भारतीय राजनीति में जब भी कोई विधायक या सांसद पार्टी बदलता है,तो सबसे पहले संविधान की 10वीं अनुसूची और दल-बदल विरोधी कानून की चर्चा शुरू हो जाती है। अब एक बार फिर इसी की चर्चाएं हो रही हैं। इन चर्चाओं की वजह है शिवसेना (यूबीटी) के 6 और टीएमसी के 20 सांसदों द्वारा हाल ही में बागी रुख अपनाना और पार्टी बदलना। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद बदले राजनीतिक परिदृश्य ने एक बार फिर संविधान की 10वीं अनुसूची और दल-बदल कानून की व्याख्या की समीक्षा की मांग शुरू हो गई है। अब वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल कर 10वीं अनुसूची के पैराग्राफ-4(विलय संबंधी प्रावधान) की व्याख्या पर पुनर्विचार की मांग की है। उनकी मांग के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी इस याचिका को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई है।
ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर संविधान की 10वीं अनुसूची क्या है, इसे क्यों बनाया गया, यह कैसे काम करती है और सुप्रीम कोर्ट में आखिर किस मुद्दे पर नई बहस शुरू होने जा रही है।
संविधान की 10वीं अनुसूची में क्या है?
संविधान की 10वीं अनुसूची वह संवैधानिक व्यवस्था है, जिसके तहत सांसदों और विधायकों के दल-बदल को नियंत्रित किया जाता है। इसे आमतौर पर Anti-Defection Law (दल-बदल विरोधी कानून) कहा जाता है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जनता जिस राजनीतिक दल के उम्मीदवार को चुनकर संसद या विधानसभा भेजती है, वह व्यक्तिगत लाभ या राजनीतिक अवसरवाद के कारण बीच कार्यकाल में पार्टी न बदले। इसका मकसद निर्वाचित सरकारों को अस्थिर होने से बचाना और लोकतांत्रिक जनादेश की रक्षा करना भी है।इसे संविधान में कब और क्यों जोड़ा गया?
भारत के शुरुआती दशकों में दल-बदल की घटनाएं लगातार बढ़ रही थीं। 1960 और 1970 के दशक में कई राज्यों में विधायक बार-बार पार्टियां बदल रहे थे। हरियाणा के विधायक गया लाल ने एक ही दिन में कई बार पार्टी बदली थी, जिसके बाद "आया राम, गया राम" राजनीति का प्रतीक बन गया। इसी समस्या से निपटने के लिए तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 के जरिए संविधान में 10वीं अनुसूची जोड़ी। बाद में 91वें संविधान संशोधन (2003) के माध्यम से इसमें कुछ अहम बदलाव किए गए,ताकि सामूहिक दल-बदल के नाम पर कानून का दुरुपयोग कम किया जा सके।दल-बदल कानून के तहत कब सदस्यता खत्म हो सकती है?
10वीं अनुसूची के अनुसार किसी सांसद या विधायक को कई परिस्थितियों में अयोग्य घोषित किया जा सकता है।- सबसे पहला आधार यह है कि यदि कोई निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है। दिलचस्प बात यह है कि केवल लिखित इस्तीफा देना ही पार्टी छोड़ना नहीं माना जाता। यदि किसी सदस्य का आचरण यह दर्शाता है कि उसने व्यवहारिक रूप से पार्टी छोड़ दी है,तो भी उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है।
- दूसरी स्थिति तब बनती है,जब कोई सांसद या विधायक सदन में अपनी पार्टी के व्हिप (Whip) के खिलाफ मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है और पार्टी उसे इसकी अनुमति नहीं देती। ऐसे मामलों में भी दल-बदल कानून लागू हो सकता है।
- निर्दलीय उम्मीदवारों के लिए नियम और भी सख्त हैं। यदि कोई निर्दलीय विधायक या सांसद चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है,तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है।
वहीं, मनोनीत सदस्यों को शपथ लेने के छह महीने के भीतर किसी राजनीतिक दल में शामिल होने की छूट होती है। यदि वे इसके बाद किसी दल का सदस्य बनते हैं, तो उन पर भी दल-बदल कानून लागू हो सकता है।
राजनीतिक दलों के विलय का प्रावधान क्या है?
अब बात करते हैं राजनीतिक दलों के विलय के लिए संवैधानिक प्रावधानों की। यही वह प्रावधान है,जिस पर फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में नई बहस शुरू होने जा रही है। बता दें कि संविधान की 10वीं अनुसूची के पैराग्राफ-4 में राजनीतिक दलों के विलय के लिए व्यवस्था की गई है। इसके अनुसार अगर किसी राजनीतिक दल के विधायी दल (Legislature Party) के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्य किसी दूसरे दल में विलय का फैसला करते हैं, तो उन्हें दल-बदल कानून के तहत अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा।
इसका उद्देश्य यह था कि यदि वास्तव में किसी राजनीतिक दल का सामूहिक और वैध विलय होता है, तो उसमें शामिल सांसदों और विधायकों को दंडित न किया जाए। लेकिन समय के साथ इस प्रावधान के इस्तेमाल को लेकर कई विवाद सामने आए हैं। आलोचकों का कहना है कि कई बार राजनीतिक दलों के वास्तविक विलय के बजाय केवल विधायकों या सांसदों के समूह को दूसरे दल में शामिल कराकर इस प्रावधान का लाभ लिया जाता है।
दो-तिहाई सदस्यों का नियम कैसे लागू होता है?
पैराग्राफ-4 के तहत सबसे महत्वपूर्ण शर्त दो-तिहाई बहुमत की है। मान लीजिए किसी पार्टी के विधानसभा में 30 विधायक हैं। यदि इनमें से कम-से-कम 20 विधायक सामूहिक रूप से किसी दूसरे दल में विलय का फैसला करते हैं, तो वे दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता से बच सकते हैं। लेकिन यदि केवल 10 या 12 विधायक पार्टी छोड़कर दूसरे दल में चले जाते हैं, तो वे दो-तिहाई संख्या पूरी नहीं कर पाएंगे और उनकी सदस्यता पर खतरा पैदा हो सकता है।पहले कानून में एक-तिहाई सदस्यों के अलग होकर नया समूह बनाने (Split) को भी मान्यता थी,लेकिन 2003 के 91वें संविधान संशोधन के जरिए इस प्रावधान को समाप्त कर दिया गया। अब केवल दो-तिहाई सदस्यों के साथ होने वाले विलय को ही कानूनी संरक्षण प्राप्त है।
स्पीकर या चेयरमैन की क्या भूमिका होती है?
दल-बदल से जुड़े मामलों में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार संबंधित सदन के स्पीकर या चेयरमैन के पास होता है। अगर किसी सांसद या विधायक के खिलाफ दल-बदल की शिकायत की जाती है, तो स्पीकर या चेयरमैन तथ्यों की जांच करते हैं और यह तय करते हैं कि संबंधित सदस्य को अयोग्य घोषित किया जाए या नहीं। हालांकि,पहले स्पीकर का फैसला अंतिम माना जाता था,लेकिन 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने Kihoto Hollohan v. Zachillhu मामले में स्पष्ट किया कि स्पीकर का निर्णय न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में आएगा। यानी अगर किसी पक्ष को स्पीकर के फैसले पर आपत्ति है,तो वह अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है।
अब कपिल सिब्बल सुप्रीम कोर्ट से क्या चाहते हैं?
वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने व्यक्तिगत क्षमता में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर 10वीं अनुसूची के पैराग्राफ-4 की व्याख्या पर पुनर्विचार की मांग की है। उनका तर्क है कि मौजूदा व्याख्या के कारण संसद और विधानसभाओं की संरचना उस तरीके से बदल रही है,जिसकी संविधान निर्माताओं ने कल्पना नहीं की थी। उनका कहना है कि अदालत को यह स्पष्ट करना चाहिए कि विलय संबंधी प्रावधान का वास्तविक अर्थ क्या है और इसका दायरा कितना है।सिब्बल ने अदालत को यह भी बताया है कि इसी मुद्दे से जुड़ी अन्य याचिकाएं भी सुप्रीम कोर्ट में पहले से लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई है।