भोजपुरी समाज को हमेशा से मेहनत-मजदूरी से जोड़कर देखा जाता रहा है। अपने ही देश की एक बड़ी आबादी बदन से बहते पसीने को इस समाज की पहचान मान बैठी है। ऐसे लोगों को शायद पता नहीं है कि मेहनत इस समाज की मजबूरी नहीं, ताकत है। तभी तो दशरथ मांझी जैसा आम इंसान पहाड़ चीरकर अमर हो जाता है। लोग भूल जाते हैं कि जिस भोपुरिया माटी ने मेहनतकश मजदूरों को जन्म दिया, उसी मिट्टी ने कई बड़े कलाकार भी पैदा किए। इन्हीं कलाकारों में एक नाम है बाबू रघुवीर नारायण का।
कैसे बना वो गीत जिसे बापू ने कहा- भोजपुरी का वंदेमातरम (AI Generated and newsroom verified image)
अंग्रेजी के बड़े लेखक बाबू रघुवीर नारायण ने भोजपुरी भाषा में अपनी कलम चलाई तो उसने देश-दुनिया की हर दीवार गिरा दी। उन्होंने ऐसा गीत रचा जिसे 'भोजपुरी का वंदेमातरम' कहा गया। यह गीत करीब सौ साल बाद भी खूब सुना और सुनाया जाता है। फीजी, सूरीनाम और मॉरिशस जैसे देशों में तो इस गीत को सुनकर लोग आज भी रो देते हैं। हम बात कर रहे हैं बाबू रघुवीर नारायण के अमर गीत 'बटोहिया' की।
आपको बटोहिया का जादू समझना है तो पहले उसे ध्यान से पढ़ना होगा-
सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से,
मोरे प्रान बसे हिमखोह रे बटोहिया!
एक द्वार घेरे रामा हिम कोतवालवा से,
तीन द्वारे सिंधु घहरावे रे बटोहिया!
जाहु-जाहु भैया रे बटोही हिंद देखि आउ
जहवां कुहुकि कोइलि बोले रे बटोहिया!
पवन सुगंध मंद अमर गगनवां से,
कामिनी विरह-राग गावे रे बटोहिया!
सीता के विमल जस राम जस कृष्ण जस,
मोरे बाप-दादा के कहानी रे बटोहिया!
ब्यास, बाल्मीकि ऋषि गौतम कपिलदेव
सूतल अमर के जगावे रे बटोहिया!
रामानुज रामानंद न्यारी-प्यारी रूपकला
ब्रह्म सुख बन के भंवर रे बटोहिया!
नानक कबीर गौर संकर श्री रामकृष्ण
अलख के गतिया बतावे रे बटोहिया!
अपर प्रदेस-देस सुभग सुघर बेस
मोरे हिंद जग के निचोड़ रे बटोहिया!
सुन्दर सुभूमि भैया भारत के भूमि जेहि
जन ‘रघुवीर’ सिर नावे रे बटोहिया
आप भोजपुरी भाषा से थोड़े बहुत भी परिचित हैं तो दावा है कि आपकी आंखों के सामने एक पूरा भारत खड़ा हो गया होगा। इस गीत में हिमालय से घिरी धरती, गंगा-जमुना की लहरें, राम-कृष्ण-बुद्ध की स्मृतियां और कबीर-नानक-तुलसी की परंपरा सब है।
अगर आप भोजपुरी से अनजान हैं तो बता दें कि बटोहिया का मतलब होता है मुसाफिर। इस गीत में बाबू रघुवीर नारायण दर-दर भटकने वाले मुसाफिर से कहते हैं कि एक बार जाओ और मेरा देस मेरा हिंदुस्तान देख आओ। मेरे देस की मिट्टी में ऐसा जादू है कि उससे निकल नहीं पाओगे। इस गीत में देश के गौरव, उसकी ताकत, उसके गांव-देहात से लेकर उसकी प्राकृतिक और सांस्कृतिक खूबियों को इस तरह से पिरोया गया है कि कभी यह देशभक्ति का गीत लगता है तो कभी इसमें पलायन का दर्द भी झलक जाता है।
दरअसल जब देश पर अंग्रेजों का शासन था, तब लाखों भारतीयों को जबरन विदेश भेजा गया ताकि वो वहां जाकर सस्ते में मजदूरी कर सकें। इनमें ज्यादातर इसी भोजपुरिया समाज के लोग थे। ये लोग अपनी आंखों में बेहतर भविष्य का सपना संजोए मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी, गुयाना, त्रिनिदाद और कैरेबिया जैसे सुदूर द्वीपों पर ऐसा गए कि फिर कभी वापस ना आ पाए। लेकिन जब बाबू रघुवीर नारायण ने 1911 में बटोहिया रचा तो, विदेश भेज दिये गए उन गिरमिटिया मजदूरों को भारत लौटने का मौका मिला। वो इस गीत के जरिए अपने वतन की खुशबू को महसूस करने लगे। आज भी ये गीत वहां के भोजपुरिया समाज को रुला जाता है।
राजेंद्र प्रसाद के कहने पर रची बटोहिया
बाबू रघुवीर नारायाण का जन्म 1884 में बिहार के सारण जिले के दहियावां में हुआ था। शुरुआती पढ़ाई छपरा के जिला स्कूल में हुई और आगे उन्होंने पटना कॉलेज से अंग्रेजी में डिग्री ली। अंग्रेजी भाषा पर उनकी जबरदस्त पकड़ थी। मिजाज से कवि और अंग्रेजी के ज्ञान ने उन्हें इंग्लिश का पोएट यानी कवि बना दिया।
वो अंग्रेजी में कविताएं लिखतें और सरकारी गैर सरकारी कार्यक्रमों में उनका पाठ करते। उनकी कविताएं तब के अखबार और पत्रिकाओं में भी छपती। देश के पहले राष्ट्रपति बाबू राजेंद्र प्रसाद भी रघुबीर नारायण की प्रतिभा के कायल था। दोनों में खूब बनती थी।
साल 1911 में दोनों की एक खास मुलाकात हुई। वो दौर था जब देश में अंग्रेजों के खिलाफ आवाजें बुलंद होने लगी थीं। राजेद्र प्रसाद ने रघुवीर नारायण से कहा कि तुम भोजपुरी में कोई देशभक्ति गीत क्यों नहीं लिखते। अपनी भाषा में कोई ऐसा गीत लिखो जो विशाल भोजपुरिया समाज में आजादी और देशप्रेम की अलख जगा सके। रघुवीर नारायण को राजेंद्र प्रसाद की सलाह वाजिब लगी। उन्होंने कलमा उठाई और रच दिया भोजपुरी का सबसे अमर गीत- बटोहिया।
बापू के लिए भोजपुरी का वंदेमातरम था बटोहिया
जिस समय अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों के बीच अंग्रेजी में लिखना प्रतिष्ठा की बात माना जाता था, रघुवीर नारायण ने ऐसी रचना लिखी जो सीधे गांव की बोली में लोगों के बीच पहुंची। भोजपुरी माटी में बटोहिया घास की तरह फैल गया। लोगों के अंदर का देश प्रेम बाहर निकलने लगा। वो अंग्रेजों को आंख दिखाने लगे। उनकी बातें मानने से इनकार करने लगे। उन्हें हमारा देश छोड़कर जाने के लिए कहने लगे।
कहा जाता है कि महात्मा गांधी ने भी इस गीत की खूब प्रशंसा की थी। कई मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि चंपारण सत्याग्रह के दौरान गांव की कुछ मजदूर महिलाओं ने बापू को बटोहिया सुनाया था। कहा जाता है कि बापू ने इस गीत को भोजपुरी के वंदेमातरम की संज्ञा दी थी।
31 जनवरी 1955 को भोजपुरी का वंदेमातरम लिखने वाला यह अमर 'बटोहिया' इस नश्वर संसार से हमेशा के लिए विदा हो गया। हालांकि अपनी कालजयी रचना के जरिए वो आज भी करोड़ों भोजपुरी भाषियों और देशवासियों के दिलों में अमर हैं।
