भारतीय ज्ञान-परंपरा की गौरवशाली विरासत और आधुनिक भारत की आकांक्षाओं के अद्भुत संगम का साक्षी बना श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली का द्वितीय दीक्षांत समारोह।
विश्वविद्यालय के विभिन्न पाठ्यक्रमों के 1497 छात्र-छात्राओं को उपाधियां प्रदान की गईं।
मंगलवार को आयोजित इस गरिमामय समारोह में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने संस्कृत को भारत की भाषाई एवं सांस्कृतिक चेतना को एक सूत्र में पिरोने वाली ‘स्वर्णिम डोर’ बताते हुए इसे विश्व के ज्ञान-विमर्श में और अधिक व्यापकता के साथ प्रतिष्ठित करने का आह्वान किया।
केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री श्री सुकान्त मजूमदार विशिष्ट अतिथि के रूप में समारोह में उपस्थित रहे।वैदिक मंत्रोच्चार, सरस्वती वंदना और मंगलाचरण से आरंभ हुए समारोह में विश्वविद्यालय के विभिन्न पाठ्यक्रमों के 1497 छात्र-छात्राओं को उपाधियां प्रदान की गईं। मेधावी विद्यार्थियों को स्वर्ण पदकों से सम्मानित किया गया। दीक्षांत समारोह का वातावरण संस्कृत, भारतीय संस्कृति और युवा उपलब्धियों के गौरव से ओतप्रोत रहा।
समारोह में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन शामिल हुए।
‘संस्कृत’ भारत की विविध भाषाओं के बीच एकता का सांस्कृतिक सेतु
उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने अपने संबोधन में कहा कि भारत की प्रत्येक भाषा अपनी विशिष्ट पहचान, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत के कारण महत्वपूर्ण है, किंतु संस्कृत भारतीय भाषाओं, दर्शन और ज्ञान-परंपरा को जोड़ने वाली स्वर्णिम डोर है।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार डोर अनेक मोतियों को एक माला का स्वरूप प्रदान करती है, उसी प्रकार संस्कृत भारत की विविध भाषाओं और परंपराओं को एक व्यापक सांस्कृतिक चेतना में जोड़ती है।उन्होंने कहा कि संस्कृत को केवल अतीत की भाषा के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
दर्शन, साहित्य, गणित, विज्ञान, ज्योतिष, चिकित्सा और आध्यात्मिक चिंतन सहित अनेक क्षेत्रों में संस्कृत में संचित ज्ञान आज भी मानवता के लिए प्रासंगिक है। आवश्यकता है कि इस ज्ञान-संपदा को आधुनिक अनुसंधान, प्रौद्योगिकी और वैश्विक संवाद से जोड़ा जाए।उन्होंने विश्वविद्यालय से संस्कृत अध्ययन को अंतरराष्ट्रीय आयाम देने का आह्वान करते हुए कहा कि दुनिया के विभिन्न देशों के विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए यहां अध्ययन एवं अनुसंधान के नए अवसर विकसित किए जाने चाहिए।
ए++ उपलब्धि ने बढ़ाई विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा
उपराष्ट्रपति ने विश्वविद्यालय को नैक ए++ ग्रेड प्राप्त होने पर कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक सहित पूरे विश्वविद्यालय परिवार को बधाई दी। उन्होंने कहा कि संस्कृत विद्यापीठ से डीम्ड विश्वविद्यालय और फिर केंद्रीय विश्वविद्यालय तक की यात्रा संस्थान की शैक्षणिक प्रतिबद्धता, निरंतर परिश्रम और सामूहिक संकल्प का परिणाम है। उन्होंने कहा कि अब विश्वविद्यालय को संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय उत्कृष्टता के प्रमुख केंद्र के रूप में अपनी भूमिका और अधिक प्रभावशाली बनानी चाहिए।
उपराष्ट्रपति ने विश्वविद्यालय को नैक ए++ ग्रेड प्राप्त होने विश्वविद्यालय परिवार को बधाई दी।
लाल बहादुर शास्त्री की परिकल्पना को वैश्विक विस्तार देने का संदेश
उपराष्ट्रपति ने विश्वविद्यालय के संस्थापक एवं पूर्व प्रधानमंत्री श्रद्धेय श्री लाल बहादुर शास्त्री की दूरदर्शी सोच का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका स्वप्न था कि विश्व के विभिन्न देशों से लोग भारत आएं और संस्कृत का अध्ययन करें।उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के पास आज उस परिकल्पना को व्यापक वैश्विक स्वरूप देने की पर्याप्त क्षमता है। संस्कृत शिक्षा के साथ भारतीय ज्ञान प्रणाली, शोध और पांडुलिपि संरक्षण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने की दिशा में विश्वविद्यालय को अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए।
पांडुलिपियां केवल विरासत नहीं, भविष्य की ज्ञान-संपदा
उपराष्ट्रपति ने दुर्लभ एवं अप्रकाशित संस्कृत पांडुलिपियों की खोज, संरक्षण, संपादन, वैज्ञानिक अध्ययन और प्रकाशन को विश्वविद्यालयों की प्राथमिक जिम्मेदारियों में शामिल करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि देश और विदेश में सुरक्षित अनेक पांडुलिपियां मानव सभ्यता के लिए अमूल्य ज्ञान का स्रोत हैं।
उन्होंने ‘ज्ञान भारतम् मिशन’का उल्लेख करते हुए कहा कि पांडुलिपियों का संरक्षण अतीत को सुरक्षित रखने भर का कार्य नहीं, बल्कि भविष्य के लिए ज्ञान के नए द्वार खोलने का प्रयास है। उन्होंने विश्वविद्यालय के शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों से इस दिशा में सक्रिय योगदान देने का आह्वान किया।
संस्कृत और आधुनिक तकनीक के समन्वय से खुलेंगे नए अवसर : सुकान्त मजूमदार
केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री श्री सुकान्त मजूमदार ने कहा कि भारत अपनी प्राचीन ज्ञान-परंपरा और आधुनिक प्रौद्योगिकी के समन्वय से विकास की नई इबारत लिख रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने भारतीय भाषाओं और भारतीय ज्ञान प्रणाली को शिक्षा की मुख्यधारा में प्रतिष्ठित कर इस परिवर्तन को गति दी है।उन्होंने कहा कि संस्कृत के विद्यार्थियों को कंप्यूटर, आधुनिक भाषाविज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक जैसे क्षेत्रों से भी परिचित होना चाहिए।
संस्कृत और आधुनिक प्रौद्योगिकी का समन्वय भाषा-प्रौद्योगिकी एवं ज्ञान के नए क्षेत्रों के लिए व्यापक संभावनाएं खोल सकता है।उन्होंने विद्यार्थियों से अपनी सांस्कृतिक जड़ों पर गर्व करते हुए आधुनिक ज्ञान एवं कौशल से स्वयं को सशक्त बनाने और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाने का आह्वान किया।
ज्ञान, संस्कार और कौशल को राष्ट्रसेवा से जोड़ें विद्यार्थी : कुलपति
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने अपने स्वागत उद्बोधन में उपराष्ट्रपति, केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री और सभी विशिष्ट अतिथियों का अभिनंदन किया। उन्होंने विश्वविद्यालय की विकास-यात्रा, शैक्षणिक उपलब्धियों और भविष्य की प्राथमिकताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संस्थान संस्कृत के संरक्षण एवं संवर्धन के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक संदर्भों से जोड़कर शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में नई संभावनाओं का निर्माण कर रहा है।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का लक्ष्य संस्कृत के पारंपरिक अध्ययन तक सीमित नहीं है। भारतीय ज्ञान को समकालीन आवश्यकताओं से जोड़कर राष्ट्रीय एवं वैश्विक ज्ञान-विमर्श में प्रभावशाली स्थान दिलाना विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता है।
कुलपति ने उपाधि प्राप्त विद्यार्थियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि शिक्षा का वास्तविक मूल्य तभी है जब ज्ञान जीवन-मूल्यों, कौशल सेवा और प्रतिभा राष्ट्रहित से जुड़ सके। उन्होंने विद्यार्थियों से अपने ज्ञान और संस्कारों को समाज तथा राष्ट्र के कल्याण का माध्यम बनाने का आह्वान किया।
दीक्षांत उपाधि नहीं, नई जिम्मेदारियों की शुरुआत
उपराष्ट्रपति ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि दीक्षांत शिक्षा की समाप्ति नहीं, बल्कि जीवन की नई यात्रा का शुभारंभ है। उन्होंने विद्यार्थियों से आजीवन सीखते रहने और बदलते समय के अनुरूप अपने ज्ञान एवं कौशल को निरंतर विकसित करने का संदेश दिया।
उन्होंने कहा कि जीवन की कठिन परिस्थितियों में धैर्य, अनुशासन और सकारात्मक दृष्टिकोण ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करते हैं। माता-पिता के त्याग और आचार्यों के मार्गदर्शन को जीवन की अमूल्य पूंजी बताते हुए उन्होंने विद्यार्थियों से राष्ट्र और समाज के प्रति अपने दायित्वों को प्राथमिकता देने का आग्रह किया।
विविधता में एकता का संदेश
उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत की भाषाई, सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता ही उसकी शक्ति है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों में मनाए जाने वाले त्योहारों और परंपराओं के रूप भिन्न हो सकते हैं, लेकिन उनकी मूल भावना भारत की साझा सांस्कृतिक चेतना से जुड़ी है।उन्होंने युवाओं से ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की भावना को मजबूत करने, अपनी मातृभाषा के साथ अन्य भारतीय भाषाओं का सम्मान करने और भारतीय संस्कृति की व्यापकता को समझने का आह्वान किया।
उन्होंने नशीले पदार्थों से दूर रहने, स्वस्थ एवं अनुशासित जीवन अपनाने, खेल एवं रचनात्मक गतिविधियों से जुड़ने तथा सोशल मीडिया का संयमित एवं विवेकपूर्ण उपयोग करने की भी सलाह दी।
तीन महत्वपूर्ण ग्रंथों का विमोचन
समारोह में ‘शोध प्रभा’, ‘आम्नाय कल्पतरु’ एवं ‘विद्यामृतम् ग्रंथ’ का विमोचन उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन के हाथों किया गया। ये प्रकाशन विश्वविद्यालय की शोधपरक एवं अकादमिक गतिविधियों को रेखांकित करने वाले महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में सामने आए।
विद्यार्थियों के चेहरों पर दिखा उपलब्धि का उल्लास
1497 विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान किए जाने के साथ ही समारोह का वातावरण उल्लास और गौरव से भर उठा। उपाधि एवं स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के चेहरों पर उपलब्धि की चमक और भविष्य के प्रति उत्साह स्पष्ट दिखाई दिया।
अभिभावकों के लिए भी यह अवसर गर्व और भावनात्मक संतोष से भरा रहा।समारोह में विश्वविद्यालय कोर्ट के सदस्य, कार्यपरिषद के सदस्य, कुलसचिव प्रोफेसर पवन कुमार शर्मा, वित्त अधिकारी श्री संतोष कुमार श्रीवास्तव, समस्त पीठ प्रमुख, विभागाध्यक्ष, समस्त संकाय सदस्य, गैर-शैक्षणिक सदस्य, अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।
दीक्षांत समारोह ने विद्यार्थियों को उपाधियों के साथ एक व्यापक दायित्व-बोध भी प्रदान किया। अपनी शिक्षा को जीवन-मूल्यों से जोड़ने, भारतीय ज्ञान-परंपरा को आगे बढ़ाने और राष्ट्र की प्रगति में अपनी प्रतिभा का सार्थक योगदान देने का।राष्ट्रगान के साथ विश्वविद्यालय के द्वितीय दीक्षांत समारोह का गरिमापूर्ण समापन हुआ।
