Republic Day History: भारत सिर्फ एक भू-भाग नहीं बल्कि एक अखंड भावना है, जहां करोड़ों लोग विविधता में एकता का शानदार उदाहरण पेश करते हैं। जिस आजादी को हम जीते हैं वह कई बलिदानों के बाद हमें मिली है। जल्द ही हम 77वां गणतंत्र दिवस मनाएंगे और इसके लिए देश के हर कोने में तैयारियां जोरों पर है। दिल्ली के कर्तव्य पथ की परेड हो, या स्कूलों में देशभक्ति गानों पर बच्चों की प्रस्तुति, हम हर तरीके से अपने वतन के लिए अपनी भावना व्यक्त करना जानते हैं। आजादी मिलने का इतिहास भी रोचक है, इसी कड़ी में तारीखों का महत्व भी बदला। और शायद एक ऐसा भी है सच है जिससे आप अंजान हो.......
क्या है 26 जनवरी का सच?
लाहौर अधिवेशन (फोटो: Wikimedia Commons)
‘पूर्ण स्वराज’ का संकल्प
बता दें कि यह बात 1929 की है, जब भारत और पाकिस्तान का विभाजन नहीं हुआ था और रावी नदी के तट पर स्थित लाहौर भारत का एक प्रमुख शहर माना जाता था। उसी समय लाहौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का ऐतिहासिक अधिवेशन आयोजित हुआ, जिसकी अध्यक्षता पंडित जवाहरलाल नेहरू ने की। इस अधिवेशन में कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार से डोमिनियन स्टेटस यानी सीमित स्वशासन की मांग को त्यागते हुए पहली बार ‘पूर्ण स्वराज’ का संकल्प अपनाया। लाहौर अधिवेशन (Lahore Session) में यह भी तय किया गया कि 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा। उस दिन देशवासियों ने पहली बार तिरंगा फहराया और अंग्रेजी शासन से मुक्ति की शपथ ली। इसके बाद 1930 से 1947 यानी 17 सालों तक हर साल 26 जनवरी को भारत में प्रतीकात्मक स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता रहा।
नेताजी और स्वतंत्रता दिवस
नेताजी सुभाष चंद्र बोस के लिए 26 जनवरी सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि आजादी का प्रतीक और दृढ़ संकल्प का दिन था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब वे जर्मनी में थे, तब भी उन्होंने इस दिन को भारत के स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया। वर्ष 1943 में बर्लिन में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर नेताजी ने एक भव्य समारोह का आयोजन किया, जिसमें भारतीय छात्र, व्यापारी और प्रवासी समुदाय के लोग शामिल हुए। इस कार्यक्रम में जर्मनी, इटली और जापान के प्रतिनिधि भी मौजूद थे। 26 जनवरी 1943 को दिए गए अपने संबोधन में नेताजी ने ब्रिटिश शासन के दमनकारी स्वरूप को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उजागर किया। उन्होंने बताया कि भारत में अहिंसक आंदोलनों को किस तरह लाठियों, संगीनों, आंसू गैस और गोलियों के बल पर दबाया जाता है। उन्होंने साल 1931 की उस घटना को भी याद किया, जब कोलकाता की सड़कों पर उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया था। नेताजी ने स्पष्ट किया कि उनका कष्ट कुछ भी नहीं है, क्योंकि देश के अनेक लोगों को इससे कहीं अधिक अत्याचार झेलने पड़े, यहां तक कि गोलियों और संगीनों का भी सामना करना पड़ा।
स्वतंत्रता दिवस से गणतंत्र दिवस तक का सफर (फोटो: Wikimedia Commons)
कब बनी 26 जनवरी की डेट गणतंत्र दिवस?
इसके बाद, साल 1947 में देश को वास्तविक स्वतंत्रता 15 अगस्त को मिली, इसलिए यही दिन स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है। हालांकि, संविधान निर्माताओं खासतौर से पंडित जवाहरलाल नेहरू और डॉ. भीमराव अंबेडकर के लिए 26 जनवरी की तारीख का विशेष ऐतिहासिक महत्व था। यही वह दिन था, जिसने लगभग बीस वर्षों तक देशवासियों के मन में आज़ादी की लौ जलाए रखी थी। वे नहीं चाहते थे कि इतनी महत्वपूर्ण तिथि केवल इतिहास की पुस्तकों तक सीमित रह जाए। इसी कारण यह निर्णय लिया गया कि संविधान का निर्माण 26 नवंबर 1949 को पूरा होने के बावजूद उसे औपचारिक रूप से 26 जनवरी 1950 से लागू किया जाएगा। इस तरह 26 जनवरी को सदा के लिए गणतंत्र दिवस के रूप में स्थापित किया गया। उसी दिन भारत का संविधान लागू हुआ और देश एक गणतंत्र बना। तब से प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी को पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ गणतंत्र दिवस मनाया जाता है।
