अभी डेढ़ महीने पहले तक ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री थीं। सब कुछ उनके नियंत्रम में लग रहा था। हालांकि, विधानसभा चुनाव में हार का अंदेशा था, लेकिन पार्टी एकजुट थी। फिर 4 मई की वो तारीख आई, जब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का परिणाम घोषित हुआ। TMC को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा। मौजूदा मुख्यमंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को 'दीदी' को उनकी पारंपरिक सीट भवानीपुर में हरा दिया। भाजपा प्रचंड बहुमत से सरकार में आई और ममता बनर्जी व उनकी पार्टी TMC की विदाई हो गई। इस हार के बाद TMC में सब कुछ पहले जैसा नहीं रहा, एक के बाद एक पार्टी के भीतर आवाजें उठने लगीं। करीब 60 विधायकों ने अलग गुट बना लिया और उनके नेता ऋतब्रत बनर्जी विधानसभा में नेताप्रतिपक्ष भी बन गए हैं। सोमवार 8 जून को ही राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। अब नाराज सांसदों का बागी गुट आज लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर सकता है। यानी ममता बनर्जी की किस्मत ने 360 डिग्री की पलटी मारी है। आखिर ऐसा क्या और क्यों हुआ चलिए जानते हैं -
आज लोकसभा अध्यक्ष से मिलेंगे TMC के बागी सांसद
जैसा कि हमने ऊपर बात की, ममता बनर्जी के लिए अभी डेढ़ महीने पहले तक हालात चुनौतीपूर्ण जरूर थे, लेकिन नियंत्रण में थे। आखिर वह 15 साल तक पश्चिम बंगाल की सत्ता में रही हैं। वह अपनी सीट से चुनाव हार गईं और उनकी पार्टी सिर्फ 80 सीटों पर सिमट गई, जबकि भाजपा ने 207 सीटें जीतकर पहली बार राज्य में सरकार बनाई। अब तक सब कुछ नियंत्रण में दिख रहा था, लेकिन चुनाव में हार के बाद ऐसा लगा जैसे सब कुछ रेत की तरह 'दीदी' के हाथ से निकल रहा है। कल तक जो नेता उनके साथ थे, कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे थे... आज वही बगावत कर रहे हैं। सिर्फ 40 दिन के भीतर ही वह सब कुछ बिखर गया, जो ममता बनर्जी ने पिछले 15 साल से समेटकर रखा हुआ था। ममता बनर्जी के पास एक-डेढ़ दर्जन विधायक और कुछ ही सांसद बचे हैं, जो अब भी उनके साथ दिख रहे हैं। अब तो हालात ऐसे हैं कि 'दीदी' के लिए उनकी पार्टी TMC और सिंबल पर भी संकट आ गया है।
40 दिन में कैसे तृण-तृण हुई TMC?
4 मई 2026 को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आए। 15 साल सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस 80 सीटों पर सिमट गई और स्वयं ममता बनर्जी भी भवानीपुर से अपनी सीट गंवा बैठी। ममता बनर्जी साल 2011 से लगातार जीतते हुए आ रही थी।
इसके एक महीने के भीतर ही पार्टी के विधायक बागी हो गए और 58 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया। 3 जून 2026 को बागी विधायकों ने ऋतब्रत को अपना नेता चुना और उसी दिन विधानसभा स्पीकर ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष (LoP) की मान्यता दे दी।
सोमवार 8 जून को पार्टी के सांसद सुखेंदु रॉय ने राज्यसभा और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया। इसके कुछ ही देर बाद TMC के 11 सांसदों की भाजपा नेता भूपेंद्र यादव के साथ बैठक हुई। इस बैठक में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी भी शामिल थे। इस बैठक के बाद टीएमसी के बागी सांसदों के गुट ने दावा किया कि उनके साथ 20 सांसद हैं और उन्होंने काकोली घोष को अपनना नेता चुना। यही नहीं बागी सांसदनों ने NDA को समर्थन देने का ऐलान किया और लोकसभा में अपनी सीटें अलग करने की मांग भी रखी।
आखिर ममता से इतनी नाराजगी क्यों?
ममता बनर्जी से नाराजगी नहीं है। यह बात बागी विधायकों की तरफ से भी कही गई है और बागी सांसद भी ऐसा ही कह रहे हैं। सभी ने अभिषेक बनर्जी पर उंगली उठाई है। ऋतब्रत बनर्जी ने भी NDTV से एक इंटरव्यू में कहा कि उनकी पार्टी में अभिषेक बनर्जी के लिए कोई जगह नहीं है। ममता बनर्जी उनकी पार्टी को गाइड करें। TMC के ज्यादातर बागी नेताओं का कहना है कि वे अभिषेक बनर्जी के काम करने के तरीके से नाराज हैं और उनके 'बॉस कल्चर' के खिलाफ हैं। यही नहीं बागियों ने यह भी दावा किया है कि TMC सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ गया था। सुखेंदु रॉय जैसे नेताओं ने RG Kar मामले में सरकार की कार्रवाई पर भी सवाल उठाए।
विधानसभा चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी अलग-थलग
RG Kar मामले में आवाज उठाने की मिली सजा
सुखेंदु ने कल मीडिया से बात करते हुए कहा, 'मैंने आरजी कर मामले पर खुले तौर पर आवाज उठाई थी। इसके बाद से पार्टी में मुझे अलग-थलग किया जाने लगा। मेरी बस इतनी सी गलती थी कि मैंने कुछ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच की मांग की थी, क्योंकि मेरा मानना था कि सबूत मिटाने में उनकी बड़ी भूमिका थी।'
काकोली की ममता बनर्जी से नाराजगी
लोकसभा सांसद काकोली घोष ने भी मीडिया से बात करते हुए गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा, 'हालात बद से बदतर हो जा रहे थे। मैं 40 साल से ममता बनर्जी के साथ रही हूं। वह मेरी गाइड, मेरी मेंटॉर और मेरी नेता रही हैं और मैं उनके साथ तब भी रही हूं, जब वह सत्ता में नहीं थीं। इसलिए यह कहना बेकार है कि वह सत्ता में नहीं हैं, मैंने उन्हें छोड़ दिया। मैं उनके साथ तब भी थी जब वह सत्ता में नहीं थीं, लेकिन उस समय की नीतियां बंगाल के गरीब लोगों के भले के लिए थी। पिछले 3-4 सालों में काम उम्मीद के मुताबिक नहीं हुआ।'
काकोली ने कहा कि बहुत सारी वित्तीय गड़बड़ियां सामने आई हैं, जो आज साबित हो रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में शिक्षा, स्वास्थ्य, फिल्म इंडस्ट्री जैसे सेक्टर पूरी तरह से ठप हो गए हैं। कानून व्यवस्था ठीक नहीं रही। सरकारी अधिकारियों पर कुछ नेताओं की मनमर्जी के हिसाब से काम करने का बहुत ज्यादा दबाव था।'
