Harivansh Rai Bachchan Poems, Hindi Diwas Poems: 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जा रहा है। जब भी हिंदुस्तान में हिंदी के विकास की बात आती है तो हरिवंश राय बच्चन का नाम जरूर आता है। छायावाद कवि के रूप में हरिवंश राय बच्चन बेहद कमाल नजर आए हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं में प्रेम के अवसाद को भी साहस में बदल कर पेश किया। बच्चन की कविताओं की सबसे खास बात ये है कि वह हमेशा आशा का दीपक जलाए रखते थे। हिंदी दिवस के माहौल में आइए पढ़ते हैं हरिवंश राय बच्चन की 5 कविताएं:
Hindi Diwas 2025: हरिवंश राय बच्चन की कविताएं (Photo: PTI)
Harivansh Rai Bachchan Famous Poems | Hindi Diwas Poems
1. मैंने गाकर दुख अपनाए
कभी न मेरे मन को भाया,
जब दुख मेरे ऊपर आया,
मेरा दुख अपने ऊपर ले कोई मुझे बचाए!
मैंने गाकर दुख अपनाए!
कभी न मेरे मन को भाया,
जब-जब मुझको गया रुलाया,
कोई मेरी अश्रु धार में अपने अश्रु मिलाए!
मैंने गाकर दुख अपनाए!
पर न दबा यह इच्छा पाता,
मृत्यु-सेज पर कोई आता,
कहता सिर पर हाथ फिराता-
’ज्ञात मुझे है, दुख जीवन में तुमने बहुत उठाये!
मैंने गाकर दुख अपनाए!
2. मैं जीवन में कुछ न कर सका
जग में अँधियारा छाया था,
मैं ज्वाला लेकर आया था
मैंने जलकर दी आयु बिता, पर जगती का तम हर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!
अपनी ही आग बुझा लेता,
तो जी को धैर्य बँधा देता,
मधु का सागर लहराता था, लघु प्याला भी मैं भर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!
बीता अवसर क्या आएगा,
मन जीवन भर पछताएगा,
मरना तो होगा ही मुझको, जब मरना था तब मर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!
Harivansh Rai Bachchan Short Poems in Hindi
3. ओ गगन के जगमगाते दीप!
दीन जीवन के दुलारे
खो गये जो स्वप्न सारे,
ला सकोगे क्या उन्हें फिर खोज हृदय समीप?
ओ गगन के जगमगाते दीप!
यदि न मेरे स्वप्न पाते,
क्यों नहीं तुम खोज लाते
वह घड़ी चिर शान्ति दे जो पहुँच प्राण समीप?
ओ गगन के जगमगाते दीप!
यदि न वह भी मिल रही है,
है कठिन पाना-सही है,
नींद को ही क्यों न लाते खींच पलक समीप?
ओ गगन के जगमगाते दीप!
4. दुखी-मन से कुछ भी न कहो!
व्यर्थ उसे है ज्ञान सिखाना,
व्यर्थ उसे दर्शन समझाना,
उसके दुख से दुखी नहीं हो तो बस दूर रहो!
दुखी-मन से कुछ भी न कहो!
उसके नयनों का जल खारा,
है गंगा की निर्मल धारा,
पावन कर देगी तन-मन को क्षण भर साथ बहो!
दुखी-मन से कुछ भी न कहो!
देन बड़ी सबसे यह विधि की,
है समता इससे किस निधि की?
दुखी दुखी को कहो, भूल कर उसे न दीन कहो?
दुखी-मन से कुछ भी न कहो!
5. मैंने मान ली तब हार
पूर्ण कर विश्वास जिसपर,
हाथ मैं जिसका पकड़कर,
था चला, जब शत्रु बन बैठा हृदय का गीत,
मैंने मान ली तब हार!
विश्व ने बातें चतुर कर,
चित्त जब उसका लिया हर,
मैं रिझा जिसको न पाया गा सरल मधुगीत,
मैंने मान ली तब हार!
विश्व ने कंचन दिखाकर
कर लिया अधिकार उसपर,
मैं जिसे निज प्राण देकर भी न पाया जीत,
मैंने मान ली तब हार!
हरिवंश राय बच्चन की ये कविताएं हमें सिखाती हैं कि हालात जैसे भी हों, जीवन में हमेशा संघर्ष करते रहना चाहिए। संघर्ष ही हमारे दुखों का नाश करता है।
