नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एएस ओका ने न्यायपालिका में जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि शीर्ष अदालत में भी व्यवस्था मुख्य न्यायाधीश (CJI) केंद्रित है। उन्होंने मामलों की सुनवाई के लिए बेंच आवंटित करने और नई याचिकाओं को सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने की वकालत की। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट की तर्ज पर एक व्यवस्थित रोस्टर प्रणाली लागू होनी चाहिए, ताकि मामलों की लिस्टिंग में किसी भी तरह के मानवीय हस्तक्षेप की गुंजाइश न रहे।
सुप्रीम कोर्ट
मंगलवार को दिल्ली में कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स (CJAR) की ओर से आयोजित कार्यक्रम में जस्टिस ओका ने न्यायाधीशों की जवाबदेही से जुड़े मुद्दों पर अपनी राय रखी। कार्यक्रम का विषय सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की जवाबदेही था।
कॉलेजियम में पारदर्शिता केवल प्रस्ताव सार्वजनिक करने से नहीं आएगी
जस्टिस ओका ने न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए मौजूदा कॉलेजियम व्यवस्था का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि जब तक इससे बेहतर विकल्प सामने नहीं आता, तब तक इस प्रणाली को बदलना उचित नहीं होगा। उनके अनुसार, कॉलेजियम के कामकाज में सामने आने वाली कमियों का मतलब यह नहीं है कि पूरी व्यवस्था ही खराब है।हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि कॉलेजियम के फैसलों और प्रस्तावों को सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर प्रकाशित करना भर पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। असल जरूरत उस प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की है, जिसके तहत नियुक्तियों से जुड़े निर्णय लिए जाते हैं। जस्टिस ओका ने इस बात पर भी चिंता जताई कि कॉलेजियम की ओर से भेजी गई नियुक्तियों की कई सिफारिशें सरकार के पास महीनों तक लंबित रहती हैं। उन्होंने न्यायपालिका और सरकार, दोनों के स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित करने की आवश्यकता बताई।
मामलों की लिस्टिंग में हस्तक्षेप रोकने के लिए रोस्टर सिस्टम जरूरी
जस्टिस ओका ने सुप्रीम कोर्ट में मामलों के आवंटन की मौजूदा व्यवस्था में सुधार की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट की तरह शीर्ष अदालत में भी स्पष्ट और व्यवस्थित रोस्टर प्रणाली होनी चाहिए। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि किस तरह के मामले किस बेंच के सामने जाएंगे और मामलों के आवंटन में मनमाने हस्तक्षेप की संभावना खत्म हो।जस्टिस ओका ने कहा कि अभी एक ही श्रेणी के मामलों को अलग-अलग बेंचों को सौंपे जाने की व्यवस्था से याचिकाकर्ताओं के सामने अनिश्चितता पैदा होती है। उन्हें यह स्पष्ट नहीं रहता कि उनका मामला किस बेंच के सामने सुना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट में मामलों के आवंटन की प्रक्रिया जितनी स्पष्ट और नियमबद्ध होगी, वादियों के प्रति अदालत की जवाबदेही उतनी ही मजबूत होगी।
नई याचिकाओं की सुनवाई के लिए ऑटो-डेटिंग की वकालत
उन्होंने नई याचिकाओं को सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया में भी बदलाव की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि ताजा मामलों की सुनवाई की तारीख अपने आप तय करने की व्यवस्था यानी ऑटो-डेटिंग अपनाई जानी चाहिए। इससे मामलों को सूचीबद्ध करने में मनमानी की आशंका कम होगी और याचिकाकर्ताओं को सुनवाई की तारीख पाने के लिए बार-बार अदालतों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।समयसीमा में सुनवाई के आदेशों पर भी उठाए सवाल
जस्टिस ओका ने अदालतों की ओर से किसी मामले का निपटारा तय समयसीमा में करने के निर्देश देने की प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ऐसे आदेश जारी करते समय संबंधित अदालत में लंबित मामलों की संख्या और न्यायाधीशों पर काम के बोझ का आकलन करना जरूरी है।उनके अनुसार, जब किसी मामले को विशेष समयसीमा में निपटाने का निर्देश दिया जाता है, तो दूसरे मामलों की सुनवाई प्रभावित हो सकती है। इससे ऐसे वादियों के लिए अलग प्राथमिकता बन जाती है, जो ऊपरी अदालतों तक पहुंचने में सक्षम हैं।
उन्होंने इसकी तुलना मंदिरों में आम श्रद्धालुओं और वीआईपी के लिए अलग-अलग कतारों से करते हुए कहा कि ऐसे आदेशों से विशेष पहुंच रखने वाले वादियों के लिए एक अलग कतार तैयार हो जाती है। जस्टिस ओका ने कहा कि मामलों को प्राथमिकता देने के लिए एक तर्कसंगत नीति होनी चाहिए। जमानत याचिकाओं, पुराने आपराधिक मामलों और आम नागरिकों से जुड़े विवादों की अनदेखी करके केवल व्यावसायिक मामलों को प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए।
न्यायाधीशों के फैसलों की आलोचना हो, लेकिन कानूनी आधार पर
न्यायिक जवाबदेही के मुद्दे पर जस्टिस ओका ने कहा कि न्यायाधीशों को बाध्यकारी कानूनी नजीरों का पालन करना चाहिए। उनके फैसलों की कानूनी तर्कों के आधार पर रचनात्मक आलोचना की जा सकती है,लेकिन इसके साथ न्यायाधीशों की मंशा पर सवाल उठाने से बचना चाहिए।
कपिल सिब्बल बोले- न्यायपालिका से जनता का भरोसा घट रहा है
कार्यक्रम में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भी न्यायपालिका के कामकाज और संस्थागत जवाबदेही पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि देश संस्थागत संकट का सामना कर रहा है और न्यायपालिका पर जनता का भरोसा धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है। सिब्बल ने कहा कि राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों को विशेष न्यायाधीशों या बेंचों को सौंपने जैसे प्रशासनिक फैसलों में पारदर्शिता और जवाबदेही होनी चाहिए। उन्होंने जोर दिया कि न्यायिक स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही भी जरूरी है।
इस कार्यक्रम में पूर्व दिल्ली हाईकोर्ट न्यायाधीश जस्टिस रेखा शर्मा, अधिवक्ता प्रशांत भूषण, तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा, सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव और आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा सहित कई अन्य लोग मौजूद थे।
