गॉड कॉम्प्लेक्स का क्या अर्थ है, ये क्यों चर्चा में ह
What is God Complex: जब फिल्म तेरे इश्क में का ट्रेलर आया था तो लीड किरदार मुक्ति यानी कृति सेनन के एक डायलॉग पर ध्यान गया था- मैं ना तुम्हे एक अच्छा, नॉन वॉयलेंट इंसान बना सकती हूं। और जब मूवी रिलीज हुई तो ट्रेलर की पिक्चर पूरी साफ हो गई। दरअसल, कहानी में कृति के कैरेक्टर को गॉड कॉम्प्लेक्स या गॉड सिंड्रोम से ग्रस्त दिखाया गया है।
गॉड कॉम्प्लेक्स या गॉड सिंड्रोम - एक ऐसी मेंटल स्टेट होती है जिसमें व्यक्ति बस अपनी सोच को सही समझता है और दूसरों को हीन या छोटा। वैसे इस कॉम्प्लेक्स की कहानी सिर्फ फिल्मी नहीं है। ऐसा रियल लाइफ में भी होता है।
गॉड कॉम्प्लेक्स ऐसे मनोवैज्ञानिक व्यवहार को कहा जाता है जिसमें व्यक्ति खुद को बेहद श्रेष्ठ, अचूक और हर स्थिति में सही मानता है। वह समझता है कि उसकी सोच, फैसले और क्षमताएं दूसरों से कहीं ऊपर हैं - मानो वह ईश्वर जैसे सर्वज्ञानी हों। यानी ऐसे लोग अपने ही बनाए हुए एक कल्पनालोक में जीते हैं, जहां वे खुद को असाधारण समझते हैं और अपेक्षा करते हैं कि अन्य लोग बिना सवाल किए उनकी बात मानें। तभी तो हमने आपको पहले ही बताया था कि ये कहानी बस मुक्ति की नहीं है बल्कि हमारे आसपास भी इस सिंड्रोम वाले कई लोग होंगे।
इंदौर के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल में कंसल्टेंट साइकिएट्रिस्ट डॉक्टर वैभव चतुर्वेदी का कहना है कि आप इस स्थित को कोई मानसिक रोग नहीं कह सकते है, बल्कि ये एक व्यवहारिक पैटर्न है जिसके पीछे कई फैक्टर्स काम करते हैं। देखने में आया है कि ऐसी सोच रखने वाला व्यक्ति और भी अन्य मानसिक विकारों से जूझ रहा होता है। ऐसा उसकी परवरिश, पारिवारिक माहौल, सफलता पर ज्यादा प्रशंसा करने की वजह से होता है।
फरीदाबाद के अमृता हॉस्पिटल के सायकेट्री विभाग की सीनियर कंसल्टेंट डॉ. मीनाक्षी जैन का कहना है कि गॉड सिंड्रोम से ग्रसित लोग दरअसल वास्तविकता से दूर होते हैं और बात सुने न जाने, अटेंशन न मिलने, या जरा भी उनके मन की न होने पर उनका व्यवहार पल भर में बदल सकता है। ऐसे लोग अपनी बात को ऊपर रखने के लिए मर्यादित सीमा को भी लांघ जाते हैं और दूसरों के लिए टॉक्सिक माहौल क्रिएट कर देते हैं।
ऐसे लोग हमेशा खुद को सही मानते हैं। उनको कभी लगता ही नहीं है कि वो कोई गलती भी कर सकते हैं। गॉड कॉम्प्लेक्स वाले लोग गलती मानने को अपनी कमजोरी समझते हैं। उसके लिए माफी मांगना लगभग असंभव होता है। डॉ. मीनाक्षी का कहना है कि ऐसे लोग हर पल हर जगह खुद को खास समझते हैं। उनको लगता है कि वे आम लोगों से एकदम अलग हैं और समाज के ‘नियम’ उन पर लागू नहीं होते। वे दूसरों को सुधारने या सही लाइन पर लाने के लिए इस दुनिया में आए हैं। यही लक्षण तो मुक्ति में भी दिखते हैं।
डॉ. वैभव की मानें गॉड कॉम्प्लेक्स से ग्रसित लोग अक्सर दूसरों को गाइड, कंट्रोल या डॉमिनेट करने की कोशिश करते हैं। उनका एडजस्टमेंट लेवल एकदम जीरो होता है। डॉ. वैभव की राय में इस तरह के व्यक्ति इतने सेल्फ डिवोटेड होते हैं कि वे दूसरों की भावनाओं को समझ ही नहीं पाते। तेरे इश्क में इसी का ही एक उदाहरण है जहां मुक्ति को कभी शंकर की फीलिंग्स समझ ही नहीं आती है।
आलोचना सहन न कर पाना भी गॉड कॉम्प्लेक्स वाले लोगों को एक आइडेंटिटी फैक्टर होता है। जरा-सी आलोचना भी उन्हें बुरी लगती है और वे तुरंत रक्षात्मक या आक्रामक हो जाते हैं।
गॉड कॉम्प्लेक्स की वजह को डॉ. वैभव सबसे ज्यादा परवरिश में देखते हैं। उनका मानना है कि लगातार ओवर-प्रेज, अत्यधिक लाड-प्यार, या यह सिखाने की आदत कि तुम सबसे खास हो - शुरू से मन में सुप्रीम भाव भर देता है। ऐसे बच्चे बड़े होकर इतने सेल्फ सेंटर्ड होते हैं कि दूसरों की जरा सी सफलता या तारीफ भी उनसे बर्दाश्त नहीं होती है। ये नेगेटिवटी या ईर्ष्या या सुप्रीम होने का कॉम्प्लेक्स उनको जीवन में किसी के साथ एडजस्ट नहीं होने देता है। हालांकि पावर, पैसा या बार-बार मिली सफलता भी इस फैक्टर को बढ़ाती है।
वहीं डॉ. मीनाक्षी के पास इसके उलट भी एक तर्क है। उनका कहना है कि कई लोग अंदरूनी असुरक्षा को छिपाने के लिए बाहरी रूप से सर्वश्रेष्ठ दिखने की कोशिश करते हैं। जब वे खुद को बेस्ट साबित नहीं कर पाते तो वे अपने से कमतर लोगों को ढूंढते हैं और फिर उनकी कमियां गिनाकर खुद को श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश करते हैं। लेकिन ऐसे लोग अपने से जरा लेवल के ऊपर लोग झेल नहीं पाते। इस स्थिति में या तो वे रोने धोने का सहारा लेते हैं या और तिकड़म लगाते हैं।
पर्सनैलिटी ट्रेट पर होने वाली एक स्टडी दिखाती है कि गॉड कॉम्प्लेक्स वाले लोग कहीं न कहीं Narcissistic Personality Disorder (NPD) से भी ग्रसित हो सकते हैं जिसमें व्यक्ति हमेशा अपने लिए अटेंशन और तारीफ वाला माहौल ही खोजता है। गॉड कॉम्प्लेक्स और NPD के लक्षण मिलते जुलते ही होते हैं।
गॉड कॉम्प्लेक्स से ग्रसित लोग हर चीज को कंट्रोल करना चाहते हैं। जाहिर है कि इससे सबसे पहले उनके करीबी रिश्ते ही असंतुलित हो जाते हैं। डॉ. वैभव का कहना है कि इस मानसिक अवस्था वाला व्यक्ति हमेशा अपनी बात ऊपर रखते हैं जिससे उनकी पर्सनैलिटी की तरह उनका कोई भी रिश्ता स्थिर नहीं होता है। लोग उनकी बातों से खुद को अनसुना या छोटा महसूस करेंगे तो उनका सपोर्ट सिस्टम भी नहीं बनेंगे। इसलिए ऐसे व्यक्ति अक्सर वक्त के साथ अकेलेपन और डिप्रेशन का मरीज होता जाता है।
उनके आगे और भी समस्याएं आती हैं, जैसे कि-
डॉ. मीनाक्षी कहती हैं कि पहले तो सभी यह जान लें कि गॉड कॉम्प्लेक्स कोई बीमारी नहीं है, यह बस व्यवहार और सोच का तरीका है जो व्यक्ति की पर्सनैलिटी में हालात और अनुभवों के आधार पर जुड़ता है। लेकिन अगर आपको लगता है कि अपने इस व्यवहार के चलते कोई व्यक्ति किसी भी तरह के खतरे में आ सकता है तो रिश्ते की करीबी के आधार पर उनको किसी मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट से मिलाने का तरीका खोजें। इसी के साथ आप ध्यान में रखें कि -
डॉ. मीनाक्षी का कहना है कि नई पीढ़ी में बढ़ती मान्यता (validation) की बढ़ती चाह, सोशल मीडिया का दबाव, हाई-प्रेशर नौकरी वाली भूमिकाएं और भावनात्मक असुरक्षा भी इस कॉम्प्लेक्स या सिंड्रोम को और बढ़ा रही है। तभी तो एक्सपर्ट परिवारों से आग्रह करते हैं कि अपनों में गॉड कॉम्प्लेक्स के शुरुआती संकेत दिखते ही कदम उठाएं और व्यक्ति की काउंसिलिंग करवाएं।
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