अमेरिका का कुख्यात एपस्टीन सेक्स स्कैंडल (Apstien Sex Scandal) एक बार फिर से चर्चा में है। एपस्टीन फाइल्स ने देश दुनिया के कई बड़े नामों की नींद हराम कर रखी है। बहुत सी तस्वीरें सामने आई हैं और अभी बहुत सी आनी हैं। इन सबके बीच दो नाम ऐसे हैं जो मीडिया में छाए हुए हैं। पहला है जेफ्री एपस्टीन का और दूसरा नाम है लोलिता।
जेफ्री एपस्टीन अमेरिका का बहुत बड़ा नाम हुआ करता था। बड़ी-बड़ी हस्तियां उसकी दोस्त थीें। खुद को इनवेस्टमेंट मैनेजर बताने वाला जेफ्री एपस्टीन नाबालिगों के यौन शोषण और सेक्स ट्रैफिकिंग के गंभीर आरोपों में अमेरिका में गिरफ्तार हुआ था। जुलाई 2019 में न्यूयॉर्क की जेल में संदिग्ध परिस्थितियों में उसकी मौत हो गई।
अब आते हैं दूसरे नाम लोलिता(Lolita) पर। दरअसल लोलिता एक काल्पनिक नाम है। 1955 में इसी नाम से एक ऐसा उपन्यास छपा जिसने दुनिया के कई देशों में हंगामा मचा दिया। इस उपन्यास पर रूस और फ्रांस जैसे देशों ने अपने यहां बैन लगा दिया। लोलिता को दुनिया की सबसे विवादित किताबों में भी गिना जाता है।
यह उपन्यास छपने के बाद लोगों ने अपनी बेटियों का नाम लोलिता रखना छोड़ दिया था। वहीं जेफ्री एपस्टीन ने अपने प्राइवेट जेट का नाम लोलिता एक्सप्रेस रखा था। अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के डेमोक्रेट्स ने एपस्टीन फाइल्स की जो तस्वीरें जारी की हैं उनमें भी वह विवादित उपन्यास लोलिता दिख रही है।
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लोलिता और विवाद: चोली दामन का साथ
लोलिता रूसी मूल के राइटर व्लादिमीर नाबोकोव का सबसे चर्चित उपन्यास है। नाबोकोव ने 1954 में अपना यह उपन्यास पूरा लिख लिया था। लिखने के बाद उन्हें डर सताने लगा था कि शायद यह किताब कभी पब्लिश ना हो पाए। उनके डर की वजह थी उपन्यास की कहानी। दरअसल इस उपन्यास का मुख्य किरदार एक अधेड़ उम्र का शख्स है। हम्बर्ट हम्बर्ट नाम का यह शख्स डोलोरेस हेज (लोलिता) नाम की अपनी सौतेली नाबालिग बेटी के प्रति जुनून, वासना और कामुकता का शिकार है। 12 साल की लोलिता को वह सोते जागते अपने सपने में देखता है। किसी भी हाल में उसे पा लेना चाहता है।
व्लादिमीर नाबोकोव का डर सही साबित हुआ। कई प्रकाशकों ने उपन्यास का विषय सुनते ही मना कर दिया। लंबी जद्दोजहद के बाद पहली बार यह किताब साल 1955 में फ्रांस की राजधानी पेरिस में छपी। लोलिता को पब्लिश किया ओलंपिया प्रेस ने, जो अश्लील किताबों के लिए मशहूर थी। किताब के मार्केट में आते ही बवाल मच गया।
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लोलिता के छपते ही मच गया बवाल
कुछ ने लोलिता को एक अलग तरह का बेहतरीन साहित्य बताया तो वहीं बड़ी संख्या में लोगों ने इस उपन्यास पर उच्च स्तर की अश्लीलता परोसने का आरोप लगाया। देखते देखते लोलिता पर चाइल्ड पोर्नोग्राफी का ठप्पा लगने लगा। लोगों ने ये भी कहा कि लोलिता एक पेडोफाइल की हरकतों को ग्लैमराइज करती है।
तूफान इतना बढ़ा कि रूसी मूल के व्लादिमीर नाबोकोव की लोलिता को रूस और फ्रांस दोनों देशों ने बैन कर दिया। इसके बाद तो अर्जेंटीना, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और साउथ अफ्रीका जैसे देशों ने भी लोलिता के प्रकाशन और बिक्री पर अपने यहां बैन लगा दिया। ब्रिटेन में तो हालात ऐसे बने कि इस किताब को पब्लिश करने वाले कंजर्वेटिव पार्टी के एमपी निगेल निकोलसन को अपने पद से इस्तीफा तक देना पड़ा।
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लोलिता के कारण 11 साल की बच्ची का हुआ शोषण!
लोगों ने लोलिता पर आरोप लगाया था कि यह छोटी बच्चियों के प्रति विकृत मानसिकता को बढ़ावा देने वाली है। इसकी एक बानगी भी दिखी। दरअसल इस नॉवेल के छपने के कुछ सालों बाद अमेरिका के कैमडेन शहर में 11 साल की सैली हॉर्नर एक दुकान से नोटबुक चुराती पकड़ी गई। सैली को पकड़ने वाला शख्स था फ्रैंक ला सैले जिसने तब खुद को एफबीआई एजेंट बताया था। इस 'एजेंट' ने सैली से कहा कि उसे अब जेल जाना पड़ेगा और अगर वह जेल जाने से बचना चाहती है तो जैसा वह कहता है करे। इसके बाद फ्रैंक ला सैले ने 21 महीने तक सैली को बंधक बनाए रखा और उसका बलात्कार किया। वह 'एजेंट' सैली को शहर-शहर लेकर घूमता था और उसे अपनी बेटी बताता था।
इस सच्ची घटना को सारा वेनमैन ने 'द रियल लोलिता' नाम की अपनी किताब में बयां किया। सैली हॉर्नर के यौन शोषण को सारा ने नाबोकोव की लोलिता से प्रभावित बताया। हालांकि नाबाकोवा ने अपने उपन्यास का बचाव करते हुए कहा था कि इसमें कोई हकीकत नहीं है।
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..और जब भारत पहुंची लोलिता
लोलिता भारत पहुंची साल 1959 में। मुंबई के जयको पब्लिशिंग हाउस ने विदेश से इसकी कई कापियां इम्पोर्ट की। कन्साइनमेंट को बाॉम्बे के कस्टम कलेक्टर ने इस आधार पर जांच के लिए रोक लिया कि इसकी सामग्री अश्लील हो सकती है।
अभिनव चंद्रचूड़ की किताब 'रिपब्लिक ऑफ रेटोरिक -फ्री स्पीच एंड द कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ इंडिया' के मुताबिक तब बॉम्बे से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक 'करंट' के संपादक डीएफ कराका ने तत्कालीन वित्त मंत्री मोरारजी देसाई को पत्र लिख किताब पर रोक लगाने की मांग की। उन्होंने लिखा- यह नॉवेल बेहद आपत्तिजनक है। इसमें एक वयस्क पुरुष और 12-13 साल की नाबालिग लड़की के बीच संबंधों को ग्लोरिफाई किया गया है।
मोरारजी देसाई ने इस लेटर को गृह मंत्रालय को फॉरवर्ड कर दिया। उन्होंने गृह मंत्री को लिखा- मैं नहीं समझता कि अगर ये किताब अश्लील नहीं है, तो किसे अश्लील कहना चाहिए। ये तो सेक्स विकृति है। गृह मंत्रालय को इस पर संज्ञान लेना चाहिए।
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मशहूर पत्रकार रहे कुलदीप नैयर ने अपनी किताब 'बियॉन्ड द लाइंस - एन ऑटोबायोग्राफी' में लिखा है कि लाल बहादुर शास्त्री भी लोलिता को बैन करवाना चाहते थे। बकौल कुलदीप नैयर- कांग्रेस के किसी नेता ने लालबहादुर शास्त्री को लिखा कि पुस्तक भंडारों में अभी अभी पहुंची लोलिता इतनी अश्लील है कि इसे बैन कर देना चाहिए। शास्त्री ने इसी संबंध में प्रधानमंत्री नेहरू को पत्र भी लिखा। हालांकि लोलिता को भारत में बैन नहीं किया गया।
लोलिता के करोड़ों कद्रदान
लोलिता पर भले जितने भी आरोप लगे, जितना भी विरोध हुआ, इसे पढ़ने वालों की भी कमी नहीं रही। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस किताब की 6 करोड़ से भी ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं। गिनती अभी जारी है। जब ये बुक पहली बार छपी थी तब तो तीन दिन में ही सारी बिक गई थी। कंपनी को दोबारा छापना पड़ा था। अमेरिका में लोलिता बेस्ट सेलर साबित हुई।
अमेरिका में लोलिता का जादू ऐसा चला कि यह नाम लोगों की जुबान पर चढ़ गया। अमेरिकन्स की पसंद को भुनाने में हॉलीवुड भी पीछे नहीं रहा। वहां लोलिता उपन्यास पर दो फिल्में बनीं वो भी लोलिता नाम से ही। पहली लोलिता आई 1962 में जिसे डायरेक्ट किया था स्टेनली कुब्रिक। यह फिल्म आज भी क्लासिक मानी जाती है।
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1997 में एड्रियन लाइन ने जो लोलिता बनाई उसमें और भी ज्यादा ईमानदारी से उपन्यास को उतारा गया। जेरेमी आयरन्स और डोमिनिक स्वैन ने लीड रोल प्ले किये। लोगों को यह फिल्म भी खूब पसंद आई।
मशहूर मैगजीन प्लेबॉय को दिये इंटरव्यू में नाबोकोव ने कहा था- मुझे लोलिता पर कभी पछतावा नहीं होगा। मैंने साहित्य लिखा है, कोई पोर्नोग्राफी नहीं। बकौल नाबोकोव उनकी उपन्यास सिर्फ अंग्रेजी साहित्य का नायाब नमूना है।
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चाहे कुछ भी हो, 70 साल बाद भी लोलिता हर किसी को असहज करती है और शायद यही इसकी यूएसपी भी है।
