सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अकोला दंगों में घायल नाबालिग मोहम्मद अफजल मोहम्मद शरीफ के मामले की सुनवाई करते हुए महाराष्ट्र पुलिस को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि एक बार पुलिसकर्मी वर्दी पहन ले तो उसे धर्म और जाति के सभी भेदभाव से ऊपर उठकर केवल कानून के हिसाब से काम करना चाहिए। अदालत ने इस मामले में जांच की ढिलाई पर गंभीर नाराजगी जताई और महाराष्ट्र के गृह सचिव को आदेश दिया कि एक विशेष जांच दल (SIT) बनाया जाए। इस SIT में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों से वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शामिल किए जाएंगे ताकि जांच निष्पक्ष और भरोसेमंद हो सके।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ कहा कि पुलिस ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। जिस तरह एक नाबालिग को गंभीर रूप से घायल किया गया और फिर भी एफआईआर दर्ज नहीं हुई, वह कानून के शासन पर सवाल उठाता है। अदालत ने कहा कि पुलिस की यह जिम्मेदारी है कि किसी भी हमले या अपराध की पूरी जांच करे, चाहे पीड़ित या आरोपी किसी भी धर्म या जाति से ताल्लुक रखता हो।
क्या है पूरा मामला?
13 मई 2023 को महाराष्ट्र के अकोला शहर में एक सोशल मीडिया पोस्ट के बाद हिंसा भड़क गई थी। पुराने शहर इलाके में दंगे के दौरान झड़पें हुईं। इसी दौरान 17 साल के मोहम्मद अफजल मोहम्मद शरीफ पर राजेश्वर पुल पर हमला किया गया। अफजल अपने स्कूटर से जा रहा था। उसने देखा कि कुछ लोग एक व्यक्ति पर तलवार और लोहे की पाइप से हमला कर रहे हैं। जैसे ही अफजल रुका, हमलावरों ने उसे भी निशाना बनाया। सिर और गर्दन पर वार किया गया और उसके स्कूटर को जला दिया गया। अफजल गंभीर रूप से घायल होकर बेहोश हो गया। बाद में उसे अस्पताल ले जाया गया।
इसी हिंसा के दौरान विलास महादेव राव गायकवाड़ नामक व्यक्ति की मौत हो गई। वह राजेश्वर पुल के पास हमले का शिकार हुआ था। बाद में उसके परिवार ने उसे खोजा तो पुल पर उसकी चप्पल मिली और उसी आधार पर मामला दर्ज किया गया।
महाराष्ट्र पुलिस पर लापरवाही का आरोप
अस्पताल में पुलिस ने अफजल का बयान दर्ज किया था। लेकिन एफआईआर दर्ज करने और जांच आगे बढ़ाने की बजाय मामला दबा दिया गया। अफजल का कहना है कि पुलिस को सारी जानकारी थी, फिर भी कोई कार्रवाई नहीं की गई। उसकी जला हुआ स्कूटर भी घटनास्थल से बरामद हुआ, जिसका इंजन नंबर भी रिकॉर्ड में था, लेकिन पुलिस ने उस दिशा में भी कोई जांच नहीं की। याचिका में कहा गया है कि पुलिस ने जानबूझकर हत्या के मामले को अलग कर दिया और अफजल पर हमले की घटना को नजरअंदाज किया। आरोप यह भी है कि पुलिस ने घटनास्थल तक बदल दिया ताकि उनकी जांच पर सवाल न उठें।
नागपुर हाई कोर्ट ने राहत क्यों नहीं दी थी?
अफजल ने पहले बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच का रुख किया था। लेकिन वहां याचिका खारिज कर दी गई। हाई कोर्ट ने कहा कि अगर पुलिस कार्रवाई नहीं कर रही है तो मजिस्ट्रेट से आदेश लिया जा सकता है। साथ ही, हाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि अफजल की गवाही हत्या के केस में आरोपियों को फायदा पहुंचा सकती है। इस टिप्पणी को अफजल ने पूरी तरह गलत बताया और कहा कि वह खुद पीड़ित हैं, न कि केवल गवाह।
सुप्रीम कोर्ट में आज क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील अभय महादेव थिप्से ने दलील दी कि अफजल खुद हमले का शिकार हैं और उनकी चोटें मेडिकल रिकॉर्ड में दर्ज हैं। उन्होंने कहा कि पुलिस का रवैया पक्षपातपूर्ण रहा और यह साफ है कि स्थानीय पुलिस निष्पक्ष जांच नहीं कर सकती। अदालत ने इन दलीलों को गंभीरता से लेते हुए कहा कि पीड़ित की बात सुनी जानी चाहिए और उसे न्याय मिलना चाहिए। अदालत ने इस दौरान यह भी जोड़ा कि पुलिस का कर्तव्य है कि वह बिना किसी पूर्वाग्रह के जांच करे।
सुप्रीम कोर्ट ने दिया SIT गठित करने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के गृह सचिव को निर्देश दिया कि मामले की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) बनाया जाए। यह टीम वरिष्ठ अधिकारियों से बनेगी और इसमें हिंदू तथा मुस्लिम दोनों समुदायों से अधिकारी शामिल होंगे। अदालत ने कहा कि इससे जांच पर किसी तरह का पक्षपात या भेदभाव का शक नहीं रहेगा।
पीड़ित की क्या थी मांग और उम्मीद?
अफजल ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की थी कि हाई कोर्ट का आदेश रद्द किया जाए और मामले की जांच स्वतंत्र एजेंसी को सौंपी जाए। अदालत ने फिलहाल सीबीआई को न भेजते हुए SIT गठित करने का आदेश दिया है। पीड़ित परिवार को उम्मीद है कि अब निष्पक्ष जांच होगी और हमलावरों को सजा मिलेगी।
