Science News: कुदरत के इस विशाल मंच पर जब दो महासागर आपस में 'संवाद' करना बंद कर दें, तो इसका असर पूरी दुनिया के मौसम चक्र पर पड़ता है। सदियों से प्रशांत महासागर में उठने वाली हर लहर और तापमान का हर बदलाव हिंद महासागर की गतिविधियों को सीधे प्रभावित करता रहा है। लेकिन वुड्स होल ओशनोग्राफिक इंस्टीट्यूशन (WHOI) के वैज्ञानिकों की एक हालिया स्टडी ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है।
मौसम पर कितना भारी पड़ेगा यह बदलाव (News Verified AI Generated Image)
प्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित "Coupling of Pacific and Indian Ocean variability disrupted by 19th century volcanism" नामक इस अध्ययन में खुलासा हुआ है कि इंसानी गतिविधियों से पैदा हो रही ग्लोबल वॉर्मिंग (Global Warming) और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के कारण हिंद और प्रशांत महासागर के बीच का लगभग 400 साल पुराना ऐतिहासिक संबंध (Climate Connection) टूट रहा है।
क्या है हिंद और प्रशांत महासागर का 'क्लाइमेट कनेक्शन'?
आसान शब्दों में समझें तो यह दो पड़ोसियों के बीच की ऐसी ट्यूनिंग है, जहां एक के घर का माहौल दूसरे के घर के तापमान को तय करता है। प्रशांत महासागर में होने वाले परिवर्तन जैसे एल नीनो या ला नीना हवा के दबाव, तापमान और वायुमंडलीय परिसंचरण के जरिए हिंद महासागर के व्यवहार को नियंत्रित करते हैं। यह आपसी ट्यूनिंग पूरी दुनिया, खासकर उष्णकटिबंधीय (Tropical) क्षेत्रों में बारिश के पैटर्न, सूखा, तूफान और मौसमी बदलावों को आकार देने में अहम भूमिका निभाती है। वैज्ञानिकों ने देखा कि 1980 के दशक के बाद से यह ट्यूनिंग गड़बड़ाने लगी है। प्रशांत महासागर की परिस्थितियों के आधार पर हिंद महासागर जैसा व्यवहार करता था, अब वह वैसा नहीं कर रहा है।
वैज्ञानिकों ने ऐसे खोजा सच
चूंकि इंसानों के पास वैज्ञानिक उपकरणों से दर्ज किया गया मौसम का इतिहास 100 साल से भी कम का है, इसलिए वैज्ञानिकों के सामने यह सवाल था कि क्या यह बदलाव कोई सामान्य कुदरती चक्र है या कुछ वाकई असाधारण हो रहा है? इस रहस्य को सुलझाने के लिए शोधकर्ताओं ने प्रकृति के 'टाइम कैप्सूल' की मदद ली। कोरल यानी समुद्री मूंगा, पेड़ों के तने के छल्ले और गुफाओं में पाए जाने वाले स्टैलेग्माइट्स, इनके कंप्यूटर सिमुलेशन के आधार पर वैज्ञानिकों ने सन 1600 से लेकर आज तक का 400 से अधिक सालों का डेटा तैयार किया।
जब 19वीं सदी में ज्वालामुखियों ने बिगाड़ा था रिश्ता
इतिहास खंगालने पर शोधकर्ताओं को पता चला कि पिछले 400 वर्षों में दोनों महासागर लगभग हमेशा एक-दूसरे के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते रहे। हालांकि, 1810 से 1850 के बीच एक बार यह रिश्ता जरूर कमजोर पड़ा था। 19वीं सदी की शुरुआत में उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में लगातार कई बड़े ज्वालामुखी विस्फोट (Volcanic Eruptions) हुए थे। ज्वालामुखीय राख और गैसों ने कुछ समय के लिए प्रशांत महासागर का प्रभाव हिंद महासागर पर से घटा दिया था। लेकिन जैसे ही ज्वालामुखीय प्रभाव समाप्त हुआ, दोनों महासागरों का रिश्ता फिर से बहाल हो गया।
आज का संकट अलग और भयानक क्यों है?
अध्ययन के मुख्य लेखक शॉन वांग (Shawn Wang) और सह-लेखक कैरोलीन उमेनहोफर (Caroline Ummenhofer) का कहना है कि ज्वालामुखियों द्वारा पैदा की गई रुकावट अस्थायी थी, लेकिन आज जो बदलाव हम देख रहे हैं, वह बेहद असाधारण है। वो कहती हैं कि हमारे शोध का मुख्य निष्कर्ष यह है कि इंसानों द्वारा फैलाई जा रही ग्लोबल वॉर्मिंग अब हिंद महासागर पर प्रशांत महासागर के स्वाभाविक और कुदरती प्रभाव को पूरी तरह से दबा रही है।
मौसम की भविष्यवाणियों पर इसका क्या असर पड़ेगा?
यह बदलाव सिर्फ वैज्ञानिकों की प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर हमारे और आपके जीवन पर पड़ेगा। अब तक मौसम वैज्ञानिक पुराने पैटर्न और प्रशांत महासागर के डेटा के आधार पर बारिश, मानसून और सूखे का सटीक अनुमान लगाते आए हैं। यदि दोनों महासागरों का कनेक्शन टूटता है, तो पुराने डेटा पर आधारित पूर्वानुमान गलत साबित हो सकते हैं। अध्ययन की सह-लेखिका डेलिया ओपो के अनुसार, हिंद महासागर गर्मी का एक बहुत बड़ा जलाशय है। अब यह प्रशांत महासागर की गतिविधियों से पूरी तरह आजाद होकर काम कर रहा है। हिंद महासागर का इस तरह अलग राह पकड़ना बेमौसम भारी बारिश, तटीय तूफानों और भीषण गर्मी (Heatwaves) के नए और अनिश्चित चक्रों को जन्म दे सकता है।
यह अध्ययन एक स्पष्ट चेतावनी है कि इंसानी विकास की कीमत अब प्रकृति के सबसे बड़े और पुराने तंत्र चुका रहे हैं। अगर ग्लोबल वॉर्मिंग पर जल्द काबू नहीं पाया गया, तो मौसम के अप्रत्याशित थपेड़ों का सामना पूरी दुनिया को करना पड़ेगा।
