लोक कलाएं किसी भी जगह या समुदाय की ऐसी धड़कन होती है जो इतिहास, संस्कृति और भावनाओं की स्याही से सजती है। बात जब बिहार और वहां कि लोक कला की हो तो यहां की हर रेखा, हर रंग और हर धुन जन-जीवन के संघर्ष, उल्लास और आध्यात्मिक गहराई को स्वर देती है। उदाहर से समझे तो मधुबनी पेंटिंग जहां मिथिला की स्त्रियां अपनी पीढ़ियों की पीड़ा, प्रेम और पूजा को रंगों में पिरोती हैं तो वहीं सोहार, कोहबर, पटचित्र और झिझिया जैसी कलाएं बिहार के लोकजीवन का रंगीन अध्याय हैं। इन कलाओं में केवल साज नहीं होते, बल्कि समाज के सवाल होते हैं। मिट्टी की गंध, त्योहारों की उमंग और रिश्तों की परंपरा होती है। बिहार की लोक कला की बात तब तक पूरी नहीं होती जब तक बिदेसिया नाट्यकला की बात ना हो।
जब गीत, नृत्य और पीड़ा मिलते हैं तब जन्म लेता है बिदेसिया
क्या है बिदेसिया
क्या है बिदेसिया
बिदेसिया एक लोक रंगमंच है जिसमें संगीत, अभिनय, गीत और नाच का अद्भुत संगम होता है। यहां बिदेसिया शब्द का अर्थ है – वह जो विदेश (अपने गांव से बाहर, आमतौर पर शहर या महानगर) में गया है। यह नाट्यकला उस स्त्री की पीड़ा को केंद्र में रखता है जिसका पति या प्रेमी रोजगार के लिए गांव छोड़कर बाहर चला गया है और वह अकेले जीवन जी रही है। बिहार की माटी में उपजा बिदेसिया केवल एक लोकनाट्य नहीं, बल्कि एक ऐसी भावनात्मक यात्रा है जो गांव की चौपाल से उठकर नारी हृदय की पीड़ा को गूंज में बदल देती है।
बिदेसिया का भाव
आसान भाषा में समझें तो बिदेसिया एक पुकार है उस अभागिन की जो अपने बालम के परदेस चले जाने पर चुपचाप आंसुओं की भाषा बोलती है। बिदेसिया के भोजपुरी गीतों में विरह की तड़प, सामाजिक विडंबना और प्रेम की अग्नि की तपिश झलकती है। ढोलक की थाप, मंजीरे की टनकार और संवादों की मिठास में सजी यह कला आज भी जीवंत है क्योंकि बिदेसिया आज भी हर उस दिल की आवाज़ है, जो किसी अपने से बिछड़ा है।
बिदेसिया का इतिहास
बिहार की लोकसंस्कृति में बिदेसिया का जन्म हुआ उस दौर में, जब वहां के पुरुष आजीविका के लिए परदेस जाते थे और उनकी औरतें घर-आंगन में विरह की आग में तपती थीं। पूरी कहानी 19वीं और 20वीं सदी के उस दौर से है जब भारत, खासतौर बिहार, से बड़ी संख्या में लोग कॉलोनियल माइग्रेशन (जैसे गिरमिटिया मजदूर के रूप में फिजी, सूरीनाम, मॉरिशस आदि में) के लिए बाहर गए। इस पलायन में स्त्रियों ने अपने पतियों को खोया या सालों तक उनका इंतज़ार किया। उनकी यही वेदना लोक गीतों और नाटकों का विषय बनी। धीरे-धीरे ये कथाएं लोकनाट्य रूप में ढल गईं और ‘बिदेसिया’ का जन्म हुआ।
बिदेसिया के तत्व
भिखारी ठाकुर और बिदेसिया
भिखारी ठाकुर को भोजपुरी का शेक्सपियर कहा जाता है। बिदेसिया नृत्य को लोकनाट्य के रूप में लोकप्रिय बनाने का श्रेय जाता है उन्हें ही जाता है। भिखारी ठाकुर और बिदेसिया का रिश्ता वैसा ही है, जैसे माटी का बीज से या विरह का संगीत से। जब भोजपुर की धरती पर प्रवास, गरीबी और पलायन की त्रासदी गहराई हुई थी, तब भिखारी ठाकुर ने उन अनकहे दर्दों को आवाज़ दी बिदेसिया के रूप में। भिखारी ठाकुर ने अपने गीतों में स्त्री की वेदना को शब्द दिये। उनके संवादों में आंसू हैं, गीतों में उम्मीद और अभिनय में एक पूरी सभ्यता की झलक। वह भिखारी ठाकुर ही थे जिन्होंने बिदेसिया के माध्यम से लोककला को आत्मा की अभिव्यक्ति बना दी। एक ऐसा आइना जिसमें समाज अपने चेहरे देख सके।
भिखारी ठाकुर और बिदेसिया
बिदेसिया के मशहूर गीत
बिदेसिया लोक नाट्य में जब विरह के गीत बहते तो सुनने वालों की आंखें झरना बन जाती। अपनों से दूरी दर्द बनकर सीने में चुभती। इन गीतों से सुकून गायब होता था और हर एक शब्द मजबूरी, लाटारी और दूरी की जुबान बोलते थे। ये हैं बिदेसिया नाट्यकला के 5 मशहूर गीत:
1. पिया गए रहन विदेशवा हो राम..
नायक की पत्नी द्वारा गाया गया एक मार्मिक गीत जिसमें वह अपने पति के विदेश जाने के बाद की तड़प और अकेलापन बयां करती है।
2. गवनवा करइह संइया हो राम, गवनवा करइह..
यह गीत बयाह के बाद पति के तुरंत विदेश चले जाने की पीड़ा को दर्शाता है।
3. फेर कब अइब बलमुआ ए बाबूजी..
पत्नी अपने ससुर से पूछती है कि उसका पति कब वापस आएगा। इसमें भावुकता और प्रतीक्षा का गहरा भाव है।
4. राउर गवनवा सहे ना जाला..
यह गीत प्रवासी जीवन की कठोरता और पीछे छूटे परिजनों की पीड़ा को उजागर करता है।
5. काहे के बिदेसिया बनल हो रामा..
यह गीत प्रवासी मजदूरी की सामाजिक आलोचना करता है और पुरुषों के पलायन की मजबूरी को उजागर करता है।
यही वो गीत हैं जिन्होंने बिदेसिया को सिर्फ एक नाटक नहीं, बल्कि भावनात्मक लोक-आंदोलन बना दिया। ये आज भी भोजपुरी लोकगायन, नाच और नौटंकी में जीवित हैं।
बिदेसिया के विषय
बिदेसिया का सांस्कृतिक महत्व
बिदेसिया कई कारणों से महत्वपूर्ण है। बिहार की सांस्कृतिक विरासत को संजोये हुए बिदेसिया दशकों से अपना महत्व बनाए हुए है। आइए डालते हैं बिदेसिया के सांस्कृतिक महत्व पर एक नजर:
1. सामाजिक मुद्दों का दर्पण: बिदेसिया सामाजिक मुद्दों जैसे प्रवास, लैंगिक भेदभाव और गरीबी को मंच देता है। इसमें पत्नियों की व्यथा बयां की जाती है। सामाजिक दबावों का भी जिक्र होता है। यह कला समाज में सुधार की मांग को जोर देती आई है।
2. लैंगिक अभिव्यक्ति: बिदेसिया की एक अनूठी विशेषता यह है कि इसमें पुरुष कलाकार ही महिला किरदार निभाते हैं। पुरुषों द्वारा महिला किरदार निभाना सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देता है और दर्शकों को लैंगिक समानता पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है।
3. लोकगीतों और संगीत का संरक्षण: बिदेसिया भोजपुरी लोकगीतों और संगीत को जीवंत रखता है। इसमें मृदंग, झाल, मंजीरा और कभी-कभी हारमोनियम का उपयोग होता है। गीतों में प्रेम, विरह, और सामाजिक टिप्पणियां होती हैं, जो दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ती हैं।
बिदेसिया का मंचन
4. सांस्कृतिक पहचान: बिदेसिया बिहार की भोजपुरी संस्कृति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ले जाता है। यह बिहार की ग्रामीण और सामाजिक पहचान को दर्शाता है, जो त्योहारों, मेलों और सामुदायिक समारोहों में रंगमंच पर उतरता है।
बॉलीवुड और बिदेसिया
बॉलीवुड ने प्रत्यक्ष रूप से शायद बिदेसिया को फिल्म का रूप नहीं दिया, लेकिन इसके भाव और मर्म को कई फिल्मों में दोहराया गया है। नदिया के पार, गंगा जमुना और साजन जैसी फिल्मों में गांव की पृष्ठभूमि, विरह और प्रवासी जीवन की झलक बिदेसिया की याद दिलाती है। फिल्मों में भोजपुरी लोकगीतों और विरह के सुरों का प्रयोग, विशेषकर औरतों की प्रतीक्षा, कहीं न कहीं इसी परंपरा से निकला है।
बिहार का बिदेसिया और बॉलीवुड का सामाजिक सिनेमा एक-दूसरे से अलग नहीं हैं, बल्कि एक ही कहानी के दो संस्करण हैं। एक माटी में गाया गया, दूसरा कैमरे में कैद। ज़रूरत है कि बॉलीवुड इस विरासत को और गहराई से अपनाए ताकि परदे पर भी गांव का दर्द और गीत जीवित रह सके।
आज के दौर में बिदेसिया
आज बिदेसिया का स्वरूप थोड़ा बदल गया है। मंचन अब आधुनिक सेटअप में होते हैं, महिला पात्रों की भूमिका असली महिलाएं निभाती हैं, लेकिन भावनात्मक गहराई अब भी बरकरार है। कई सामाजिक संगठनों, थियेटर ग्रुप्स और स्कूल-कॉलेजों में अब बिदेसिया वर्कशॉप्स भी होती हैं। दूरदर्शन और यूट्यूब जैसे माध्यमों ने इस शैली को वैश्विक दर्शकों तक पहुंचाया है। भिखारी ठाकुर के नाटकों को आधुनिक थिएटर में पुनर्जनन मिला है और कई युवा कलाकार इस कला को सीख रहे हैं।
बिदेसिया का वर्तमान
..और अंत में
बिदेसिया एक जीवंत लोक परंपरा है, जिसने बिहार की माटी की सुगंध को देश-दुनिया में पहुंचाया। यह सिर्फ एक नृत्य नहीं बल्कि सामाजिक दस्तावेज़ है, जिसमें एक युग की पीड़ा, उम्मीद और संघर्ष समाए हुए हैं। आज जब लोग अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं, तब बिदेसिया जैसी विधाएं हमें हमारी सांस्कृतिक पहचान और मानवीय संवेदनाओं से जोड़ती हैं। इसे संरक्षित करना, पढ़ाना और अगली पीढ़ी तक पहुंचाना हमारी सांस्कृतिक ज़िम्मेदारी भी है।
