Science News: क्या आपने कभी गौर किया है कि पिछले कुछ सालों में गर्मियों का प्रकोप पहले से कहीं ज्यादा बेकाबू और मौसम का मिजाज अजीब क्यों हो गया है? हम अक्सर सुनते हैं कि "तापमान बढ़ रहा है", लेकिन अब विज्ञान ने एक ऐसा कड़वा सच उजागर किया है जो इससे कहीं ज्यादा खतरनाक है, धरती न केवल गर्म हो रही है, बल्कि उसके गर्म होने की रफ्तार भी अब दोगुनी गति से तेज हो चुकी है। जर्मनी के प्रतिष्ठित पोट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इंपैक्ट रिसर्च (PIK) द्वारा किए गए एक ऐतिहासिक अध्ययन में पहली बार सांख्यिकीय रूप से यह साबित हुआ है कि 2015 के आसपास से ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार में एक बड़ा और अभूतपूर्व उछाल आया है। आधुनिक तापमान रिकॉर्ड की शुरुआत यानी 1880 के बाद से पृथ्वी कभी भी इतनी तेजी से नहीं तपी, जितनी तेजी से वह पिछले एक दशक में गर्म हुई है। वैज्ञानिक पत्रिका जिओफिजिकल रिसर्च लेटर्स (Geophysical Research Letters) में प्रकाशित इस शोध ने पूरी दुनिया के पर्यावरणविदों और नीति निर्माताओं की नींद उड़ा दी है।
पोट्सडैम इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट में हुआ खुलासा
जब 'वार्मिंग स्पीड' हुई लगभग दोगुनी
अध्ययन के अनुसार, 2015 के बाद यानी करीब पिछले 10 सालों में पृथ्वी का तापमान लगभग 0.35°C प्रति दशक की खतरनाक दर से बढ़ा है।1970 से 2015 के बीच पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 0.2°C प्रति दशक से कम की दर से बढ़ रहा था। इसका सीधा मतलब ये है कि पिछले एक दशक में ग्लोबल वार्मिंग की स्पीड लगभग दो गुनी हो चुकी है।
पिछले 10 सालों में तापमान दर हुई खतरनाक
वैज्ञानिकों ने प्राकृतिक 'शोर' को हटाकर कैसे खोजा यह सच?
ग्लोबल वार्मिंग की असली गति को समझना इतना आसान नहीं होता, क्योंकि प्रकृति समय-समय पर अपने तरीके से तापमान को ऊपर या नीचे करती रहती है।
- अल नीनो: प्रशांत महासागर की यह प्राकृतिक घटना वायुमंडल में गर्मी छोड़कर पृथ्वी को अस्थायी रूप से अधिक गर्म कर देती है।
- ज्वालामुखी विस्फोट: ज्वालामुखी से निकलने वाले कण सूरज की रोशनी को अंतरिक्ष में वापस परावर्तित कर देते हैं, जिससे अस्थायी ठंडक आती है।
- सौर चक्र (Solar Maximum): सूर्य की 11-वर्षीय सक्रियता का चक्र भी पृथ्वी तक पहुंचने वाली ऊर्जा में थोड़ा उतार-चढ़ाव लाता है।
क्या 2023 और 2024 के रिकॉर्ड तापमान ने आंकड़े बिगाड़े?
अध्ययन में एक बड़ा सवाल यह था कि क्या 2023 और 2024 में दर्ज किए गए रिकॉर्ड-तोड़ तापमान की वजह से यह ट्रेंड ज्यादा खतरनाक दिख रहा है? शोधकर्ताओं ने अल नीनो और सोलर मैक्सिमम के प्रभावों को घटाकर जब डेटा को दोबारा जांचा, तो 2023 और 2024 के तापमान आंकड़े थोड़े कम जरूर हुए, लेकिन वे फिर भी मानव इतिहास के सबसे गर्म साल ही बने रहे। इसके अलावा, वार्मिंग की गति तेज होने के संकेत 2013-2014 से ही सभी 5 प्रमुख डेटासेट्स में दिखाई देने लगे थे।
'1.5 डिग्री सेल्सियस' की सीमा टूटने का खतरा
पेरिस समझौते की 1.5°C की डेडलाइन
साल 2015 में हुए पेरिस जलवायु समझौते के तहत दुनिया के तमाम देशों ने मिलकर यह संकल्प लिया था कि वे वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी को औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर से 1.5°C से अधिक नहीं होने देंगे। लेकिन इस नए अध्ययन ने चेतावनी की घंटी बजा दी है। मुख्य अध्ययनकर्ता प्रोफेसर स्टीफन राह्मस्टॉर्फ कहते हैं कि "यदि पिछले 10 वर्षों में मापी गई तापमान बढ़ोतरी की यही रफ्तार जारी रहती है, तो 2030 से पहले ही हम पेरिस समझौते की 1.5°C की सीमा को स्थायी रूप से पार कर जाएंगे। पृथ्वी कितनी तेजी से आगे गर्म होगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम जीवाश्म ईंधनों से CO2 उत्सर्जन को कितनी जल्दी शून्य पर लाते हैं।"
भविष्य के लिए चेतावनी
यह अध्ययन हमें साफ-साफ चेतावनी देता है कि जलवायु परिवर्तन का संकट अब सिर्फ 'भविष्य की बात' नहीं रहा, बल्कि यह हमारे दरवाजे पर एक बहुत तेज गति से दस्तक दे रहा है। समय हाथ से फिसल रहा है, और यदि वैश्विक स्तर पर कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल पर तुरंत रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले दशक में मौसम के ऐसे जानलेवा मिजाज देखने को मिल सकते हैं, जिनकी कल्पना भी नहीं की गई है।
