दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटाए गए मतदाताओं के नाम दोबारा शामिल कराने की प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। RTI कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज और एक अन्य याचिकाकर्ता ने चुनाव आयोग के खिलाफ पहले से लंबित याचिका में आवेदन दाखिल कर मांग की है कि पहले से मतदाता सूची में दर्ज रहे लोगों के नाम बहाल करने के लिए अलग व्यवस्था बनाई जाए। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, फिलहाल ऐसे मतदाताओं को फॉर्म 6 भरना पड़ रहा है, जिसमें पहली बार मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने की घोषणा करनी होती है।
एसआईआर। तस्वीर-PTI
दिल्ली में 47.56 लाख मतदाताओं के नाम हटाने का दावा
आवेदन के मुताबिक, 31 अगस्त को प्रकाशित दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची से SIR से पहले के कुल मतदाताओं में से 47,56,722 के नाम हटाए गए। यह दिल्ली के कुल मतदाताओं का 32.78 प्रतिशत बताया गया है। इनमें से 31,59,213 मतदाताओं को स्थायी रूप से दूसरी जगह स्थानांतरित यानी ‘परमानेंटली शिफ्टेड’ श्रेणी में रखा गया।याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन मतदाताओं को नाम दोबारा शामिल कराने के लिए फॉर्म 6 जमा करना पड़ता है, जबकि इस फॉर्म में आवेदक को यह घोषणा करनी होती है कि वह पहली बार मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन कर रहा है।
पहले से वोटर रहे लोग पहली बार आवेदन करने की घोषणा कैसे करें?
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी है कि जिन लोगों के नाम पहले मतदाता सूची में शामिल थे, उनसे पहली बार पंजीकरण कराने की घोषणा करवाना उचित नहीं है। आवेदन में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 का हवाला दिया गया है। इसके तहत जानबूझकर झूठी घोषणा करने पर एक साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि पहले से पंजीकृत मतदाता को अपने नाम की बहाली के लिए ऐसी घोषणा करने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए, जो उसकी वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाती। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से ऐसे मतदाताओं के नाम बहाल करने के लिए कानून के अनुरूप अलग प्रक्रिया बनाने का निर्देश देने की मांग की है।
SIR के तहत अतिरिक्त घोषणा को भी चुनौती
आवेदन में चुनाव आयोग के SIR निर्देशों के तहत मांगी गई अतिरिक्त घोषणा पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह घोषणा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत निर्धारित फॉर्म 6 से आगे की अतिरिक्त शर्तें लगाती है। उनके मुताबिक, इस अतिरिक्त घोषणा को न तो आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचित किया गया और न ही संसद के समक्ष रखा गया।याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से इस अतिरिक्त घोषणा को लागू न करने योग्य घोषित करने की मांग की है। साथ ही, उन्होंने कहा है कि केवल यह घोषणा जमा नहीं करने के आधार पर उन दावों को खारिज नहीं किया जाना चाहिए, जो अन्यथा नियमों के तहत विचार योग्य हैं।
फॉर्म 6 और फॉर्म 7 के निपटारे के आंकड़े भी पेश किए
आवेदन में 31 अगस्त से 4 अक्टूबर के बीच के आंकड़ों का भी जिक्र किया गया है। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, इस अवधि में फॉर्म 6 के केवल 569 आवेदनों का निपटारा हुआ, जबकि नाम शामिल करने या हटाने पर आपत्तियों से जुड़े फॉर्म 7 के 3,209 आवेदनों का निपटारा किया गया।
याचिकाकर्ताओं ने इन आंकड़ों के आधार पर नाम बहाली की प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई है। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण पैरवी कर रहे हैं। फिलहाल यह आवेदन सुप्रीम कोर्ट से मतदाता सूची से हटाए गए नामों की बहाली के लिए अलग प्रक्रिया और अतिरिक्त घोषणा से राहत देने की मांग करता है।
