जब 'सोनम' से मिली थीं इंदिरा गांधी; 1984 में खुद अपने हाथों से तुड़वाया था अनशन, आखिर क्या है 42 साल पुराना इतिहास?

दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन के दौरान बिगड़ी तबीयत के बाद सोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल ले जाने की घटना ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इस घटनाक्रम के बीच 42 साल पुराना एक ऐतिहासिक प्रसंग फिर चर्चा में है। ऐसे में आइए जानते हैं 1984 के उस आंदोलन की कहानी जिसके चलते इंदिरा गांधी को लेह पहुंचा पड़ा था।

Sonam Wangchuk: आज जाने-माने जलवायु कार्यकर्ता और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) का नाम देशभर में चर्चा का मुद्दा है। उन्हें आज बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण जबरन जंतर-मंतर से हटाकर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में ले जाया गया। पुलिस ने कहा कि चिकित्सकीय सलाह और हाई कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक ही उन्हें अस्पताल ले जाया गया है। लेकिन इस घटनाक्रम के बीच एक बार फिर साल 1984 की यादें ताजा हो रही हैं। आज हम आपको उसी 42 साल के इतिहास के बारे में बताएंगे जिसकी चर्चा इन दिनों हो रही है।

Sonam Wanchuk During Protest On Jantar Mantar

सोनम वांगचुक अस्पताल पहुंचे तो ताजा हुईं 1984 की यादें

इंदिरा गांधी और सोनम वांग्याल की मुलाकात

क्या है साल 1984 का इतिहास?

आज से चार दशक पहले साल 1984 में सोनम वांगचुक के पिता और लद्दाख के वरिष्ठ नेता सोनम वांग्याल ने क्षेत्र के विभिन्न समुदायों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू किया था। लद्दाख स्टडीज में प्रकाशित उनके संस्मरणों और अन्य ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, यह आंदोलन लद्दाख के संवैधानिक अधिकारों और पहचान की लड़ाई का एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। ऐसे में उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद लेह पहुंची थीं और वांग्याल को भरोसा दिलाया था कि उनकी मांग पर विचार किया जाएगा और उन्हें अनशन समाप्त करने के लिए राजी किया था। पर 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। बाद में साल 1989 में उनके बेटे राजीव गांधी की सरकार ने लद्दाख के प्रमुख समुदायों को अनुसूचित जनजाति (SIT) का दर्जा दिया।

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