Waqf Board Supreme Court Hearing: सुप्रीम कोर्ट पर वक्फ कानून पर बुधवार को भी सुनवाई हो रही है। आज केंद्र सरकार की ओर से वक्फ कानून के सपोर्ट में दलीलें रखी जा रही हैं। केंद्र ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कोई भी व्यक्ति सरकारी जमीन पर अधिकार का दावा नहीं कर सकता है और उसे कानूनी रूप से वक्फ द्वारा उपयोगकर्ता सिद्धांत का उपयोग करके वक्फ घोषित की गई संपत्तियों को पुनः प्राप्त करने का अधिकार है। उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ एक ऐसी अवधारणा है, जहां किसी संपत्ति को औपचारिक दस्तावेज के बिना भी धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए उसके दीर्घकालिक उपयोग के आधार पर वक्फ के रूप में मान्यता दी जाती है।
वक्फ कानून पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
केंद्र की दलील
वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली दलीलों का जवाब देते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ के समक्ष केंद्र की ओर से अपनी दलीलें पेश करना शुरू किया। शीर्ष विधि अधिकारी ने कहा- "किसी को भी सरकारी जमीन पर अधिकार नहीं है।" उन्होंने कहा- "सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला है, जिसमें कहा गया है कि अगर संपत्ति सरकार की है और उसे वक्फ घोषित किया गया है, तो सरकार उसे बचा सकती है।"
क्या-क्या दिए तर्क
शुरुआत में विधि अधिकारी ने कहा कि किसी भी प्रभावित पक्ष ने अदालत का रुख नहीं किया है। उन्होंने संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट और इस तथ्य का हवाला दिया कि अधिनियम के अस्तित्व में आने से पहले कई राज्य सरकारों और राज्य वक्फ बोर्डों से परामर्श किया गया था। पीठ ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों पर केंद्र से जवाब मांगा कि जिला कलेक्टर से ऊपर के रैंक का कोई अधिकारी इस आधार पर वक्फ संपत्तियों पर दावा तय कर सकता है कि वे सरकारी हैं। विधि अधिकारी ने कहा- "यह न केवल भ्रामक है बल्कि एक गलत तर्क है।"
मामले की सुनवाई जारी है...
मंगलवार को क्या-क्या हुआ
- केंद्र ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय में वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 का बचाव करते हुए कहा कि वक्फ अपने स्वभाव से ही एक ‘‘धर्मनिरपेक्ष अवधारणा’’ है और इसके पक्ष में ‘‘संवैधानिकता की धारणा’’ को देखते हुए इस पर रोक नहीं लगाई जा सकती। केंद्र ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के माध्यम से प्रधान न्यायाधीश बी आर गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ के समक्ष प्रस्तुत अपने लिखित नोट में उन मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया, जो अदालत ने पहले उठाए थे और कहा कि इस कानून का उद्देश्य केवल धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए वक्फ प्रशासन के धर्मनिरपेक्ष पहलुओं को विनियमित करना है। उन्होंने कहा कि इस पर रोक लगाने की कोई ‘‘तात्कालिक आवश्यकता’’ नहीं है।
- उच्चतम न्यायालय ने कानून के पक्ष में ‘‘संवैधानिकता की अवधारणा’’ को रेखांकित करते हुए मंगलवार को कहा कि वक्फ कानून को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं को अंतरिम राहत के लिए एक ‘मजबूत और स्पष्ट’ मामले की आवश्यकता है। मामले की सुनवाई के दौरान जब वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कानून के खिलाफ अपना पक्ष रखना शुरू किया तो प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘प्रत्येक कानून के पक्ष में ‘संवैधानिकता की अवधारणा’ होती है। अंतरिम राहत के लिए आपको बहुत मजबूत और स्पष्ट मामला बनाना होगा, अन्यथा संवैधानिकता की अवधारणा बनी रहेगी।’’
- सिब्बल ने सवाल किया कि अधिकारी सदियों पहले की गई वक्फ संपत्ति के लिए दस्तावेजी साक्ष्य या विलेख की मांग कैसे कर सकते हैं, जबकि 1954 से पहले और विशेष रूप से 1923 के बाद पंजीकरण अनिवार्य हो सका था, लेकिन इसका अभाव वक्फ की प्रकृति को नकार नहीं सकता।
- सिब्बल ने कहा, ‘‘लेकिन 2025 का संशोधन (धारा तीन-डी) संरक्षित स्मारकों की वक्फ घोषणाओं को अमान्य करता है। उन्होंने कहा कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) 25 और 26 (धर्म का पालन करने और प्रचार करने के अधिकार) का उल्लंघन करता है। सिब्बल ने कहा कि यदि संशोधित प्रावधानों को लागू करने की अनुमति दी गई, तो इससे अपूरणीय क्षति होगी, विशेषकर उन प्रावधानों को, जो न्यायिक निर्णय के बिना जांच लंबित रहने तक वक्फ संपत्तियों को अपने निंयत्रण में लेने की अनुमति देते हैं।
- उन्होंने कहा कि पूर्ववर्ती वक्फ अधिनियमों के तहत पंजीकरण अनिवार्य था, लेकिन पंजीकरण न कराने से संपत्ति की धार्मिक प्रकृति में कोई बदलाव नहीं आता था, जबकि संशोधित कानून के तहत ऐसा नहीं है। सिब्बल ने कहा कि पहले वक्फ के लिए पंजीकरण की आवश्यकता नहीं थी, लेकिन नए कानून के तहत यदि मुतवल्ली (संरक्षक) संपत्ति के बारे में संतोषजनक जवाब नहीं दे पाता है तो उसे छह महीने की जेल हो सकती है।
