋतु में पति से मिलन का वर्णन है -
रिमझिम बरसे सावन, जिया मोरा डोले रे,
चकिया घुमावे सखी, सैंया के मन बोले रे।
पिया परदेस बसत हैं, मोरे मन में आग,
बादर गरजे बिजुरी, लागे ना मोरे लाग।
जौन रंग सैंया मोरे, सावन के मेघ समान,
उनके बिन ये अंगना, लागे सुनसान।
चकिया की ताल पे, गीत मोरा गूंजे रे,
कब आएं सैंया मोरे, मनवा तरसे पूंजे रे।
सावन की हरीतिमा, लाए प्रीत की बात,
आज मिलन की बेला, सैंया आए रात।
..और अंत में
जतसार गीत उत्तर भारत के ग्रामीण जीवन की आत्मा हैं। ये गीत केवल संगीत नहीं बल्कि ऐसी सांस्कृतिक धरोहर हैं जो श्रम, सामुदायिकता और महिलाओं की भावनाओं को आवाज देते हैं। इनकी मधुर लय और सरल बोल हमारे गांवों की सादगी और गहराई को बयां करते हैं। भले आधुनिकता और तकनीकी प्रगति ने इस परंपरा पर गहरा आघात पहुंचाया है फिर भी कुछ लोक कलाकारों, सांस्कृतिक उत्सवों और डिजिटल मंचों के माध्यम से इसे जिंदा रखने रखने के प्रयास जारी हैं।
जतसारी
जतसार गीत हमें याद दिलाते हैं कि सांस्कृतिक परंपराएं न केवल अतीत को संरक्षित करती हैं, बल्कि वर्तमान और भविष्य को भी समृद्ध करती हैं। इस धरोहर को बचाने के लिए सामूहिक प्रयास और जागरूकता आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस अनमोल विरासत का आनंद ले सकें।
