Rajasthan Assembly Election 2023: सूत्रों के मुताबिक क़रीब दो दर्जन विधायकों के टिकट कट सकते हैं जिसमें चार मंत्री के नाम भी शामिल हैं। माना जा रहा है कि कल केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक के बाद पहली लिस्ट जारी हो जाएगी। लेकिन सवाल ये कि सॉफ्ट हिंदुत्व को भुनाने के लिए कांग्रेस ने 3 राज्यों में पहले नवरात्रि पर पहली सूची तो जारी कर दी लेकिन राजस्थान में ऐसा नहीं हो सका।
गहलोत-पायलट की खींचतान ने फेरा पानी
गहलोत-पायलट की खींचतान ने फेरा पानी
टाइम्स नाउ नवभारत को मिली जानकारी के मुताबिक सीएम अशोक गहलोत की रणनीति, स्क्रीनिंग कमेटी के मशविरे और सियासी रणनीतिकार सुनील कोनूगोलू के सर्वे ने अभी तक पेंच फंसाया हुआ है। दरअसल कोनूगोलू के सर्वे ने मौजूदा विधायकों में से 50 फीसदी के टिकट काटने की सिफारिश की है, जिससे स्क्रीनिंग कमेटी भी सहमत है। लेकिन गहलोत का मानना है कि, जिन 102 विधायकों ने सचिन पायलट की बगावत के वक़्त कांग्रेस की सरकार बचाई थी, उनके टिकट न कटें।
अगर वाकई में पार्टी कोई संदेश देना चाहती है तो उन बागियों के टिकट काटे जो प्रलोभन के चलते दूसरे नाव की सवारी के लिए तैयार थे। गहलोत की इस दलील पायलट खेमे का मानना है कि अगर टिकट कटने हैं तो पार्टी के सर्वे के आधार ही काटें जिनकी जमीनी हालात खराब हैं। सिर्फ उनके ही गुट के विधायकों के टिकट काटकर जीत तय नहीं हो सकती है।
केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक के बाद लिस्ट संभावित
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत या फिर सचिन पायलट गुट की खेमेबाजी ही देरी की वजह बनती रही। इसी उधेड़बुन में अब तक राजस्थान को लेकर केंद्रीय चुनाव समिति बैठक ही नहीं हो सकी, तो भला टिकट कैसे घोषित होते। ऐसे में आखिरकार कांग्रेस आलाकमान ने हस्तक्षेप किया और मंगलवार को दिल्ली में स्क्रीनिंग कमेटी की बैठक हुई। अगले दिन ही केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में खरगे, राहुल, सोनिया की मौजूदगी में दिल्ली में बुला ली गयी है यानी उसके बाद ही राजस्थान के लिए कांग्रेस पहली सूची जारी कर देगी।
गहलोत खेमे का वर्चस्व तोड़ना चाहता है आलाकमान
सूत्रों के मुताबिक गहलोत को इस बात का एहसास है कि कांग्रेस आलाकमान मौजूदा विधायकों को टिकट देने के फार्मूले के बजाय जिताऊ उम्मीदवार पर दांव लगाने के पक्ष में ज्यादा है। यही वजह है कि मंगलवार को हुई स्क्रीनिंग कमेटी की बैठक में सीनियर ऑब्जर्वर मदुसूदन मिस्त्री की भी एंट्री कराई गई। इसका नतीजा ये हुआ कि बैठक में मौजूद प्रभारी सुखजिन्दर रन्धावा, चैयरमैन गौरव गोगोई, मुख्यमंत्री गहलोत, प्रदेश अध्यक्ष गोविंद डोटासरा की मौजूदगी में भी सचिन पायलट का पलड़ा भी भारी रहा। सूत्रों के मुताबिक, इसके जरिए आलाकमान टिकट बंटवारे में और चुनाव के बाद किसी खेमे के वर्चस्व तोड़ देना चाहता था। आलाकमान की कोशिश है कि चुनाव के बाद किसी भी खेमे के ज़्यादा विधायक होने का बजाय पार्टी नेतृत्व के साथ चलने वाले विधायकों की संख्या ज्यादा रहे। भविष्य में अगर सरकार बनती है तो कोई मुख्यमंत्री पद पर सीधा दावा न ठोंक पाए और आलाकमान के हाथ ही मजबूत रहें।
