कर्नाटक में आवारा कुत्तों की समस्या ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। जनवरी 2025 से जून 2025 के बीच कुत्तों के काटने के 2.31 लाख से अधिक मामले सामने आए हैं, जिनमें 19 लोगों की मौत रेबीज संक्रमण के कारण हुई है। यह जानकारी राज्य के स्वास्थ्य विभाग के इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम (IDSP) द्वारा सार्वजनिक की गई है।
पिछले साल से बढ़े मामले
पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में इस बार मामलों में लगभग 36.2% की वृद्धि हुई है। 2024 के पहले छह महीनों में कुत्तों के काटने के 1.69 लाख मामले दर्ज किए गए थे और 18 मौतें हुई थीं। पूरे 2024 में कुल 3.6 लाख मामलों और 42 मौतों का आंकड़ा दर्ज हुआ था।
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो ने बढ़ाई चिंता
बीते सप्ताह हुबली की एक घटना ने राज्यभर में चिंता की लहर दौड़ा दी। एक वीडियो में दो आवारा कुत्ते एक तीन वर्षीय बच्ची पर हमला करते और उसे घसीटते हुए दिखाई दिए। वीडियो के वायरल होने के बाद आम नागरिकों के साथ-साथ प्रशासन की भी नींद उड़ी है। राज्य के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के प्रधान सचिव हर्ष गुप्ता ने आश्वस्त किया कि स्थिति "नियंत्रण से बाहर नहीं" है। उनके अनुसार, मामलों की संख्या अधिक इसीलिए लग रही है क्योंकि अब रिपोर्टिंग अधिक सटीक और व्यवस्थित हो चुकी है।
सरकार की रणनीति
गुप्ता ने बताया कि सरकार इस समस्या से निपटने के लिए बहुस्तरीय योजना पर काम कर रही है:
- जागरूकता अभियान: आम जनता को कुत्तों के काटने से बचाव और प्राथमिक उपचार की जानकारी दी जा रही है।
- चिकित्सकों का प्रशिक्षण: रेबीज के उपचार और टीकाकरण को लेकर डॉक्टरों को प्रशिक्षित किया जा रहा है।
- दवा उपलब्धता: अस्पतालों में पर्याप्त मात्रा में रेबीज रोधी टीकों (ARV और RIG) की आपूर्ति सुनिश्चित की गई है।
- आवारा कुत्तों की जनसंख्या नियंत्रण: शहरी स्थानीय निकायों और ग्राम पंचायतों को निर्देश दिए गए हैं कि वे कुत्तों की नसबंदी, टीकाकरण और आबादी प्रबंधन को लेकर ठोस कदम उठाएं।
खौफ में जनता
बढ़ते मामलों और वायरल घटनाओं ने आम लोगों में डर का माहौल बना दिया है। खासकर बच्चों, बुज़ुर्गों और गरीब बस्तियों में रहने वाले लोग खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। राज्य सरकार के लिए यह आवश्यक हो गया है कि सिर्फ प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि दीर्घकालिक समाधान की दिशा में भी ठोस कदम उठाए जाएं। कर्नाटक में रेबीज के मामलों में हर साल आ रही बढ़ोतरी न सिर्फ स्वास्थ्य संकट की ओर इशारा करती है, बल्कि शहरी प्रबंधन और पशु कल्याण नीतियों की भी गंभीर समीक्षा की मांग करती है।
