Ayushman Bharat Yojana: सुप्रीम कोर्ट में कल एक अहम जनहित याचिका पर सुनवाई होगी जिसमें केंद्र सरकार से मांग की गई है कि आयुष्मान भारत योजना में भारतीय चिकित्सा पद्धतियों- आयुर्वेद, योग और नेचुरोपैथ को भी शामिल किया जाए। यह याचिका वकील और सामाजिक कार्यकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने दायर की है।
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
उपाध्याय का कहना है कि यह योजना अभी केवल एलोपैथिक इलाज तक सीमित है, जबकि भारत की परंपरागत चिकित्सा पद्धतियां न सिर्फ बीमारियों का इलाज करती हैं, बल्कि उनसे बचाव पर भी जोर देती हैं।
याचिकाकर्ता की दलील: मौलिक अधिकार का उल्लंघन
याचिका में दलील दी गई है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार मिला है। जब करोड़ों लोग आयुर्वेद और योग का उपयोग करते हैं और इनसे इलाज पाते हैं तो सरकार का दायित्व है कि इन्हें भी राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजनाओं में शामिल करे। मौजूदा स्थिति में केवल एलोपैथिक डॉक्टर और अस्पताल ही लाभान्वित हो रहे हैं, जबकि देश के लाखों आयुष चिकित्सक और करोड़ों मरीज योजना से बाहर रह जाते हैं।
कोविड महामारी में आयुष की बड़ी भूमिका
कोविड महामारी के दौरान आयुर्वेदिक दवाइयों, काढ़ों और योग अभ्यास ने लाखों लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद की। आयुष मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, उस समय बड़ी संख्या में मरीजों ने योग और आयुर्वेद से लाभ लिया। कई शोध पत्रों में यह सामने आया कि आयुष पद्धतियों ने मरीजों की रिकवरी और मानसिक स्वास्थ्य सुधार में अहम भूमिका निभाई।
याचिका में कहा गया है कि जब आपातकालीन स्थिति में इन पद्धतियों पर भरोसा किया गया तो सामान्य स्वास्थ्य योजना में इन्हें शामिल न करना जनहित के खिलाफ है।
देशभर में आयुष के पास मौजूद है बड़ा ढांचा
भारत में 8 लाख से ज्यादा आयुष डॉक्टर हैं, जिनमें से लगभग 5 लाख आयुर्वेद से जुड़े हैं। इसके अलावा 12,000 से ज्यादा आयुष हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर काम कर रहे हैं। हर साल करोड़ों मरीज यहां इलाज कराते हैं। देशभर में 800 से ज्यादा आयुष कॉलेज भी चल रहे हैं जहां नए डॉक्टर तैयार हो रहे हैं। याचिकाकर्ता ने कहा कि इतना बड़ा नेटवर्क होते हुए भी इसे आयुष्मान भारत योजना से बाहर रखना देश की स्वास्थ्य जरूरतों के खिलाफ है।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और केंद्र से सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई में इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने कहा कि यह मामला सीधे तौर पर जनता के स्वास्थ्य से जुड़ा है और सरकार को स्पष्ट करना होगा कि अब तक आयुष पद्धतियों को क्यों शामिल नहीं किया गया।
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योग और आयुर्वेद को मान्यता मिल चुकी है तो राष्ट्रीय स्तर पर इन्हें स्वास्थ्य योजनाओं का हिस्सा क्यों नहीं बनाया गया। इस पर अब 22 सितंबर को विस्तृत सुनवाई होगी।
आर्थिक और सामाजिक स्थिति के हिसाब से है बेहतर
याचिकाकर्ता का तर्क है कि आयुष को योजना में शामिल करने से गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को सस्ती और असरदार स्वास्थ्य सेवाएं मिलेंगी। वर्तमान में आयुष इलाज किफायती है और मरीजों पर ज्यादा आर्थिक बोझ नहीं डालता। अगर सरकार इसे बढ़ावा देती है तो लाखों आयुष डॉक्टरों को रोजगार और प्रैक्टिस का नया अवसर मिलेगा। साथ ही आयुर्वेदिक औषधि उद्योग और आयुष शिक्षा संस्थानों को भी मजबूती मिलेगी।
