JNU में मतभेद भुलाकर कैसे साथ आ गए लेफ्ट के संगठन; बाहर की तनातनी कैंपस में क्यों नहीं?

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के हालिया छात्र संघ चुनावों में लेफ्ट यूनिटी ने चारों प्रमुख पदों पर जीत दर्ज कर अपनी मजबूत पकड़ साबित की है। AISA, SFI और DSF जैसे संगठनों ने वैचारिक मतभेदों के बावजूद साझा लक्ष्य के लिए एकजुट होकर चुनाव लड़ा। यह गठबंधन ABVP को चुनौती देने की रणनीति के तहत बना, जिससे ‘प्रोग्रेसिव वोट’ एकजुट हुआ। हालांकि मतभेद पूरी तरह खत्म नहीं हुए, लेकिन साझा राजनीतिक परिस्थिति ने उन्हें साथ काम करने को प्रेरित किया। आइए जानते हैं कैसे हुआ यह काम।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में इस महीने हुए छात्र संघ चुनावों ने एक बार फिर लेफ्ट संगठनों की मजबूत पकड़ को साबित किया है। चारों पदों पर जीत के साथ लेफ्ट यूनिटी ने न सिर्फ अपनी राजनीतिक मौजूदगी स्थापित की, बल्कि यह भी दिखाया कि वैचारिक मतभेद के बावजूद साझा लक्ष्य उन्हें एक मंच पर ला सकता है। चुनाव परिणामों के बाद कैंपस में जिस तरह से चारों लेफ्ट संगठनों AISA, SFI और DSF के झंडे साथ दिखाई दिए, उसने इस एकजुटता की तस्वीर को और साफ कर दिया।

jnusu left parties alliance

JNSU में दिखा लेफ्ट खेमे का दबदबा (चित्र साभार : PTI)

क्यों साथ आए लेफ्ट संगठन?

JNU की राजनीति में लेफ्ट दल लंबे समय से प्रभावी रहे हैं, लेकिन 2015 के बाद ABVP ने दोबारा कैंपस में जगह बनाई। इसी दौर से लेफ्ट दलों ने महसूस किया कि अलग-अलग चुनाव लड़ने से उनका आधार कमजोर हो सकता है और ABVP को फायदा मिलेगा। इसी कारण प्रमुख लेफ्ट छात्र संगठन पिछले कई चुनावों में एक संयुक्त पैनल बनाते रहे। हालिया चुनावों में भी यही रणनीति अपनाई गई संगठनों ने अपने मतभेदों को पीछे छोड़कर 'प्रोग्रेसिव वोट' को एक करने पर ध्यान दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि ABVP हर पद पर पीछे रह गई और लेफ्ट यूनिटी की जीत दर्ज हुई।

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