जिसने भी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौर की पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें या वीडियो देखी हैं, तो एक चीज उनके ध्यान में जरूर आई होगी। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल या नेताजी सुभाष चंद्र बोस, लगभग हर बड़े नेता के सामने एक गोल काला माइक रखा होता था। उस पर अंग्रेजी के साफ बड़े अक्षरों में लिखा होता था - CHICAGO RADIO
कहानी शिकागो रेडियो की
शिकागो रेडियो नाम से ही अमेरिकी लगता है। अकसर लोग सोचते कि यह अमेरिका के शिकागो शहर की कोई कंपनी होगी जो माइक्रोफोन बनाती है। हालांकि हकीकत इससे कोसों दूर है। नाम से अमेरिकी यह माइक्रोफोन सौ टका देसी माइक था।
जी हां, जिस नाम को लोग विदेशी समझते हैं, उसके पीछे एक हिंदुस्तानी परिवार था। ऐसा परिवार जिसने कारोबार के साथ ही अपनी तकनीक से आजादी की लड़ाई की आवाज को लाखों लोगों तक पहुंचाया। करीब पांच दशक से भी ज्यादा समय तक पूरे देश की राजनीति, आंदोलन और जनसभाओं की आवाज शिकागो रेडियो के सहारे ही लोगों तक पहुंचती रही।
सिंध की एक छोटी दुकान से शुरू हुई कहानी
यह कहानी 1909 में शुरू होती है। तब सिंध के सुक्कुर शहर (जो आज पाकिस्तान में है) में ज्ञानचंद चंदूमल मोटवाने ने ईस्टर्न इलेक्ट्रिक एंड ट्रेडिंग कंपनी नाम की एक छोटी दुकान खोली। उन्हें बिजली के उपकरणों और आवाज को दूर तक पहुंचाने वाली मशीनों में खास दिलचस्पी थी।
कुछ साल बाद उन्हें समझ आया कि बड़ा काम करना है, तो बड़े शहर जाना होगा। इसलिए 1919 में वे बॉम्बे (आज का मुंबई) पहुंच गए। उन्हीं दिनों शिकागो टेलीफोन सप्लाई नाम से अमेरिका की एक मशहूर कंपनी हुआ करती थी। वह ट्रांसमिशन के सामान बनाया और बेचा करती थी।
मोटवाने परिवार ने भारत में उसके उपकरण बेचने की डीलरशिप ले ली। इसी वजह से 1926 के आसपास उनकी कंपनी का नाम शिकागो टेलीफोन एंड रेडियो कंपनी हो गया। कुछ सालों बाद उस अमेरिकी कंपनी का कारोबार बंद हो गया। फिर भी मोटवाने परिवार ने अपनी कंपनी नाम नहीं बदला। वजह ये थी कि उस दौर में शिकागो नाम सुनते ही लोगों के दिमाग में अच्छी क्वालिटी, दमदार साउंड और भरोसेमंद तकनीक की छवि बन जाती थी।
आजादी की लड़ाई को मिला अपनी आवाज
1930 का दशक आते-आते आजादी की लड़ाई तेज हो चुकी थी। गांधी जी, नेहरू और सरदार पटेल की रैलियों में हजारों लोग जुटते थे। एक शहर से दूसरे शहर, एक रैली से दूसरी रैली में विशाल जनसभा को संबोधित करते-करते इन नेताओं की आवाज थक जाती थी। बहुत सी सभाओं में तो लोगों तक उनकी आवाज भी ठीक से नहीं पहुंचती।
यहीं से कहानी में एंट्री होती है नानक मोटवाने की। वे ज्ञानचंद मोटवाने के बेटे थे। बिजनेस समझते थे, लेकिन दिल से देशभक्त भी थे। उन्होंने कांग्रेस की रैलियों में अपना पूरा साउंड सिस्टम पहुंचाना शुरू कर दिया। बड़े-बड़े एम्पलीफायर, लाउडस्पीकर, तार और माइक गाड़ियों में भरकर सीधे कार्यक्रम स्थल पर पहुंच जाते थे।
सबसे खास बात थी कि वे इसके बदले एक पैसा भी नहीं लेते थे। यह उनका देश के लिए योगदान था। ये सिलसिला 1960 के दशक तक चलता रहा। गांधी जी की धीमी आवाज हो या नेहरू के जोशीले भाषण, शिकागो रेडियो की मदद से दूर-दूर तक लोगों को सुनाई देने लगा।
जब अंग्रेज ढूंढते रह गए 'कांग्रेस रेडियो'
1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ। अंग्रेजों ने अखबारों पर रोक लगा दी। जनसभा में भाषणों पर पाबंदी लगा दी। उन्हें लगा कि अब आंदोलन की आवाज दब जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। महज 22 साल की उषा मेहता ने अपने साथियों के साथ कांग्रेस रेडियो नाम से एक गुप्त रेडियो स्टेशन शुरू किया।
यह रेडियो बार-बार जगह बदलता था। अंग्रेज पुलिस महीनों तक इसे ढूंढती रही। इस गुप्त रेडियो को चलाने के लिए ट्रांसमीटर के पार्ट्स, तकनीकी मदद और जरूरी उपकरण नानक मोटवाने ही चोरी-छिपे उपलब्ध कराया करते थे। जब अंग्रेजों को इसका पता चला, तो उन्होंने नानक मोटवाने को गिरफ्तार कर लिया। उन पर मुकदमा चला। वे जेल भी गए।
नेहरू का ट्रिस्ट विद डेस्टिनी और मोटवाने का लाउडस्पीकर
14 अगस्त 1947 की आधी रात। जब दुनिया सो रही थी, तब भारत एक नए दौर में कदम रख रहा था। हम ब्रिटिश गुलामी की जंजीरें तोड़ चुके थे। कश्मीर से कन्या कुमारी तक, देश आजादी के जश्न में डूबा था। इसी रात देश की राजधानी जवाहरलाल नेहरू ने अपना मशहूर भाषण दिया जिसे ट्रिस्ट विद डेस्टिनी (Tryst with Destiny) कहा जाता है।
भारतीय इतिहास की उस सबसे बड़ी ऐतिहासिक रात नेहरू के भाषण को दिल्ली की सड़कों पर उतरी भीड़ जिस लाउडस्पीकर से सुन रही थी उस पर भी अंग्रेजी के बड़े अक्षरों में साफ लिखा था - CHICAGO RADIO. यानी जिस शिकागो रेडियो ने आजादी की लड़ाई के भाषण सुनाए, उसी ने आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री की पहली ऐतिहासिक आवाज भी दुनिया तक पहुंचाई।
आजादी के बाद भी यह सिलसिला चलता रहा। डॉ. बी.आर. अंबेडकर संविधान सभा में बोलते थे, तब भी शिकागो रेडियो के माइक दिखाई देते थे। बड़े सरकारी कार्यक्रमों और राष्ट्रीय आयोजनों में भी शिकागो रेडियो मौजूद रहता था।
इसी माइक से पूरे देश को रुला गईं लता मंगेशकर
1962 के चीन युद्ध के बाद पूरा देश गहरे दुख में था। जनवरी 1963 में दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में एक खास कार्यक्रम हुआ। कार्यक्रम मेंकई बड़े नेताओं के साथ ही प्रधानमंत्री नेहरू भी मौजूद थे। सामने थीं लता मंगेशकर। जैसे ही उन्होंने कवि प्रदीप का लिखा 'ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आंख में भर लो पानी' गाना शुरू किया, पूरा माहौल बदल गया। लोग रो पड़े। नेहरू की आंखें भी भर आईं।
कमाल की बात यह है कि लता जी की वह आवाज जिस माइक से पूरे देश तक पहुंची, वह भी शिकागो रेडियो का ही माइक था। ऐसे ना जाने कितने ही ऐतिहासिक पलों का गवाह रहा है ये शिकागो रेडियो माइक। कई इंटरव्यूज में मोटवाने परिवार के लोग बता चुके हैं कि वो 1960 तक कांग्रेस और सरकार के कार्यक्रमों में मुफ्त सेवा देते रहे। मतलब कि करीब 30 साल तक वो बिना पैसे लिये व्यवस्था करते रहे।
1970 और 80 के दशक तक शिकागो रेडियो भारत का सबसे भरोसेमंद पब्लिक एड्रेस सिस्टम बन चुका था। कंपनी भले सरकारी कार्यक्रमों से पैसे नहीं लेती, लेकिन दूसरे कार्यक्रमों से उसे खूब फायदा हुआ। मुनाफा भी बढ़ा और लोकप्रियता भी।
जब इंदिरा गांधी ने नाम बदलने के लिए लिखा लेटर
1971 में जब इंदिरा गांधी चुनाव जीत प्रधानमंत्री बनने जा रही थीं, तब शपथ समारोह के लिए इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन तक शिकागो रेडियो के माइक और लाउडस्पीकर लगाए गए। इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ भी उसकी कंपनी के माइक से पढ़ी थी। हालांकि उस दिन माइक पर रेडियो शिकागो का नाम उन्हें थोड़ा खटका।
मोटवाने परिवार के हवाले से बीबीसी ने रिपोर्ट किया कि तब इंदिरा गांधी सरकार ने कंपनी को चिट्ठी लिख पूछा कि आप भारत में काम कर रहे हैं तो ये विदेशी नाम क्यों रखा हुआ है। उन्हें नाम बदलने के लिए कहा गया। इसके जवाब में मोटवाने परिवार ने पीएमओ को लिखा कि यह नाम उनके बिजनेस का ब्रांड बन चुका है। 4 दशकों से वह इसी नाम से बिजनेस कर रहे हैं। अब अगर नाम बदलेंगे तो काफी नुकसान होगा। परिवार ने लिखा कि अब से हम अपने सारे माइक्स पर एक तरफ शिकागो रेडियो औक दूसरी तरफ मोटवाने लिखा करेंगे। सरकार मान गई।
अब कहां है ये कंपनी?
1990 में उदारीकरण का दौर आया। भारत में विदेशी कंपनियों के लिए दरवाजा खुल गया। सस्ते इलेक्ट्रॉनिक सामान का बाजार बढ़ा। नई तकनीकों ने पुराने लाउडस्पीकरों की जगह लेनी शुरू कर दी। धीरे-धीरे पब्लिक मीटिंग और शादी ब्याह जैसी जगहों से शिकागो रेडियो का नाम आम नजरों से ओझल होता गया। एक वक्त बाद यह नाम इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गया।
वैसे कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। मोटवाने परिवार ने भले शिकागो रेडियो को बंद किया हो, लेकिन अपनी विरासत को आज भी जिंदा रखा है। आज यह कंपनी मोटवाने कम्युनिकेशन सिस्टम्स और मोटवाने मैन्युफैक्चरिंग के नाम से काम कर रही है। अब यह पुराने स्टाइल के लाउडस्पीकर नहीं बनाती। इंडस्ट्रियल टेस्टिंग और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी हाई-टेक तकनीकों पर काम करती है।
शिकागो रेडियो का आज नाम बदल चुका है, देश बदल चुका है, तकनीक बदल गई है लेकिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में ये नाम अमर हो चुका है। शिकागो रेडियो नाम हमेशा उस दौर के गवाह के तौर पर याद किया जाता रहेगा, जब एक हिंदुस्तानी कंपनी ने बिना प्रचार किए, बिना फीस लिए, देश की सबसे बड़ी लड़ाई को अपनी आवाज दी थी।
