नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु की उस याचिका पर जवाब मांगा है जिसमें आरोप लगाया गया है कि एमके स्टालिन (MK Stalin) सरकार ने अप्रत्यक्ष रूप से राज्य के 38,000 मंदिरों के संचालन का नियंत्रण अपने हाथ लिया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कार्यकारी अधिकारियों (ईओ) की भर्ती करके तमिलनाडु सरकार का अप्रत्यक्ष नियंत्रण है। लेकिन मंदिर के ट्रस्टियों को नॉमनेट किए बिना और इसके फाइनेंस को गलत तरीके से नियंत्रण किया जा रहा है। 13 दिसंबर को मामले की सुनवाई करने वाली भारत के मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा की पीठ ने तमिलनाडु सरकार से जवाब मांगा है।
एमके स्टालिन सरकार पर मंदिरों के नियंत्रण का आरोप
इंडिक कलेक्टिव ट्रस्ट द्वारा दायर याचिका में, सुप्रीम कोर्ट से मद्रास हाईकोर्ट के एक फैसले को पलटने का आग्रह किया गया है। जिसने पहले उसके मामले को खारिज कर दिया था। याचिका में कहा गया है कि कार्यकारी अधिकारियों की नियुक्ति की शर्तें नियम 2015 कार्यकारी अधिकारियों की नियुक्तियों को अधिकतम 5 साल तक सीमित करती हैं। कार्यकारी अधिकारियों को राज्य के अधिकारियों द्वारा अनिश्चित काल के लिए नॉमनेट किया जाता है। इसके अलावा, उनके नियुक्ति पत्र में निर्दिष्ट कोई शर्तें नहीं थीं।
याचिका में कहा गया है कि तमिलनाडु के मंदिरों में कार्यकारी अधिकारी नियुक्त करके भारत के संविधान के अनुच्छेद 25, 26 और 29 का उल्लंघन किया है। कार्यपालक अधिकारियों द्वारा करोड़ों रुपए की लागत वाली परियोजनाओं और गतिविधियों के संबंध में लिए गए निर्णयों के चलते देवता और मंदिर के भक्तों के हितों को बहुत नुकसान हुआ है। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि यह भी चिंता का विषय है कि बहुत कम आय वाले कई मंदिरों में ईओ को नियुक्त किया है, जहां कुप्रबंधन की संभावना बहुत कम है। इससे पता चलेगा कि प्रतिवादी अंधाधुंध तरीके से बिना किसी वैध कारण के और कानून का पूरी तरह से उल्लंघन करते हुए कई मंदिरों पर नियंत्रण कर रहे हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर वकील सी एस वैद्यनाथन ने कहा कि ईओ ने पूजा करने वालों के धार्मिक दान से उत्पन्न मंदिर के पैसे को उनके वेतन और गैर-धार्मिक उपयोगों के लिए डायवर्ट किया। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले 70 वर्षों में ऐसी कोई ज्ञात घटना नहीं हुई थी जहां तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग ने ट्रस्टी या मंदिर प्रशासन को संभालने में शामिल समुदाय को एक मंदिर वापस कर दिया हो। याचिकाकर्ता ने तमिलनाडु सरकार को उन सभी ईओ को वापस बुलाने का निर्देश देने की मांग की। जो वैध नियुक्ति आदेशों के बिना काम कर रहे हैं। जिन्हें वैध कारणों के बिना नॉमनेट किया गया या जिन्हें हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम 1959 की धारा 43-ए या 45 के तहत काम पर रखा गया था। कार्यपालक अधिकारियों की नियुक्ति नियमावली 2015 की शर्तें लागू हो गईं।
याचिका में सुब्रमण्यम स्वामी बनाम तमिलनाडु सरकार एवं अन्य से संबंधित केस का हवाला देते हुए कहा गया है कि मंदिरों में कुप्रबंधन का समाधान होते ही मंदिर का प्रबंधन संबंधित व्यक्ति को सौंप दिया जाना चाहिए। ऐसा नहीं करने से संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। याचिकाकर्ता ने कहा है कि कार्यकारी अधिकारी मंदिरों के फंड को दूसरे कामों में इस्तेमाल कर रहे हैं। इस फंड को भक्तों द्वारा दिए गए दान से बनाया गया है। इसके साथ ही कार्यकारी अधिकारियों पर पूर्वाग्रह का भी आरोप लगाया गया है। देवता और हिंदू भक्तों के अधिकारों पर सीधा आघात है और अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है।
