Super El Niño : साल 2026 के मानसूनी सीजन में बारिश की कमी ने सूखे की आहट दे दी है। माना जा रहा है कि अल नीनो (El Niño) के कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून (South-West Mansoon) पूरी क्षमता के साथ नहीं बरसा। यही कारण है कि इस साल भारत में सामान्य के मुकाबले केवल 87.4 प्रतिशत बारिश रिकॉर्ड की गई। आशंका है कि अल-नीनो के और मजबूत होने से भारत में मूंगा (कोरल) के नष्ट होने, जंगलों में आग और बड़े वर्षावनों के पेड़ों के सूखने जैसी पर्यावरणीय समस्याएं हो सकती हैं और समुद्री तापमान में बढ़ोतरी आ सकती है। वैज्ञानिक अनुमान लगा रहे हैं इसके असर से सर्दी देर से एंट्री लेगी या न्यूनतम तापमान पर भी असर पड़ेगा। वर्तमान के हालात ये हैं कि सुपर अल-नीनो (Super El Niño) के प्रभाव से दुनिया का बड़ा मैप लाल दिखाई दे रहा है। इससे अनुमान लगाया जा रहा है कि ठंडक पर प्रतिकूल प्रभाव रहेगा। इसका असर इंसानी जमात से लेकर वन्यजीवों और समुद्री जीवों के जीवन पर भी पड़ सकता है।
सर्दियों पर अल नीनो का असर (फोटो-AI)
कितनी खतरनाक अल नीनो
सयुंक्त राष्ट्र की मौसम एजेंसी डब्ल्यूएमओ (WMO) ने अलर्ट जारी करते हुए बताया है कि अल नीनो 1950 के बाद देखी गई सबसे मजबूत घटनाओं में शामिल है। इसका असर सिर्फ तापमान पर नहीं पड़ेगा, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में बारिश, सूखा और बाढ़ का पैटर्न बदल सकता है। साथ फरवरी 2027 तक असर रहने से करीब 4.5 लाख से अतिरिक्त मौतों की भी आशंका है। यह अनुमान अल नीनो से जुड़ी अत्यधिक गर्मी और मौसम में होने वाले खतरनाक बदलावों के संभावित स्वास्थ्य प्रभावों को ध्यान में रखता है।
सुपर अल नीनो का किन राज्यों पर असर
सुपर अल नीनो (Super El Niño) के कारण सर्दियों में सामान्य से अधिक तापमान हो सकता है। इसके प्रभाव से हल्की ठंड या गर्म सर्दियों का अनुभव मिलेगा। माना जा रहा है कि उत्तर भारत में इसका अधिक प्रभाव रहेगा। खासकर, दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश में अन्य सालों के मुताबिक, शीतलहर और ठंड कमजोर हो सकती है। इससे रबी की फसल खासकर, गेहूं की पैदावार पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा है। इसके अतिरिक्त पहाड़ी राज्यों पर भी साफ असर दिखाई देगा। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में बर्फबारी में कमी आने की संभावना है। जिससे हिमालयी फसलों की पैदावार में कमी आ सकती है। इसके अतिरिक्त सर्दियों के समय वेस्टर्न डिस्टर्बेंस भी अपना 100 फीसदी असर नहीं छोड़ पाएगा।
हालांकि, अभी देश के अधिकांश राज्यों में हल्की बारिश की गतिविधियां लौट- लौटकर जारी रहने का अनुमान है, जिससे अभी से तापमान में कमी देखी जा रही है, लेकिन दिन अभी भी गर्म प्रतीत हो रहे हैं।
आपकी जानकारी के लिए बताते चलें कि अल नीनो (El Niño) और सुपर अल-नीनो (Super El Niño) दोनों ही प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) में समुद्र की सतह का तापमान बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं।
एक पूर्वानुमान के मुताबिक, साल 2026 के अंतिम महीनों के दौरान दुनिया के बड़े हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान औसत से अधिक रहने की आशंका है। मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र (Eastern Tropical Pacific Region) में अक्टूबर से दिसंबर तक समुद्र का तापमान सामान्य से 3.7 डिग्री सेल्सियस अधिक पहुंचने की उम्मीद है। एक रिपोर्ट के हवाले से जलवायु वैज्ञानिक जेक हॉसफादर ने कहा कि इस वर्ष का अल नीनो लगातार नए रिकॉर्ड की ओर से अग्रसर रहेगा। प्रभावित क्षेत्रों में तापमान सामान्य से 3.4 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है, जो इतिहास में दर्ज किसी भी पिछले अल नीनो से अधिक है।
पिछले आंकड़ों पर नजर डालें तो करीब एक दशक तक सामान्य से बेहतर मानसूनी सीजन रहा। लेकिन साल 2026 में भारतीय मानसून पर ‘सुपर अल नीनो’ का असर देखने को मिला है। यही कारण के दक्षिण-पश्चिम मानसून की अवधि में देशभर में औसत से 13 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई। हालांकि, मौसम विज्ञान के वर्गीकरण के अनुसार यह स्थिति ‘हल्के मौसम संबंधी सूखे’ (माइल्ड मेटियोरोलॉजिकल ड्राउट) की श्रेणी में रही। पूर्वी और मध्य भारत के बड़े हिस्से पर इसका प्रतिकूल प्रभाव सीमित रहा, लेकिन उत्तर और दक्षिण भारत के कुछ इलाकों में बारिश की कमी का असर गंभीर रहा।
हालांकि, साल 2001 के बाद से भारतीय मानसून छह बार सूखे की चपेट में रहा। इनमें 2026 का मौजूदा सीजन भी शामिल किया गया है। इन छह में से पांच सूखे अल नीनो की वजह से आए। इनमें 2002 और 2009 के दो गंभीर सूखे भी शामिल हैं।
रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा अल नीनो
स्काईमेट के मुताबिक, साल 2026 का अल नीनो रिकॉर्ड उपलब्ध होने के बाद से सबसे मजबूत घटनाओं में शामिल होता दिखाई दे रहा है। प्रशांत महासागर की सतह का तापमान पहले ही पिछले तीन दशकों के औसत स्तर को पार कर चुका है, जबकि इसके अभी और बढ़ने की आशंका है। समुद्र की सतह के नीचे पानी का तापमान भी सामान्य से 7 से 8 डिग्री सेल्सियस अधिक हो गया है। अल नीनो की लगातार बढ़ती ताकत संकेत दे रही है कि इसका सबसे तीव्र दौर अभी आना बाकी हो सकता है।
प्रशांत महासागर के चारों नीनो सूचकांकों में तापमान का विचलन (Deviation) या तो पहले के स्तर पर बना हुआ है या उसमें मामूली बढ़ोतरी हुई है। भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का पूर्वी हिस्सा पश्चिमी और मध्य हिस्सों की तुलना में काफी अधिक गर्म है। नीनो-4 क्षेत्र में तापमान के विचलन का नकारात्मक रहना इस घटना को ‘कैनोनिकल’ यानी पारंपरिक अल नीनो के स्वरूप के करीब रखता है।
