भारत में अब उन दलितों को फिर से आरक्षण मिल सकता है, जिन्होंने दूसरे धर्म को अपना लिया है। इसके लिए सरकार ने एक आयोग का गठन किया है, जो इसपर अपनी जांच करके सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)
आयोग में ये हैं शामिल
केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार पूर्व प्रधान न्यायाधीश के जी बालकृष्णन आयोग की अध्यक्षता करेंगे। साथ ही सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी डॉ रविंदर कुमार जैन और यूजीसी सदस्य प्रो (डॉ) सुषमा यादव भी सदस्य के रूप में शामिल होंगे। आयोग को दो साल में अपनी रिपोर्ट मंत्रालय को देनी होगी।
दिल्ली में होगा मुख्यालय
अधिसूचना में, मंत्रालय ने कहा कि यह मुद्दा "मौलिक और ऐतिहासिक रूप से जटिल सामाजिक और संवैधानिक प्रश्न" है और निश्चित रूप से सार्वजनिक महत्व का एक मामला है। अधिसूचना में कहा गया है कि आयोग का मुख्यालय दिल्ली में होगा और अध्यक्ष के पदभार ग्रहण करने की तारीख से दो साल के अंदर वह अपनी रिपोर्ट सौंप देगा।
क्या कहता है संविधान
धर्म परिवर्तन करने वाले दलित काफी समय से आरक्षण की मांग कर रहे हैं। संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950, यह निर्धारित करता है कि हिंदू धर्म, सिख धर्म या बौद्ध धर्म से अलग धर्म को मानने वाले किसी भी व्यक्ति को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता है। मूल आदेश के तहत केवल हिंदुओं को वर्गीकृत किया गया था, बाद में सिखों और बौद्धों को शामिल करने के लिए इसे संशोधित किया गया था।
नया आयोग ऐसे समय में बनाया गया है जब सुप्रीम कोर्ट दलित ईसाइयों की राष्ट्रीय परिषद (एनसीडीसी) द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा है। बता दें कि के जी बालकृष्णन उच्चतम न्यायालय के पहले दलित प्रधान न्यायाधीश थे। वह भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।
एजेंसी इनपुट के साथ
