West Bengal Assembly Election 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में आज निर्णायक दिन है। 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में हुए विधानसभा चुनाव के बाद आज यानी सोमवार 4 मई को मतगणना हो रही है। आज नतीजे घोषित होते ही यह भी साफ हो जाएगा कि राज्य में सत्ता किसके हाथ आती है। साल 2011 से ममता बनर्जी (Mamata Banejee) लगातार सत्ता में बनी हुईं हैं और वह इस बार जीत का चौका लगाने के लिए मैदान में हैं। जबकि एग्जिट पोल्स पर भरोसा करें तो पश्चिम बंगाल में पहली बार भाजपा का कमल खिल सकता है। भ्रष्टाचार के आरोप, 15 साल की एंटी इनकंबेंसी, BJP की आक्रामक चुनावी रणनीति और वोटर लिस्ट विवाद (SIR) के बीच यह चुनाव ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन लड़ाइयों में से एक रहा है। लेकिन ममता बनर्जी का पूरा राजनीतिक सफर बताता है कि जब भी चुनौतियां बढ़ती हैं, ‘दीदी’ और भी आक्रामक हो जाती हैं। निश्चित तौर पर आज भी पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ही सबसे बड़ा राजनीतिक चेहरा हैं। चलिए जानते हैं ममता बनर्जी के राजनीतिक सफर के बारे में, जो इमरजेंसी के दौरान जेपी की कीर के बोनट पर चढ़ने से शुरू होता है और आज भी जारी है।
ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर, पढ़ें 51 साल की यात्रा के हाई प्वाइंट्स
ममता बर्जी को जब पहली बार नोटिस किया गया
25 अगस्त 1975 की वह तस्वीर आज भी बंगाल की राजनीति में ताजा है। देश में आपातकाल लगा हुआ था। कोलकाता के कॉलेज स्ट्रीट पर गांधीवादी नेता जयप्रकाश नारायण के काफिले के सामने आई एक युवा लड़की अचानक कार के बोनट पर चढ़ गई और नारेबाजी शुरू कर दी। सफेद सूती साड़ी में दिख रही वह 20 साल की लड़की कोई और नहीं ममता बनर्जी ही थीं। शायद उस समय किसी ने भी यह नहीं सोचा होगा कि यही लड़की एक दिन बंगाल की सबसे प्रभावशाली नेता बनेगी।
घर के हालात ने बनाया मजबूत
ममता बनर्जी के जीवन में संघर्ष बहुत कम उम्र में शुरू हो गया था। जब वह मात्र 17 साल की थीं, तब उनके पिता प्रोमिलेश्वर बनर्जी का इलाज न हो पाने के कारण निधन हो गया। परिवार की आर्थिक स्थिति काफी ज्यादा कमजोर थी। ममता बनर्जी सुबह घर का काम करतीं, अपने भाई-बहनों के लिए खाना बनातीं और फिर कॉलेज जाती थीं। साधारण सूती साड़ी, चप्पल और हालात से लड़ने का उनका स्वभाव धीरे-धीरे उनकी पहचान बन गया।
सोमनाथ चटर्जी को हराकर बनी राष्ट्रीय सनसनी
साल 1970 में कॉलेज राजनीति से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत करने वाली ममता ने जल्द ही कांग्रेस की छात्र इकाई में अपनी अलग पहचान बना ली। साल 1976 में वह महिला कांग्रेस की राज्य महासचिव बनीं और 1984 में पहली बार चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचीं। उस समय उन्होंने दिग्गज वामपंथी नेता सोमनाथ चटर्जी को हराकर राष्ट्रीय राजनीति में सनसनी फैला दी।
इन आंदोलनों ने ममता को बनाया मजबूत
1990 के दशक में ममता बनर्जी ने सड़क की राजनीति को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया। 1992 में रायटर्स बिल्डिंग के बाहर धरना, 1993 में वोटर आईडी आंदोलन और पुलिस फायरिंग में 13 कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मौत ने ममता बनर्जी को राज्य की वामपंथी सरकार के खिलाफ सबसे बड़ा चेहरा बना दिया। आज भी 21 जुलाई को तृणमूल कांग्रेस ‘शहीद दिवस’ मनाती है।
अटल सरकार में रेलमंत्री बनीं ममता
साल 1997 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस बनाई। साल 1999 में वह प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में रेल मंत्री भी रहीं। इसके बाद ममता बनर्जी ने केंद्र की राजनीति और बंगाल की सियासत दोनों में अपनी पकड़ और मजबूत की।
सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन ने पहुंचाया सत्ता तक
ममता बनर्जी के जीवन में असली मोड़ सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन से आया। टाटा मोटर्स प्रोजेक्ट (नैनो कार प्लांट) और भूमि अधिग्रहण के खिलाफ ममता बनर्जी के आंदोलन ने बंगाल की राजनीति को बदलकर रख दिया। इस दौरान उन्होंने 26 दिन की भूख हड़ताल की और लगातार जन संघर्ष ने उन्हें ग्रामीण बंगाल का सबसे बड़ा चेहरा बना दिया। इसी का परिणाम था कि साल 2011 में ममता के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने 34 साल पुरानी वामपंथी सत्ता को उखाड़ फेंका।
सबकी 'दीदी' बन गई ममता बनर्जी
मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता बनर्जी ने स्वयं को सिर्फ नेता या मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि ‘दीदी’ ब्रांड के रूप में स्थापित किया। उन्होंने महिलाओं के लिए कन्याश्री और लक्ष्मीर भंडार जैसी योजनाएं शुरू कीं, जिसने उन्हें मजबूत सामाजिक आधार दिया। गांवों में उनकी सीधी पहुंच और जमीन से जुड़ी छवि के कारण आज भी वह मजबूती से खड़ी हैं।
हालांकि, भ्रष्टाचार के आरोप, शिक्षक भर्ती घोटाला, आरजी कर अस्पताल विवाद और पार्टी नेताओं पर केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई ने उनकी सरकार को कई बार कठघरे में खड़ा किया। विपक्षी भाजपा इन्हीं मुद्दों को विधानसभा चुनाव 2026 में बढ़ चढ़कर उठाया और सत्ता परिवर्तन का दावा किया जा रहा है। मतगणना जारी है और कुछ ही घंटों में साफ हो जाएगा कि क्या आज भी पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का जादू कायम है या अब उनकी विदायी का समय आ गया है।
