Rajnath Singh: अयोध्या के रानोपाली स्थित उदासीन आश्रम में आयोजित गुरु पर्व महोत्सव में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि अगर योगी आदित्यनाथ दोबारा उत्तर प्रदेश की सरकार बनाते हैं, तो वह उनसे प्रदेश के सभी विद्यालयों में वैदिक गणित की पढ़ाई शुरू कराने की अपील करेंगे। उन्होंने कहा कि वैदिक गणित की अपनी विशिष्टता है और विदेशों में भी इसे पढ़ाया जाता है। रक्षा मंत्री ने योगी सरकार की कार्यप्रणाली की सराहना करते हुए कहा कि उनके संरक्षण में शासन व्यवस्था और सनातन व्यवस्था दोनों उत्कर्ष की ओर बढ़ रही हैं।
संतों के संघर्ष और राम मंदिर आंदोलन को भी किया याद (फोटो- X/Rajnath Singh)
हनुमानगढ़ी और राम मंदिर में किया दर्शन-पूजन
इससे पहले रक्षा मंत्री ने हनुमानगढ़ी और श्रीराम मंदिर में दर्शन-पूजन किया और रामलला का आशीर्वाद लिया। रानोपाली आश्रम पहुंचने पर संतों ने उनका माल्यार्पण और अंगवस्त्र भेंट कर स्वागत किया। संतों को संबोधित करते हुए राजनाथ सिंह ने अयोध्या को केवल भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि चेतना, संस्कृति और सभ्यता का केंद्र बताया। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम ने इस धरती को अपने चरणों से पवित्र किया और यहां से धर्म, न्याय और मर्यादा का संदेश पूरी दुनिया में पहुंचा।
राम मंदिर आंदोलन में संतों के योगदान को भी याद किया
इस दौरान श्री नारायण संस्कृत महाविद्यालय के नवनिर्मित भवन को देखकर उन्होंने खुशी जताई। उन्होंने कहा कि आचार संहिता लागू होने के कारण वह भवन का उद्घाटन नहीं कर सके। राजनाथ सिंह ने राम मंदिर आंदोलन में संतों के योगदान को भी याद किया और कहा कि संतों ने लंबे संघर्ष में जेल की यातनाएं सहीं और बलिदान दिए। उन्होंने संस्कृत को देव भाषा और आध्यात्म की भाषा बताते हुए कहा कि वैदिक गणित भी बेजोड़ है। उन्होंने दावा किया कि लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में भी वैदिक गणित पढ़ाई जाती है।
भारत में ज्ञान को परंपरा बनाया गया
उन्होंने अपने X हैंडल पर पोस्ट करते हुए लिखा- "अयोध्या में आयोजित श्री गुरु पर्व महामहोत्सव एवं संत सम्मेलन में सम्मिलित हुआ। उदासीन परंपरा सनातन धर्म की वह जीवंत धारा है, जिसने सदियों से भारत की आध्यात्मिक चेतना को पोषित किया है। भारत की सभ्यता की एक बड़ी विशेषता यह रही है, कि यहां ज्ञान को केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रखा गया। ज्ञान को परंपरा बनाया गया। उस परम्परा को संस्कार बनाया गया। और फिर संस्कार को, शिक्षा के माध्यम से, समाज के व्यवहार में उतारा गया। शिक्षा किसी भी सभ्यता की रीढ़ होती है। और जब शिक्षा का माध्यम संस्कृत जैसी देवभाषा हो, तो उसका महत्व और भी बढ़ जाता है।
आज जिस श्री नारायण संस्कृत महाविद्यालय को मैंने देखा, उसकी स्थापना, 1912 में बाबा श्री केशवराम जी महाराज ने की थी। यह हर्ष का विषय है कि उस परम्परा को, आज तक यहां के संत, यहाँ के आचार्य निभा रहे हैं। मैं इस अवसर पर, श्री महंत डॉ० स्वामी भरत दास जी महाराज को हृदय से बधाई देता हूं। उनके नेतृत्व में यह आश्रम निरंतर प्रगति केपथ पर अग्रसर है। ये जो पूरी परम्परा है, इसका एक महत्वपूर्ण आधार संस्कृत है। संस्कृत को केवल एक भाषा नहीं समझा जाना चाहिए। संस्कृत के पास भारत की ज्ञान-परम्परा का एक विशाल भंडार है। वेदों से लेकर उपनिषद तक, दर्शन से लेकर व्याकरण तक, आयुर्वेद से लेकर गणित तक, ज्योतिष से लेकर साहित्य तक, न्याय से लेकर मीमांसा तक, भारतीय ज्ञान-परम्परा का एक बड़ा हिस्सा, संस्कृत के माध्यमसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा, और विश्व की बौद्धिक परंपराओं को इसने समृद्ध किया है।"
