नई दिल्ली: दिल्ली के उप राज्यपाल द्वारा निकल गए नए नोटिफिकेशन के बाद से लगातार छठे दिन भी जिला अदालतों में वकीलों की हड़ताल जारी है। वकीलों के संगठन नए नोटिफिकेशन को आपराधिक कानून की न्याय व्यवस्था के खिलाफ बता रहे हैं तो दूसरी तरफ जिला अदालत में पहुंच रहे हजारों आम आदमी को सिर्फ तारीख पे तारीख ही मिल रही है।
दिल्ली में वकीलों की हड़ताल का सीधा असर आम जनता पर पड़ रहा है।
नई दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट में भी आज बाकी अदालतों की तरह काम ठप है। कोर्ट परिसर के प्रवेश द्वार को बंद रखा गया है जहां पर सैकड़ो की संख्या में अपनी तारीख पर आए आम वकील हैरान परेशान खड़े हुए हैं। वहीं दूसरी तरफ उपराज्यपाल के नोटिफिकेशन के खिलाफ मोर्चा खुले हुए वकीलों का संगठन धरने से लेकर प्रोटेस्ट मार्च निकाल रहा है।
टाइम्स नाउ नवभारत ने नई दिल्ली कोर्ट बार एसोसिएशन के पदाधिकारी से बात की। बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष विकास पाठक ने बताया कि, 'हमारी दिल्ली के सीएम, गृहमंत्री, केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के साथ बैठक हुई। उपराज्यपाल हमारी बात सुनने की जगह हमारे खिलाफ पुलिस की ताकत का इस्तेमाल कर रहे हैं। कल LG हाउस का घेराव करेंगे और हमारी बात नहीं सुनी गई तो दिल्ली भर के सभी वकील इंडिया गेट पर धरने पर बैठेंगे। हाल ही में दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत में 6 पुलिस वालों के खिलाफ कार्रवाई भी जिन्होंने कई लोगों को फर्जी मुकदमे में फसाया था। पुलिस तो चाहती ही नहीं है कि आम आदमी अदालत तक पहुंचे न्याय के लिए।'
वहीं राउज एवेन्यू कोर्ट के वकील और बार के महासचिव विजय बिश्नोई के मुताबिक सरकार का कोई ना कोई प्रतिनिधि हमसे लगातार बातचीत कर रहा है। हम मुख्यमंत्री से भी मिल चुके हैं। इन्हें हम यह समझने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं कि उपराज्यपाल के नए नोटिफिकेशन से आम आदमी का नया व्यवस्था में विश्वास डगमगा जाएगा। अगर जांच अधिकारी थाने में ही बैठकर बयान दर्ज कराएंगे तो न्याय कैसे मिलेगा? जब आम आदमी कहता है कि कोर्ट में देख लेंगे तो यह कोई धमकी नहीं होती बल्कि यह उम्मीद होती की है कि उसे अदालत से न्याय मिलेगा
आम लोगों की व्यथा कौन सुनेगा?
हमने राहुल एवेन्यू कोर्ट के बाहर परेशान खड़े उन आम लोगों से भी बात की जिनको हड़ताल से सबसे ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। ये समाज के उसे वर्ग से आने वाले लोग हैं जिनके लिए अदालतों के बार-बार चक्कर काटने से रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाता है। लिए उन्हीं लोगों की जुबानी पढ़ते हैं कि आखिर तारीख पर तारीख मिलने वाली बात कैसे सच साबित हो जाती है।
1. देवदत्त वकीलों की हड़ताल पर नाराज होते हुए पूछते हैं कि हमारी क्या गलती है? हमारी तो हाजिरी लगने दीजिए। हमें न्याय लेने में बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
2. संदीप जो उत्तम नगर से आए थे उनका केस 3 साल से चल रहा है। बोले जब से हड़ताल चल रही है मैं आता हूं लेकिन यह नहीं पता चला कि अगली तारीख कब है। छुट्टी करके आते हैं हमारा नुकसान होता है।
3. आरके पुरम से आए दिनेश मंडल बोले कि हम दिहाड़ी छोड़कर आए हैं, यहां आने और जाने में भाड़ा लगता है। वकील आज नहीं तो कल कमा लेंगे लेकिन हमारी कमाई का क्या?
4. हरियाणा के महेंद्रगढ़ से आए कर्ण सिंह एक बुजुर्ग मुवक्किल का दर्द छलका और बोले कि जब जज अदालतों में बैठे हैं तो फिर यह हड़ताल किस बात की? हमारा नुकसान क्यों किया जा रहा है? यहां 500 लोग खड़े हैं इन्हें क्यों सजा दी जा रही है?
5. इंद्रपुरी से आए बद्रीनाथ झा ने कहा की यहां तो आम आदमी को सिर्फ तारीख पर तारीख मिल रही है। कोर्ट अगर खुली है तो हमें अंदर जाने की इजाजत क्यों नहीं दी जा रही है?
6. राजस्थान के कोटा से आए एक बुजुर्ग ने अपनी व्यथा बताते हुए कहा कि मेरे यहां आने में ही 2000 रुपए खर्च हो चुके हैं। अगर मेरी पेशी आज नहीं लगी तो मेरा गिरफ्तारी वारंट जारी हो गया तो मुझे जमानत लेनी पड़ेगी।
दिल्ली के LG का विवादित नोटिफिकेशन क्या है?
दिल्ली के उपराज्यपाल ने 13 अगस्त 2025 को एक नोटिफिकेशन जारी किया था। इस नोटिफिकेशन के अनुसार दिल्ली में पुलिस अधिकारियों की गवाही और बयान अब पुलिस थानों में ही दर्ज किए जा सकेंगे। पहले यह प्रक्रिया अदालतों में होती थी। वकीलों का कहना है कि इस बदलाव से पुलिस को अनुचित अधिकार मिलेंगे और न्यायिक प्रणाली पर सीधा असर पड़ेगा।
वकीलों की नोटिफिकेशन को लेकर आपत्ति क्यों?
वकीलों के अनुसार पुलिस थानों में बयान दर्ज कराने से निष्पक्षता की गारंटी खत्म हो जाएगी। गवाह या पीड़ित पर दबाव डालने की संभावना अधिक हो जाएगी और यह प्रक्रिया न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। उनका मानना है कि अदालतें ही ऐसी जगह हैं जहां गवाहों की सुरक्षा और गोपनीयता सुनिश्चित रहती है। इसलिए वकीलों की मुख्य मांग है कि यह नोटिफिकेशन तुरंत रद्द किया जाए और पहले की तरह गवाही केवल अदालत में ही दर्ज की जाए। वहीं पुलिस थाने स्वभाविक रूप से दबाव वाले माहौल माने जाते हैं, ऐसे में गवाही की विश्वसनीयता संदिग्ध हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन और दिल्ली बार काउंसिल ने इस नोटिफिकेशन को अलोकतांत्रिक बताते हुए इसे तुरंत वापस लेने की मांग की है।
