स्वतंत्र डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म NewsClick और उसके संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ को दिल्ली हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ आर्थिक अपराध शाखा द्वारा दर्ज FIR और उसके आधार पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से शुरू की गई मनी लॉन्ड्रिंग जांच को रद्द कर दिया है।
दिल्ली हाईकोर्ट। फाइल फोटो
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने अपने फैसले में न सिर्फ एफआईआर को कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया, बल्कि ED की कार्रवाई पर भी गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि मामले में एजेंसियों की कार्रवाई स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता पर हमला प्रतीत होती है और उपलब्ध रिकॉर्ड से किसी भी प्रकार का आपराधिक अपराध स्थापित नहीं होता। यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अदालत ने केवल तकनीकी आधार पर कार्रवाई रद्द नहीं की, बल्कि जांच एजेंसियों के पूरे दृष्टिकोण और कार्रवाई की वैधता पर टिप्पणी की है।
कोर्ट ने ED की कार्रवाई को बताया शक्तियों का दुरुपयोग
फैसले में अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ शुरू की गई कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण थी। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि यह मामला केवल जांच का नहीं, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता के खिलाफ शक्तियों के इस्तेमाल का भी है।अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से ऐसा कोई ठोस आधार सामने नहीं आया जिससे यह साबित हो सके कि NewsClick या उसके अधिकारियों ने मनी लॉन्ड्रिंग का कोई अपराध किया था। इसके बावजूद ED ने लंबी अवधि तक जांच जारी रखी, कई कर्मचारियों और अधिकारियों से पूछताछ की और बार-बार समन जारी किए। कोर्ट ने कहा कि जांच का तरीका यह दिखाता है कि एजेंसी बिना किसी स्पष्ट अपराध के अस्तित्व के केवल वित्तीय मामलों में गहराई तक जाकर कुछ तलाशने की कोशिश कर रही थी। अदालत ने इसे “फिशिंग एंड रोविंग एक्सरसाइज” करार दिया।
क्या था पूरा मामला और क्यों पहुंचा था हाईकोर्ट?
पूरा विवाद NewsClick को मिले विदेशी निवेश (FDI) से जुड़ा था। जांच एजेंसियों के अनुसार NewsClick की कंपनी PPK Newsclick Studio Pvt Ltd को अमेरिकी कंपनी Worldwide Media Holdings LLC से लगभग 9.59 करोड़ रुपये का निवेश मिला था। आरोप लगाया गया कि कंपनी ने अपने शेयरों का मूल्यांकन वास्तविक मूल्य से कहीं अधिक दिखाया और इसी आधार पर विदेशी निवेश हासिल किया। इसके अलावा एजेंसियों ने यह भी आरोप लगाया कि विदेशी निवेश की राशि का इस्तेमाल वेतन, सलाहकार शुल्क, किराया और अन्य खर्चों के रूप में किया गया, जो कथित तौर पर निवेश के उद्देश्य के अनुसार नहीं था।इन आरोपों के आधार पर दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने 2020 में आईपीसी की धारा 406, 420 और 120B के तहत FIR दर्ज की। FIR दर्ज होने के कुछ दिनों बाद ही ED ने इसी को आधार बनाकर PMLA के तहत ECIR दर्ज कर मनी लॉन्ड्रिंग जांच शुरू कर दी। फरवरी 2021 में ED ने NewsClick के कार्यालय और प्रबीर पुरकायस्थ के घर समेत कई ठिकानों पर छापेमारी भी की थी। उस समय यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना था।
अदालत ने FDI नियमों पर क्या कहा?
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने विस्तार से यह जांच की कि क्या विदेशी निवेश वास्तव में किसी कानून का उल्लंघन करके प्राप्त किया गया था। कोर्ट के सामने यह तथ्य रखा गया कि वर्ष 2018 में जब निवेश प्राप्त हुआ था, उस समय डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म पर विदेशी निवेश को लेकर कोई 26 प्रतिशत सीमा लागू नहीं थी।
दरअसल सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने जनवरी 2018 में स्पष्ट किया था कि वेबसाइट और वेब पोर्टल पर समाचार प्रकाशित करने वाली संस्थाएं प्रिंट मीडिया की श्रेणी में नहीं आतीं। इसका अर्थ यह था कि उस समय डिजिटल न्यूज मीडिया पर प्रिंट मीडिया से जुड़े FDI प्रतिबंध लागू नहीं होते थे। अदालत ने माना कि जब निवेश प्राप्त हुआ तब कोई ऐसा नियम मौजूद नहीं था जिसका उल्लंघन साबित किया जा सके।
शेयरों के मूल्यांकन पर भी नहीं मिला अपराध का आधार
जांच एजेंसियों का एक बड़ा आरोप यह था कि कंपनी ने अपने शेयरों का मूल्य कृत्रिम रूप से बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया। लेकिन अदालत ने पाया कि शेयरों का मूल्यांकन चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा FEMA नियमों के अनुरूप किया गया था। मूल्यांकन के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य Discounted Cash Flow Method का इस्तेमाल किया गया था। कोर्ट ने कहा कि किसी कंपनी के शेयर का मूल्य निवेशक और कंपनी के बीच व्यावसायिक बातचीत और भविष्य की संभावनाओं के आधार पर तय होता है। यदि निवेशक स्वेच्छा से किसी मूल्य पर निवेश करता है तो उसे अपने आप में आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि यह पूरी तरह एक आर्थिक और कारोबारी निर्णय था, जिसे आपराधिक साजिश या धोखाधड़ी नहीं कहा जा सकता।
RBI की रिपोर्ट ने भी कमजोर किया ED का दावा
सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने जांच एजेंसियों को बताया था कि विदेशी निवेश ऑटोमैटिक रूट के तहत प्राप्त हुआ था और इसमें FEMA नियमों का कोई उल्लंघन नहीं पाया गया। याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि जांच रिपोर्ट के एक शुरुआती संस्करण में RBI की यह टिप्पणी दर्ज थी। हालांकि बाद में दाखिल की गई रिपोर्ट में इस हिस्से का उल्लेख नहीं किया गया। कोर्ट ने इस पहलू को भी नोट किया और माना कि उपलब्ध रिकॉर्ड से किसी नियामकीय उल्लंघन का स्पष्ट आधार सामने नहीं आता।
‘धोखाधड़ी’ का मामला क्यों नहीं बना?
अदालत ने FIR में दर्ज धारा 420 यानी धोखाधड़ी के आरोप की भी विस्तार से समीक्षा की है। कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी का अपराध तभी बनता है जब कोई व्यक्ति यह शिकायत करे कि उसे धोखा देकर उसकी संपत्ति या धन हासिल किया गया। इस मामले में जिस विदेशी कंपनी ने निवेश किया था, उसकी ओर से कभी कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई। न तो कंपनी ने यह कहा कि उसके साथ धोखा हुआ और न ही यह दावा किया कि उसे गुमराह करके निवेश कराया गया। अदालत ने कहा कि जब कथित पीड़ित पक्ष ही किसी धोखाधड़ी का आरोप नहीं लगा रहा है, तब धोखाधड़ी का मामला स्थापित करना मुश्किल है।
आपराधिक विश्वासघात का आरोप भी नहीं टिका
FIR में धारा 406 यानी आपराधिक विश्वासघात का आरोप भी लगाया गया था। कोर्ट ने कहा कि निवेश और शेयर खरीदना एक व्यावसायिक लेन-देन है। इसे संपत्ति का ‘सुपुर्द किया जाना’ नहीं कहा जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी निवेशक द्वारा कंपनी में पैसा लगाना और उसके बदले शेयर प्राप्त करना सामान्य कारोबारी गतिविधि है। इसे आपराधिक विश्वासघात का मामला नहीं माना जा सकता।
आपराधिक साजिश के आरोप पर भी सवाल
ED ने अदालत में यह दलील दी थी कि भले ही धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात के आरोप कमजोर हों, लेकिन धारा 120B यानी आपराधिक साजिश का मामला बनता है। एजेंसी का कहना था कि विदेशी निवेश एक सुनियोजित साजिश के तहत लाया गया था। लेकिन अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे किसी अवैध साजिश का अस्तित्व साबित हो सके। कोर्ट ने कहा कि केवल आरोप लगा देना पर्याप्त नहीं है। साजिश साबित करने के लिए कुछ ठोस सामग्री होनी चाहिए, जो इस मामले में उपलब्ध नहीं है।
