अदालती लड़ाई में भी उद्धव ठाकरे की राह आसान नहीं, सरकार बनाने के लिए प्रयोग करना पड़ा भारी

  • Authored by: ललित राय
  • Updated Mar 17, 2023, 07:30 AM IST

Uddhav Thackeray News: चुनाव आयोग के फैसले के बाद शिवसेना पर हक एकनाथ शिंदे का है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से साफ है कि उद्धव ठाकरे को झटका लगा है। सवाल यह कि क्या एनसीपी-कांग्रेस के साथ उद्धव ठाकरे का जाना बुनियादी भूल थी जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है।

Uddhav Thackeray News: उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र में जब महाविकास अघाड़ी के तले मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हुए तो उम्मीद भी नहीं रही होगी उनका अपना विश्वस्त(एकनाथ शिंदे) ही कुर्सी का दावेदार बन जाएगा। ठाकरे के हाथ से ना सिर्फ सत्ता गई बल्कि पार्टी से हाथ धो बैठे। बाला साहेब ठाकरे की पहचान का असली मालिक अब एकनाथ शिंदे(Eknath Shinde) हैं। चुनाव आयोग में शिवसेना बनाम शिवसेना की लड़ाई में उद्धव ठाकरे अपनी बात सही तरह से नहीं रख पाए। चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ उनकी अर्जी सुप्रीम कोर्ट में है। इसके साथ ही अदालत उस मामले की सुनवाई कर रही है जिसमें एकनाथ शिंदे के सीएम बनने को असंवैधानिक बताया गया है। पांच जजों की संवैधानिक पीठ(चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ अगुवाई कर रहे हैं) ने तत्कालीन राज्यपाल बी एस कोश्यारी की भूमिका पर जहां सवाल उठाया वहीं उद्धव ठाकरे पक्ष से पूछा कि जब आपने विश्वास मत का सामना ही नहीं किया तो सराकर को दोबारा स्थापित करने की बात ही कहां आती है। अदालत(Supreme court on Shivsena) की इस टिप्पणी से साफ है कि उन्हें राहत नहीं मिलने वाली। संवैधानिक पीठ ने यह भी कहा कि अगर राज्यपाल के फैसले में दोष निकाला भी जाए उस सूरत में भी आपको दोबारा कुर्सी नहीं मिल सकती।

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उद्धव ठाकरे

सुप्रीम कोर्ट में जिरह

चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने उद्धव ठाकरे की वकील अभिषेक मनु सिंघवी से कहा कि यह एक तार्किक बात होती अगर आप विधानसभा के पटल पर विश्वास मत खो देते। फिर स्पष्ट रूप से आपको एक विश्वास मत के कारण सत्ता से बेदखल कर दिया गया है जिसे अलग कर दिया गया है। हमारी समस्या है, बौद्धिक पहेली को देखें। ऐसा नहीं है कि आपको राज्यपाल द्वारा गलत तरीके से बुलाए गए विश्वास मत के कारण सत्ता से बेदखल किया गया है। आपने किसी भी कारण से नहीं चुना आप विश्वास मत का सामना नहीं करना चाहते थे।सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ के मुताबिक ठाकरे को फिर से नियुक्त करने का मतलब उस सरकार को बहाल करना होगा, जिसने स्वीकार किया था कि वह राज्य विधानमंडल में अल्पसंख्यक थी। पीठ ने आश्चर्य जताते हुए कहा कि अ दालत एक ऐसे मुख्यमंत्री को कैसे बहाल कर सकती है, जिसने शक्ति परीक्षण का सामना भी नहीं किया हो। यह पूछे जाने पर कि क्या ठाकरे ने इसलिए पद छोड़ा क्योंकि उन्हें विश्वास मत का सामना करने के लिए कहा गया था। इस सवाल के जवाब में सिंघवी कहा कि उद्धव ठाकरे ने पहले सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी और अदालत द्वारा विश्वास मत को आगे बढ़ाने के बाद ही इस्तीफा दिया था।

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