ईंधन संकट के बीच IIT बॉम्बे का कमाल,पत्तों-टहनियों से बनाया किचन फ्यूल, LPG की खपत हुई कम

आईआईटी बॉम्बे के कैंपस में हर साल बड़ी मात्रा में सूखी पत्तियाँ, टहनियां और गार्डन वेस्ट जमा होता है। आमतौर पर इसे कचरे के रूप में देखा जाता है, जिसे हटाने और डिस्पोज करने में खर्च आता है। लेकिन संस्थान में अब सूखे पत्तों और टहनियों को प्रोसेस कर फ्यूल पेलेट्स तैयार किए जा रहे हैं, जिन्हें कैंटीन की रसोई में इस्तेमाल किया जा रहा है।

बढ़ती एलपीजी कीमतों, फ्यूल कॉस्ट और सस्टेनेबल एनर्जी की चुनौती के बीच IIT Bombay ने एक ऐसा मॉडल तैयार किया है, जो भारत के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। संस्थान ने कैंपस में गिरने वाले सूखे पत्तों, टहनियों और बायोमास वेस्ट को प्रोसेस कर उसे किचन फ्यूल में बदलना शुरू किया है। इस फ्यूल का इस्तेमाल अब कैंपस की स्टाफ कैंटीन में हो रहा है, जिससे एलपीजी पर निर्भरता में उल्लेखनीय कमी आई है।

आईआईटी बॉम्बे ने बनाया कैंपस वेस्ट से किचन फ्यूल।

आईआईटी बॉम्बे ने बनाया कैंपस वेस्ट से किचन फ्यूल।

केमिकल डिपार्टमेंट के प्रोफेसर संजय महाजनी के मुताबिक इस मॉडल के जरिए स्टाफ कैंटीन में एलपीजी की खपत करीब 40 फीसदी तक कम हुई है। इसके साथ ही, सालाना लगभग लाखों रुपये तक की बचत का अनुमान है। यानी यह पहल सिर्फ पर्यावरण के लिए फायदेमंद नहीं, बल्कि ऑपरेशनल कॉस्ट कम करने के लिहाज से भी बेहद असरदार है।

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