सांसद राघव चड्ढा ने कहा कि यह मुद्दा खासकर टियर-2 या टियर-3 शहरों के लिए अहम है, जहां रेफरल कमीशन एक अनौपचारिक अर्थव्यवस्था (informal economy) बनता जा रहा है। बीजेपी सांसद राघव चड्ढा ने गुरुवार को राज्यसभा में डॉक्टरों और पैथोलॉजी लैब के बीच कथित मिलीभगत का मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि 'रेफरल कमीशन' एक समानांतर अर्थव्यवस्था बन गया है, जिससे मरीजों का बिल बढ़ जाता है।
मेडिकल टेस्ट में लैब-डॉक्टर गठजोड़ पर MP राघव चड्ढा का बड़ा सवाल
चड्ढा ने कहा कि यह पैसा इलाज के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ मरीज को रेफर करने के लिए लिया जाता है। चड्ढा ने कहा, 'मैं कुछ डॉक्टरों और कुछ डायग्नोस्टिक लैब के बीच चल रहे रेफरल इंसेंटिव और 'कट मनी' के सिस्टम का मुद्दा उठा रहा हूं। यह इलाज के बजाय मरीज को रेफर करने का एक अनौपचारिक सिस्टम बन गया है, जिसमें डॉक्टर की जेब में पैसा जाता है।'
डॉक्टर इसे रेफरल कमीशन कहते हैं
राघव चड्ढा ने कहा कि इसके लिए कमीशन की एक तय दर, खास एजेंट और एक समानांतर इंसेंटिव अर्थव्यवस्था काम करती है।उन्होंने कहा, 'डायग्नोस्टिक सेंटर इसे मार्केटिंग का खर्च कहते हैं। डॉक्टर इसे रेफरल कमीशन कहते हैं। यह आमतौर पर प्रोसीजर की लागत के प्रतिशत के आधार पर लिया जाता है, और कुछ जगहों पर तो डायग्नोस्टिक सेंटर डॉक्टर को विदेश यात्रा पर भी भेजते हैं।'
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सांसद ने कहा कि MCI ने 2002 में इस प्रैक्टिस पर रोक लगाई थी और इसे 'फीस बांटना' (fee splitting) कहा था, और नेशनल मेडिकल कमीशन ने 2023 में इसे 'रेफरल कमीशन' के तौर पर बैन कर दिया और 1 से 3 महीने के लिए सस्पेंशन का प्रावधान भी किया। उन्होंने कहा कि इस खर्च का बोझ मरीज पर पड़ता है, न कि डायग्नोस्टिक सेंटर पर, जिससे कुछ मामलों में बिल 15-20 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
मामला डॉक्टरों के खिलाफ नहीं, बल्कि 'कट मनी' वाले रेफरल सिस्टम के खिलाफ
'समस्या सिर्फ बढ़ा हुआ बिल नहीं है, बल्कि अनावश्यक मेडिकल टेस्ट और ज़रूरत से ज़्यादा रेफर करने की प्रैक्टिस भी शुरू हो गई है।' उन्होंने कहा, 'यह मामला डॉक्टरों के ख़िलाफ नहीं, बल्कि 'कट मनी' वाले रेफरल सिस्टम के ख़िलाफ है।'
मरीजों के लिए 'चेतावनी के संकेतों' (रेड फ़्लैग्स) की एक लिस्ट दी
राघव चड्ढा ने मरीज़ों की जानकारी के लिए कुछ चेतावनी वाले संकेत भी बताए। इनमें शामिल थे - डॉक्टरों का मरीज़ों को कुछ खास डायग्नोस्टिक सेंटर्स पर भेजना या इस बात पर 'नाराज़' होना कि मरीज़ ने टेस्ट के लिए किसी दूसरी मान्यता प्राप्त लैब का इस्तेमाल किया।उन्होंने कहा, 'अगर आपको डॉक्टर के क्लिनिक में किसी डायग्नोस्टिक सेंटर का मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव या प्रचार का सामान दिखे, तो उससे भी सावधान रहें।' सांसद ने कहा कि यह मुद्दा खासकर टियर-2 या टियर-3 शहरों के लिए अहम है, जहां डॉक्टरों और डायग्नोस्टिक सेंटर्स के बीच रेफरल कमीशन का एक अनौपचारिक कारोबार बन गया है, जिसे रोकने की जरूरत है।
