चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के बीच जारी सियासी घमासान के बीच केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस अपने शासनकाल में चुनाव आयुक्तों को पुरस्कार और राजनीतिक पद देकर लाभ पहुंचाती रही, जबकि आज वही पार्टी चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रही है। गोयल ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एम.एस. गिल को पद्म विभूषण दिए जाने और बाद में उनके कांग्रेस में शामिल होकर केंद्रीय मंत्री बनने का उदाहरण देते हुए सवाल उठाया कि क्या यह चुनाव आयुक्तों को पुरस्कृत करने जैसा नहीं था?
पीयूष गोयल ने कांग्रेस पर लगाया बड़ा आरोप। PTI
एम.एस. गिल को पद्म विभूषण देने पर उठाए सवाल
पीयूष गोयल ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एम.एस. गिल का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें वर्ष 2000 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। यह भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। उस समय गिल मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर थे। गोयल ने सवाल उठाया कि पद पर रहते हुए किसी चुनाव आयुक्त को इतना बड़ा नागरिक सम्मान देना क्या उन्हें पुरस्कृत करने या प्रलोभन देने जैसा नहीं था?
गोयल ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने गिल के कामकाज को पुरस्कृत करने के लिए उन्हें यह सम्मान दिया। हालांकि, पद्म विभूषण दिए जाने को रिश्वत या किसी अनुचित सौदे का प्रमाण बताने के लिए स्वतंत्र साक्ष्य जरूरी हैं। यह आरोप गोयल ने राजनीतिक बहस के दौरान उठाया।
रिटायरमेंट के बाद कांग्रेस में शामिल हुए एम.एस. गिल
पीयूष गोयल ने एम.एस. गिल के राजनीतिक सफर का भी उल्लेख किया। गिल 1996 से 2001 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे थे। सेवानिवृत्ति के बाद वह वर्ष 2004 में कांग्रेस में शामिल हुए और राज्यसभा पहुंचे। बाद में 2008 में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार में उन्हें केंद्रीय मंत्री बनाया गया।
गोयल ने इन घटनाओं को जोड़ते हुए सवाल किया कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर रहते हुए सम्मानित किए जाने और बाद में कांग्रेस सरकार में मंत्री बनने के घटनाक्रम पर सवाल नहीं उठने चाहिए? बीजेपी नेता ने इसे कांग्रेस के दोहरे मापदंड का उदाहरण बताया।
आर.के. त्रिवेदी को राज्यपाल बनाए जाने का भी जिक्र
पीयूष गोयल ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त आर.के. त्रिवेदी का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि त्रिवेदी का मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्यकाल 31 दिसंबर 1985 को समाप्त हुआ था और इसके बाद 26 फरवरी 1986 को उन्हें गुजरात का राज्यपाल नियुक्त किया गया।
गोयल ने इस नियुक्ति का हवाला देते हुए कांग्रेस के शासनकाल में चुनाव आयोग के अधिकारियों को सेवानिवृत्ति के बाद दिए गए पदों पर सवाल उठाए। उनके मुताबिक, ऐसे मामलों को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस को मौजूदा चुनाव आयोग पर सवाल उठाने से पहले अपने पुराने रिकॉर्ड पर भी विचार करना चाहिए।
टी.एन. शेषन को कांग्रेस ने दिया था टिकट
बीजेपी नेता ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन का भी उल्लेख किया। शेषन को चुनाव सुधारों और चुनाव आयोग की सख्ती के लिए जाना जाता है। वर्ष 1999 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें दिल्ली में बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ उम्मीदवार बनाया था। गोयल ने सवाल किया कि अगर कांग्रेस शेषन की निष्पक्षता और कार्यशैली की प्रशंसा करती थी, तो बाद में उन्हें पार्टी का उम्मीदवार बनाना क्या राजनीतिक लाभ देने जैसा नहीं था? उन्होंने इस उदाहरण के जरिए कांग्रेस के मौजूदा रुख पर सवाल खड़े किए।
नवीन चावला की नियुक्ति को लेकर भी कांग्रेस पर निशाना
पीयूष गोयल ने पूर्व चुनाव आयुक्त नवीन चावला की नियुक्ति का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2005 में चावला को चुनाव आयुक्त बनाए जाने पर विवाद हुआ था और इस मामले में तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व को लेकर भी सवाल उठे थे। गोयल ने इन उदाहरणों के आधार पर आरोप लगाया कि कांग्रेस अपने शासनकाल में चुनाव आयोग की नियुक्तियों और अधिकारियों को दिए गए पदों को लेकर अलग रुख अपनाती थी, जबकि अब वही पार्टी आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रही है।
चुनाव आयोग को लेकर बीजेपी-कांग्रेस में सियासी टकराव
पीयूष गोयल का यह बयान ऐसे समय आया है, जब राहुल गांधी और विपक्षी INDIA ब्लॉक के नेता कथित वोट चोरी, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
वहीं, बीजेपी का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने चुनाव आयोग को स्वतंत्र रूप से काम करने की स्वायत्तता दी है। गोयल ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वह मौजूदा चुनाव आयोग पर सवाल उठाते समय अपने शासनकाल में हुई नियुक्तियों और सम्मान से जुड़े मामलों को नजरअंदाज कर रही है।
फिलहाल, चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। गोयल के आरोपों और उनके द्वारा दिए गए उदाहरणों के बीच यह अंतर समझना जरूरी है कि किसी अधिकारी को सम्मान या बाद में राजनीतिक पद मिलना अपने आप में रिश्वत या अनुचित लाभ का प्रमाण नहीं है।
