भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के भीतर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चुनाव आयुक्तों में मतभेद की खबरों ने देश की राजनीति में एक नया भूचाल ला दिया है। एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि पिछले 10 महीनों में चुनाव आयोग के दो आयुक्तों-सुखबीर संधू और विवेक जोशी ने आयोग के फैसलों पर 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं। उन्होंने नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया से लेकर आयोग के कुछ कदमों को 'अनधिकृत' और 'अवैध' तक करार दिया था।
क्या अब कोई वॉचडॉग बचा है-ओवैसी (फाइल फोटो)
इस खबर के सामने आते ही AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सहित पूरे विपक्ष ने केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग पर तीखा हमला बोल दिया। असदुद्दीन ओवैसी ने सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकालते हुए कहा कि एक समय था जब देश की जनता को चुनाव आयोग पर सबसे ज्यादा भरोसा था, लेकिन अब इसमें लगातार गिरावट आई है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब आयोग के बहुमत सदस्यों को ही अपने नाम पर लिए गए फैसलों की खबर नहीं है, तो ऐसे निर्णयों की कानूनी मान्यता क्या रह जाती है? ओवैसी ने आरोप लगाया कि SIR जैसी प्रक्रियाओं ने गरीब जनता को कागजों में उलझाकर उनकी नागरिकता की गरिमा को ठेस पहुंचाई है।
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चुनाव आयोग का बयान
विपक्ष के लगातार बढ़ते हमलों के बीच चुनाव आयोग ने बुधवार को आधिकारिक बयान जारी कर सफाई दी। आयोग ने स्पष्ट किया कि कामकाज के दौरान आंतरिक नोट्स, अलग-अलग राय और तकनीकी सुझाव आना किसी भी संवैधानिक निकाय की सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। ECI का कहना है कि SIR से जुड़े सभी निर्णय सभी चुनाव आयुक्तों की आपसी सहमति से ही लिए गए हैं। आयोग के सभी अंतिम आदेश पूरी तरह कानून के मुताबिक जारी किए जाते हैं और उन्हें पूर्ण कानूनी संरक्षण हासिल है। हालांकि, आयोग के इस स्पष्टीकरण के बावजूद इस मामले पर राजनीतिक घमासान थमने का नाम नहीं ले रहा है।
