Leader of Opposition: लोकसभा चुनाव संपन्न होने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एक बार फिर से राजग (NDA) सरकार गठित हो गई और फिर तमाम मंत्रियों ने अपने मंत्रालयों और विभागों की जिम्मेदारी भी संभाल ली। अब बारी है लोकसभा में होने वाली पहली बैठक की।
नेता प्रतिपक्ष
इस बैठक में सभी की निगाहें लोकसभा में विपक्ष के नेता यानी नेता प्रतिपक्ष पर टिकी रहेंगी कि आखिर इस बार यह जिम्मेदारी कौन संभालता है, क्योंकि नियमों के मुताबिक, पिछले 10 साल से यह पद खाली था। हालांकि, दूसरी बड़ी पार्टी होने की वजह से कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी को नेता प्रतिपक्ष बना दिया गया था, लेकिन कांग्रेस के पास उतनी सीटें नहीं थीं जितनी इस पद के लिए कम से कम चाहिए होती हैं।
नेता प्रतिपक्ष का चयन (Leader of Opposition)
लोकसभा चुनाव में कम से कम 10 फीसदी सीट जीतने वाली पार्टी विपक्षी भूमिका निभा सकती है। आप इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि सत्तापक्ष का विरोध करने वाली पार्टियों में से जो कम से कम 10 फीसदी या फिर इससे ज्यादा सीटें हासिल की होगी उस पार्टी के पास विपक्ष की भूमिका होगी।
कैसे होता है विपक्ष के नेता का चयन?
10 फीसदी सीट जीतने वाली पार्टी अपने किसी एक नेता को सर्वसम्मति से अपना नेता चुनती है, जिसे लोकसभा में विपक्षी नेता या नेता प्रतिपक्ष कहा जाता है। अंग्रेजी भाषा में इसे लीडर ऑफ अपोजिशन (Leader of Opposition) कहते हैं।
नेता प्रतिपक्ष
पहला LoP कौन था?
देश में 1951 में पहली बार लोकसभा चुनाव हुआ था, लेकिन 1951 में नेता प्रतिपक्ष नहीं था। 1969 में पहली बार किसी नेता को आधिकारिक नेता प्रतिपक्ष के तौर पर मान्यता दी गई थी। लोकसभा के पहले नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस (ओ) के राम सुभाग सिंह थे। हालांकि, नेता प्रतिपक्ष का पद 1980, 1989 और 2014 से लेकर 2024 के बीच खाली रहा।
2024 के चुनाव में कांग्रेस दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। ऐसे में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी का नेता प्रतिपक्ष की रेस में नाम सबसे आगे चल रहा है। पार्टी नेताओं ने उनसे मांग की है कि वह इस पद को स्वीकार करें।
सनद रहे कि लोकसभा चुनाव में भाजपा 240 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जबकि कांग्रेस के हिस्से में 99 सीटें आई हैं, जो पिछले 10 साल में कांग्रेस का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। साथ ही कांग्रेस का आंकड़ा लोकसभा की कुल संख्या का 18 फीसदी है।
