क्या भगवान राम के लौटने की खबर पहुंचने में लग गए थे हफ्तों? आखिर पहाड़ों पर क्यों मनती है 'बूढ़ी दिवाली'

बूढ़ी दिवाली सिर्फ देर से मनाई जाने वाली दिवाली नहीं है। यह पहाड़ों का अपना तरीका है यह कहने का कि त्योहार कैलेंडर की तारीख से नहीं, लोगों के साथ आने से बनता है।

Budhi Diwali: लगभग पूरे देश जब दिवाली की रात बीत जाती है, घरों के दीये बुझने लगते हैं और बाजारों से त्योहार की रौनक धीरे-धीरे उतरने लगती है, तब हिमालय के कुछ हिस्सों में रोशनी का त्योहार शुरू होता है। पहाड़ों में कई जगह दिवाली के करीब 11 दिन बाद तो कहीं करीब महीने भर बाद दीपावली का त्योहार मनाया जाता है। इसे बूढ़ी दिवाली कहा जाता है। उत्तराखंड में बूढ़ी दीवाली को इगास बग्वाल भी कहते हैं। आइए जानते हैं कि ये बूढ़ी दिवाली है क्या और क्यों पहाड़ी इलाकों में देरी से मनती है दिवाली।

Budhi Diwali

आखिर पहाड़ों पर देर से क्यों मनती है दिवाली (Photo: AI Generated and Newsroom verified image)

पहाड़ों पर देर से क्यों मनती है दिवाली

इस सवाल का कोई एक ऐतिहासिक जवाब नहीं मिलता। बूढ़ी दिवाली की सबसे मशहूर कहानी लोकविश्वास से जुड़ी है। मान्यता है कि जब भगवान राम रावण को हराकर अयोध्या लौटे तो देश के दूसरे हिस्सों में उनके लौटने की खबर पहुंच गई। लोगों ने खुशी में दीये जलाए और दिवाली मनाई। लेकिन पहाड़ों के दूर-दराज गांवों तक यह खबर तुरंत नहीं पहुंच सकी। भौगोलिक चुनौतियों के कारण पहाड़ों पर देर से खबर पहुंची।

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