LIVEAditya L1 Surya Mission Launch Updates: भारत का पहला सूर्य मिशन आदित्य एल1 लॉन्च, सूर्य के रहस्य का लगाएगा पता, पीएम मोदी ने दी बधाई

Aditya L1 Surya Mission Launch Updates: भारत का पहला सूर्य मिशन आदित्य एल1 लॉन्च, सूर्य के रहस्य का लगाएगा पता, पीएम मोदी ने दी बधाई
Start Body Content With: Isro.gov.in, Aditya L1 Surya Mission Launch Kab Hoga Date and Time: चंद्रयान 3 के सफल होने के बाद उत्साहित भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) आज सूर्य के रहस्य का पता लगाने के लिए आदित्य-एल1 मिशन लॉन्च किया। 1,480 किलोग्राम वजनी आदित्य-एल1 अंतरिक्ष यान को भारत के प्रसिद्ध ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (PSLV) द्वारा अंतरिक्ष में ले जाया जाएगा। एक बार कक्षा में पहुंचने के बाद इसे 235 किमी से 19,500 किमी तक की ऊंचाई के साथ अत्यधिक अंडाकार पथ में स्थापित किया जाएगा। यह अद्वितीय प्रक्षेप पथ अंतरिक्ष यान को सूर्य के व्यवहार और विशेषताओं के बारे में मूल्यवान डेटा कैप्चर करने में सक्षम करेगा। आदित्य-एल1 आज सुबह 11.50 बजे श्रीहरिकोटा स्थित अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे लॉन्च पैड से प्रक्षेपित किया गया। आदित्य एल1 को सूर्य परिमंडल के दूरस्थ अवलोकन और पृथ्वी से करीब 15 लाख किलोमीटर दूर ‘एल1’ (सूर्य-पृथ्वी लैग्रेंजियन बिंदु) पर सौर हवा का वास्तविक अवलोकन करने के लिए डिजाइन किया गया है। Aditya L1 Launch Live
आदित्य-एल1 का सफल प्रक्षेपण: कांग्रेस ने ऐतिहासिक पृष्टभूमि का किया जिक्र
कांग्रेस ने शनिवार को ‘आदित्य एल1’ मिशन को देश के लिए शानदार उपलब्धि करार दिया और इसकी ऐतिहासिक पृष्टभूमि का जिक्र करते हुए कहा कि परियोजना को साल 2009 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की मंजूरी मिली थी। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर पोस्ट किया, "आज आदित्य एल 1 का प्रक्षेपण इसरो और भारत के लिए एक और शानदार उपलब्धि है। इसरो को एक बार फिर सलाम करते हुए, इसकी निरंतरता को समझने के लिए आदित्य एल1 की हाल की टाइमलाइन को याद करना सही होगा।"उन्होंने कहा कि 2006 में 'एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी ऑफ इंडिया' और 'इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज' के वैज्ञानिकों ने एक उपकरण के साथ सौर वेधशाला के कंसेप्ट का प्रस्ताव रखा। मार्च 2008 में वैज्ञानिकों ने इसरो के साथ इस प्रस्ताव को साझा किया। रमेश के अनुसार, दिसंबर 2009 में इसरो ने एक उपकरण के साथ आदित्य-1 परियोजना को मंजूरी दी। अप्रैल 2013 में पूर्व अध्यक्ष यूआर राव के हस्तक्षेप के बाद इसरो ने एक अवसर के बारे में घोषणा की, जिसमें वैज्ञानिक समुदाय से अधिक वैज्ञानिक उपकरणों (पेलोड) के प्रस्तावों की मांग की गई थी।उन्होंने कहा कि जून 2013 : इसरो ने प्राप्त वैज्ञानिक प्रस्तावों की समीक्षा की। जुलाई 2013 में इसरो ने आदित्य-1 मिशन के लिए सात पेलोड का चयन किया। इस मिशन का अब नाम बदलकर आदित्य एल1 मिशन कर दिया गया है। नवंबर 2015 में इसरो ने औपचारिक रूप से आदित्य-एल 1 को मंजूरी दी।
आदित्य -एल1 का सफल प्रक्षेपण: पीएम मोदी ने दी बधाई
पीएम नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर कहा कि चंद्रयान-3 की सफलता के बाद भारत ने अपनी अंतरिक्ष यात्रा जारी रखी है। भारत के पहले सौर मिशन, आदित्य -एल1 के सफल प्रक्षेपण के लिए हमारे वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को बधाई। भारत के पहले सौर मिशन, आदित्य -एल1 के सफल प्रक्षेपण के लिए इसरो संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए ब्रह्मांड की बेहतर समझ विकसित करने के लिए हमारे अथक वैज्ञानिक प्रयास जारी रहेंगे।
Aditya-L1 Launch LIVE Updates:एल1 पॉइंट पर ऐसा कोई उपग्रह नहीं
भारत L1 पर मिशन करने वाला तीसरा देश है। यह बहु-तरंग दैर्ध्य, बहु-यंत्र और बहु-दिशा है। भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला के निदेशक अनिल भारद्वाज ने लॉन्च के बाद बोलते हुए कहा, आपके पास एल1 पॉइंट पर अब तक ऐसा कोई उपग्रह मौजूद नहीं है।
भारत का पहला सूर्य मिशन आदित्य एल1 लॉन्च
आदित्य एल-1: तीसरा चरण भी सफल रहा
ISRO के सूर्य मिशन आदित्य एल-1 के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC) शार श्रीहरिकोटा से प्रक्षेपित किया गया। लॉन्चिंग का तीसरा चरण सफल रहा।
सूर्य के अध्ययन के लिए लॉन्च हुआ आदित्य एल-1
भारतीय अंतरिक्ष संगठन (इसरो) ने कुछ दिन पहले चंद्रमा पर सफल ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ के बाद एक बार फिर इतिहास रचने के उद्देश्य से शनिवार को देश के पहले सूर्य मिशन ‘आदित्य एल1’ का यहां स्थित अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपण किया। इसरो के अधिकारियों ने बताया कि जैसे ही 23.40 घंटे की उलटी गिनती समाप्त हुई, 44.4 मीटर लंबा ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) चेन्नई से लगभग 135 किलोमीटर दूर श्रीहरिकोटा स्थित अंतरिक्ष केंद्र से सुबह 11.50 बजे निर्धारित समय पर शानदार ढंग से आसमान की तरफ रवाना हुआ। यह लगभग 63 मिनट की पीएसएलवी की "सबसे लंबी उड़ान" होगी। इसरो के अनुसार, ‘आदित्य-एल1’ सूर्य का अध्ययन करने वाली पहली अंतरिक्ष-आधारित वेधशाला है। अंतरिक्ष यान, 125 दिन में पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर की यात्रा करने के बाद लैग्रेंजियन बिंदु ‘एल1’ के आसपास एक प्रभामंडल कक्षा में स्थापित होगा। यह वहीं से सूर्य पर होने वाली विभिन्न घटनाओं का अध्ययन करेगा। पिछले महीने 23 अगस्त को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र पर ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ में सफलता प्राप्त कर भारत ऐसा कीर्तिमान रचने वाला दुनिया का पहला और अब तक का एकमात्र देश बन गया है।
आदित्य एल1 लॉन्च को देखने के लिए उमड़े लोग
Aditya L1 launch LIVE updates: एल1 का नाम खगोलशास्त्री जोसेफ-लुई लाग्रेंज का नाम रखा गया
आदित्य एल1 मिशन एल1 प्वाइंट तक अमेरिका, जिसका नाम 18वीं सदी में इटली में रखा गया था, खगोलशास्त्री जोसेफ-लुई लाग्रेंज का नाम रखा गया है। इस बिंदु पर, सूर्य और पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण उपग्रह की गति को निर्धारित करता है।
सूर्य का अध्ययन करने के लिए समर्पित भारत की पहली अंतरिक्ष वेधशाला होगी आदित्य-एल1
आदित्य-एल1 मिशन बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सूर्य का अध्ययन करने के लिए समर्पित भारत की पहली अंतरिक्ष-आधारित वेधशाला होगी। यह सौर कोरोना, सौर तूफान और अन्य सौर घटनाओं में बहुमूल्य अंतर्दृष्टि प्रदान करेगा। अंतरिक्ष यान द्वारा एकत्र किया गया डेटा अंतरिक्ष के मौसम और पृथ्वी पर इसके प्रभाव को समझने में महत्वपूर्ण होगा।
आदित्य एल1 मिशन पर बोलीं जवाहरलाल नेहरू तारामंडल में प्रोग्रामिंग मैनेजर प्रेरणा चंद्रा
सूर्य का अध्ययन करने वाला पहला अंतरिक्ष यान होगा आदित्य एल1
‘आदित्य एल1’ सूर्य का अध्ययन करने वाला पहला अंतरिक्ष यान होगा। इसरो के भरोसेमंद पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी) के जरिये श्रीहरिकोटा अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे लॉन्च पैड से प्रक्षेपित किया जाएगा। ‘आदित्य एल1’ के 125 दिनों में लगभग 15 लाख किलोमीटर की दूरी तय कर लैग्रेंजियन बिंदु ‘एल1’ के आसपास हेलो कक्षा में स्थापित होने की उम्मीद है, जिसे सूर्य के सबसे करीब माना जाता है।
आदित्य एल1 मिशन के सफल लॉन्च के लिए सूर्य नमस्कार और विशेष पूजा
Exclusive: आदित्य L1 मिशन में अहमदाबाद के इसरो डायरेक्टर निलेश देसाई ने कही बड़ी बात
चंद्रयान-3 की अपार सफलता के बाद अब इसरो की निगाहें आदित्य L1 मिशन पर लगी हुई है आदित्य एल 1 मिशन से जुड़ी तमाम महत्वपूर्ण बातों पर टाइम्स नाउ नवभारत के साथ अहमदाबाद के इसरो डायरेक्टर निलेश देसाई ने एक्सक्लूसिव बातचीत की। सवाल- आदित्य एल वन भारत के लिए कितना जरूरी है?जवाब- आदित्य एल वन भारत केलिए बहुत अहम है, लेगरेंज प्वाइंट से ऑब्जर्वेशन बहुत अहम। सूर्य का लेटेस्ट डेटा भी मिलेगा सूर्य के ११ ईयर साइकिल 2025 से 2028 पीरियड में सबसे अधिक मात्रा में एक्टिविटी होगी।सवाल - Adiya L1 की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?जवाब- प्रोपल्शन यूनिट में 127 दिन का सफर सबसे कठिन होगा, अनोखा अभियान है हेलो orbit में इंसर्ट करना बड़ी चुनौतीसवाल- ऑप्शन क्या है अगर orbit में लॉन्च न हो पाए तो?जवाब- 127 दिन में अगर नही हो पाया तो फिर से कोशिश की जायेगीसवाल- भारत और इसरो की आदित्य l की अपेक्षाएं क्या है?जवाब- स्पेस वेदर का अभ्यास करना, कॉरोनल मास इजेक्शन की स्टडी, खास सूर्य की सतह पर क्या चल रहा है रेडिएशन इफेक्ट सूर्य पर होते है उससे क्या प्रभाव पड़ेगा ये जानना, सोलर storm का अभ्यास करना।सवाल- आदित्य l कितना कोस्ट एफेटिव?जवाब- पीएसएलवी प्रेक्षापन करते है आदित्य एल1 से करबी 550 करोड़ के आसपास है।
आदित्य एल1 लॉन्च के लिए तैयार
लैग्रेंजियन (एल1) से होगा अवलोकन
डॉ रमेश ने कहा कि एक बार जब सीएमई पृथ्वी पर पहुंच जाते हैं, जो उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों वाले एक बड़े चुंबक की तरह है, तो वे चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के साथ यात्रा कर सकते हैं और फिर वे पृथ्वी के भू-चुंबकीय क्षेत्र को बदल सकते हैं। उन्होंने कहा कि एक बार जब भू-चुंबकीय क्षेत्र प्रभावित हो जाता है, तो इससे उच्च वोल्टेज वाले ट्रांसफॉर्मर प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि इसलिए, सूर्य की लगातार निगरानी के लिए अवलोकन केंद्र स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है जो लैग्रेंजियन (एल1) बिंदु से संभव है।
सबसे तेज सीएमई करीब 15 घंटे में पृथ्वी के निकट पहुंच सकता है
डॉ. रमेश ने उल्लेख किया कि कुछ सीएमई पृथ्वी की ओर भी आ सकते हैं। सबसे तेज सीएमई करीब 15 घंटे में पृथ्वी के निकट पहुंच सकता है। उन्होंने कहा कि ये सीएमई पृथ्वी तक आते हैं। उदाहरण के लिए, 1989 में जब सौर वायुमंडल में भारी हलचल हुई तो कनाडा में क्यूबेक क्षेत्र लगभग 72 घंटों तक बिजली के बिना रहा था। वहीं 2017 में सीएमई की वजह से स्विट्जरलैंड का ज्यूरिख हवाई अड्डा करीब 14 से 15 घंटे तक प्रभावित रहा था।
सीएमई की रफ्तार करीब 3,000 किमी प्रति सेकंड होती है
सूर्य के अध्ययन की आवश्यकता के बारे में भारतीय ताराभौतिकी संस्थान (आईआईए) के प्रोफेसर एवं प्रभारी वैज्ञानिक डॉ आर रमेश ने कहा कि सौर भूकंपों का अध्ययन करने के लिए 24 घंटे के आधार पर सूर्य की निगरानी आवश्यक है जो पृथ्वी के भू-चुंबकीय क्षेत्रों को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने कहा कि जिस तरह पृथ्वी पर भूकंप आते हैं, उसी तरह सूर्य की सतह पर सौर भूकंप भी होते हैं जिन्हें ‘कोरोनल मास इजेक्शन’ (सीएमई) कहा जाता है। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया में लाखों-करोड़ों टन सौर सामग्री अंतरग्रहीय अंतरिक्ष में बिखर जाती है। उन्होंने कहा कि इन सीएमई की रफ्तार करीब 3,000 किमी प्रति सेकंड होती है।
पृथ्वी से करीब 15 लाख किलोमीटर दूर स्थापित होगा आदित्य एल1
एलपीएससी द्वारा विकसित ‘लिक्विड अपोजी मोटर’ भारत की प्रमुख अंतरिक्ष उपलब्धियों में उपग्रह/अंतरिक्ष यान प्रणोदन में महत्वपूर्ण रही है, चाहे वह तीनों चंद्रयान मिशन हों या 2014 का मंगल मिशन। एलपीएससी के उपनिदेशक डॉ. ए के अशरफ ने कहा कि अब हम ‘आदित्य एल1’ मिशन-आदित्य अंतरिक्ष यान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इसमें एलएएम (लिक्विड अपोजी मोटर) नामक एक बहुत ही दिलचस्प, अत्यंत उपयोगी थ्रस्टर है, जो 440 न्यूटन का ‘थ्रस्ट’ प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि आदित्य अंतरिक्ष यान को पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर स्थित ‘लैग्रेंजियन’ कक्षा में स्थापित करने में एलएएम काफी सहायक होगी। जब प्रक्षेपण यान की भूमिका समाप्त हो जाएगी तो एलएएम आदित्य अंतरिक्ष यान के प्रणोदन का कार्यभार संभाल लेगी। एलपीएससी द्वारा विकसित एलएएम अत्यधिक विश्वसनीय है, और इसका 2014 में मंगल ग्रह के अध्ययन से संबंधित ‘मार्स ऑर्बिटर मिशन’ (मॉम) के दौरान 300 दिन तक निष्क्रिय रहने के बाद सक्रिय होने का प्रभावशाली रिकॉर्ड है।
पीएसएलवी और जीएसएलवी रॉकेट दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं
तरल प्रणोदन प्रणाली केंद्र (एलपीएससी) 1987 में अपनी स्थापना के बाद से इसरो के सभी अंतरिक्ष अभियानों में सफलता का एक सिद्ध केंद्र रहा है। तरल और क्रायोजेनिक प्रणोदन प्रणालियां भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं की रीढ़ रही हैं, जो पीएसएलवी और जीएसएलवी रॉकेट दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
रोज जमीनी स्टेशन पर प्राप्त होंगी 1440 तस्वीरें
आदित्य एल1 की परियोजना वैज्ञानिक और वीईएलसी की संचालन प्रबंधक डॉ. मुथु प्रियाल ने कहा कि तस्वीर चैनल से प्रति मिनट एक तस्वीर आएगी। यानी 24 घंटे में लगभग 1,440 तस्वीर हमें जमीनी स्टेशन पर प्राप्त होंगी। इस मिशन को अंजाम देने में यहां इसरो की एक प्रमुख शाखा द्वारा विकसित तरल प्रणोदन प्रणाली अहम भूमिका निभाएगी।