बिहार की मिट्टी से निकला वो अमर गीत, जिसे महात्मा गांधी मानते थे भोजपुरी का वंदेमातरम

चंपारण सत्याग्रह के दौरान गांव की कुछ मजदूर महिलाओं ने बापू को बटोहिया सुनाया था। कहा जाता है कि बापू ने इस गीत को भोजपुरी के वंदेमातरम की संज्ञा दी थी।

भोजपुरी समाज को हमेशा से मेहनत-मजदूरी से जोड़कर देखा जाता रहा है। अपने ही देश की एक बड़ी आबादी बदन से बहते पसीने को इस समाज की पहचान मान बैठी है। ऐसे लोगों को शायद पता नहीं है कि मेहनत इस समाज की मजबूरी नहीं, ताकत है। तभी तो दशरथ मांझी जैसा आम इंसान पहाड़ चीरकर अमर हो जाता है। लोग भूल जाते हैं कि जिस भोपुरिया माटी ने मेहनतकश मजदूरों को जन्म दिया, उसी मिट्टी ने कई बड़े कलाकार भी पैदा किए। इन्हीं कलाकारों में एक नाम है बाबू रघुवीर नारायण का।

Batohiya

कैसे बना वो गीत जिसे बापू ने कहा- भोजपुरी का वंदेमातरम (AI Generated and newsroom verified image)

अंग्रेजी के बड़े लेखक बाबू रघुवीर नारायण ने भोजपुरी भाषा में अपनी कलम चलाई तो उसने देश-दुनिया की हर दीवार गिरा दी। उन्होंने ऐसा गीत रचा जिसे 'भोजपुरी का वंदेमातरम' कहा गया। यह गीत करीब सौ साल बाद भी खूब सुना और सुनाया जाता है। फीजी, सूरीनाम और मॉरिशस जैसे देशों में तो इस गीत को सुनकर लोग आज भी रो देते हैं। हम बात कर रहे हैं बाबू रघुवीर नारायण के अमर गीत 'बटोहिया' की।

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