देश में चुनावी फंडिंग और उसमें पारदर्शिता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आज, सोमवार को एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई होने जा रही है। इस याचिका में आयकर अधिनियम, 1961 के उस कानूनी प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है, जो राजनीतिक दलों को 2,000 रुपये तक का 'गुमनाम' नकद चंदा स्वीकार करने की छूट देता है। सुप्रीम कोर्ट की कार्यसूची के अनुसार, इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ करने वाली है।
जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ करेगी सुनवाई
क्या है याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क?
खेम सिंह भाटी द्वारा दायर इस याचिका में मांग की गई है कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिए नकद चंदे के इस रास्ते को पूरी तरह बंद किया जाए। याचिका में कहा गया है कि चंदे के स्रोतों और चंदा देने वालों की पहचान गुप्त रहने से चुनावी प्रक्रिया की शुचिता प्रभावित होती है। इससे आम मतदाता यह जानने से वंचित रह जाता है कि किस पार्टी को कौन और किस उद्देश्य से फंड दे रहा है। चंदे की जानकारी न होने से मतदाता वोट डालते समय पूरी तरह से जानकारीयुक्त और समझदारी भरा फैसला नहीं ले पाते। याचिका में शीर्ष अदालत के 2024 के उस ऐतिहासिक फैसले का भी उल्लेख किया गया है, जिसके तहत असंवैधानिक करार देते हुए 'इलेक्टोरल बॉन्ड योजना' को रद्द कर दिया गया था।
आयकर कानून की धारा 13A (d) को रद्द करने की मांग
याचिका में मुख्य रूप से आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 13A की उपधारा (d) को असंवैधानिक घोषित कर रद्द करने का अनुरोध किया गया है। यह धारा राजनीतिक दलों की आय पर विशेष छूट से संबंधित है। इसके तहत दलों को मिलने वाले ऐच्छिक अंशदान, प्रतिभूतियों पर ब्याज और अचल संपत्ति की आय को कुल कर योग्य आय में शामिल करने से छूट मिलती है। याचिका में मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग को निर्देश दे कि किसी भी राजनीतिक दल के पंजीकरण और चुनाव चिन्ह के आवंटन के लिए यह अनिवार्य शर्त तय की जाए कि वे नकद में कोई भी रकम स्वीकार नहीं करेंगे।
