'भगवान ऐसी औलाद से तो अच्छा है बेऔलाद रहें', देखिए वृद्धाश्रम के बुजर्गों की दर्द भरी दिवाली; डबडबा जाएंगी आंखें

  • Authored by: टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल
  • Updated Jul 12, 2023, 08:42 PM IST

एक तरफ लोग दिवाली के लिए घरों में जोर शोर से तैयारियां कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसे लोग हैं जो अपने बुजुर्ग माता पिता को वृद्धाश्रमों में छोड़कर आ रहे हैं। ऐसी ही ओल्ड ऐज होम में रहने वालों से हमने बात की, देखिए ये स्पेशल रिपोर्ट-

Diwali Special: त्योहार और परिवार ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। त्योहारों की शोभा होते हैं हमारे मां-बाप। बाप यानी घर की छत और मां यानी घर का आंगन। लेकिन लगता है ये किसी और दौर की बात थी। आजकल तो इंसान अपने स्वार्थ सिद्धी में इतना मगन हो गया है कि उसे रिश्तों की, भावनाओं की कोई कद्र नहीं रह गई। परिवार में बुजुर्गों (Old Age) की बड़ी अहमियत होती है, लेकिन आजकल ऐसा कम ही देखने को मिलता है।

Old age report

देखिए बुजुर्गों की दर्दभरी दिवाली

ओल्ड ऐज होम बने सहारा

जो मां बाप अपने कई बच्चों को एक छत के नीचे प्यार से पालते हैं उन्हें ही अपने बच्चों के बुरे व्यावहार और उनके तिरस्कार से परेशान होकर अपना बुढ़ापा old age home में गुजारना पड़ रहा है। उनके इस दर्द और व्यथा को Digital talk with Munish में पूरी ईमानदारी से दिखाने की कोशिश की गई है. कैसे दिवाली में अपने बनाए गए बड़े मकानों से दूर बुजुर्गों को ओल्ड ऐज होम में जिंदगी गुजारनी पड़ रही है। ये वो मां-बाप हैं जिन्हें हर पर्व त्योहार पर बस एक ही उम्मीद रहती है कि इनके बच्चे इनसे मिलने तो आ जाएं। वापस जाने की उम्मीद तो अधिकांश बुजुर्गों की खत्म हो चुकी है।

धन्य हैं ऐसे बच्चे!

आखिर जिन बच्चों को उंगली पकड़कर कभी इन बुजुर्गों ने चलना सिखाया था, वो बच्चे ही इनकी उंगली पकड़कर इनकों आंगन नामक वृद्धाश्रम तक छोड़ गए. हमसे बात करते हुए कई बुजुर्ग मां-बाप अपने बच्चों को याद कर भावुक भी हो गए। बुजुर्गों ने बताया कैसे खून पसीने की कमाई से जिन बच्चों को पाल पोसकर बड़ा किया, उन बच्चों को ही बुढ़ापे में मां-बाप बोझ लगने लगे. समाज का ये सच बहुत डराने वाला है। नोएडा की KIDDIES FOUNDATION ऐसे बेसहारा बुजुर्गों के लिए सहारा बनने का काम कर रही है।

(मुनीष देवगन की रिपोर्ट)

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