बिहार की राजनीति में अनंत सिंह का नाम आते ही मोकामा, दबदबे की राजनीति और उनसे जुड़े विवादों से जुड़ी कहानियां चर्चा में आ जाती हैं। कभी लालू प्रसाद यादव का घोड़ा खरीदने के कारण सुर्खियों में आए अनंत सिंह ने घोड़ा-बग्घी से विधानसभा पहुंचकर भी लोगों का ध्यान खींचा था। अब जनता दल यूनाइटेड ने उन्हें और उनकी पत्नी नीलम देवी को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया है। पार्टी ने अनंत सिंह पर पार्टी विरोधी गतिविधियों और नेतृत्व के निर्देशों की अनदेखी करने का आरोप लगाया है। आइए जानते हैं, ‘छोटे सरकार’ के नाम से चर्चित अनंत सिंह की सियासत, उनके अनोखे शौक और विवादों की पूरी कहानी।
कौन हैं अनंत सिंह, जिन्हें कहा जाता है ‘छोटे सरकार’?
अनंत सिंह का जन्म पटना जिले के मोकामा-बाढ़ इलाके के नदवां गांव में हुआ। उनका नाम लंबे समय से मोकामा की राजनीति और बाहुबली छवि के साथ जुड़ा रहा है। स्थानीय स्तर पर उन्हें ‘छोटे सरकार’ के नाम से भी जाना जाता है। अनंत सिंह की राजनीतिक पृष्ठभूमि उनके परिवार से भी जुड़ी है। उनके भाई दिलीप सिंह मोकामा से विधायक थे और 1990 से 1995 के बीच जनता दल के टिकट पर विधानसभा पहुंचे थे। परिवार की इसी राजनीतिक जमीन ने अनंत सिंह के लिए इलाके में अपनी पहचान बनाने का रास्ता तैयार किया।anant singh news
उनके समर्थक उन्हें ऐसा नेता बताते रहे हैं जो स्थानीय लोगों के बीच पहुंच रखते हैं और जरूरत के समय मदद करते हैं। वहीं, उनके विरोधी उनकी राजनीति को दबदबे और बाहुबली संस्कृति से जोड़कर देखते हैं। यही दोहरी छवि अनंत सिंह की राजनीति की एक बड़ी पहचान रही है।
2005 में जेडीयू से चुनावी राजनीति की शुरुआत
अनंत सिंह ने 2005 में पहली बार जनता दल यूनाइटेड के टिकट पर मोकामा विधानसभा सीट से जीत दर्ज की थी। इसके बाद साल 2010 में भी उन्होंने इसी पार्टी के टिकट पर जीत हासिल की। इस दौरान वह नीतीश कुमार की राजनीति और जेडीयू के साथ जुड़े रहे। हालांकि,2015 में जेडीयू से उनका रिश्ता टूट गया। पार्टी से अलग होने के बाद उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। यह उनके राजनीतिक प्रभाव का बड़ा उदाहरण था,क्योंकि पार्टी का चुनाव चिह्न नहीं होने के बावजूद वह अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे। फिर साल 2020 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल ने उन्हें अपने टिकट पर चुनावी मैदान में उतारा, जहां अनंत सिंह ने मोकामा से जीत दर्ज की। इस तरह उनकी राजनीतिक यात्रा जेडीयू से निर्दलीय और फिर आरजेडी तक पहुंची।
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आपराधिक मामलों ने बार-बार बढ़ाई मुश्किलें
अनंत सिंह की राजनीतिक यात्रा के साथ आपराधिक मामलों का विवाद भी जुड़ा रहा है। अगस्त 2019 में उनके नदवां स्थित आवास पर पुलिस की तलाशी के दौरान एके-47 राइफल, ग्रेनेड और अन्य हथियार मिलने का मामला सामने आया था। इसके बाद उनके खिलाफ आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज हुआ और उन्होंने दिल्ली की अदालत में आत्मसमर्पण किया। 2022 में इस मामले में अदालत ने उन्हें 10 साल की सजा सुनाई। इसके बाद उनकी विधानसभा सदस्यता चली गई। उनकी पत्नी नीलम देवी ने उपचुनाव में आरजेडी के टिकट पर जीत हासिल की और मोकामा सीट पर परिवार का राजनीतिक प्रभाव बनाए रखा। बाद में पटना हाईकोर्ट से इस मामले में अनंत सिंह को राहत मिली और उपलब्ध विवरण के मुताबिक, 2024 में उन्हें संबंधित आर्म्स एक्ट मामले में बरी कर दिया गया। इस घटनाक्रम ने उनकी राजनीतिक वापसी का रास्ता खोला।
2025 में गोलीबारी की घटना और फिर सुर्खियों में आए अनंत सिंह
जनवरी 2025 में विधानसभा चुनाव के दौरान मोकामा क्षेत्र के नौरंगा-जालालपुर गांव में अनंत सिंह और सोनू-मोनू गिरोह से जुड़े विवाद के दौरान गोलीबारी की घटना सामने आई। इस घटना में दोनों पक्षों के बीच तनाव बढ़ने और कई राउंड गोलियां चलने की खबरें आईं। मामले में हत्या के प्रयास समेत गंभीर आरोपों के तहत कार्रवाई हुई।
अनंत सिंह ने इस प्रकरण में आत्मसमर्पण किया। बाद में उन्हें जमानत मिली और रिहाई के बाद उनके समर्थकों ने रोड शो भी किया। इस घटना ने एक बार फिर मोकामा की राजनीति में हथियारों, स्थानीय वर्चस्व और आपसी टकराव के सवालों को चर्चा में ला दिया।
नीतीश कुमार से फिर नजदीकी, लेकिन अब जेडीयू से निष्कासन
2025 के विधानसभा चुनाव में अनंत सिंह एक बार फिर जेडीयू के टिकट पर मोकामा से मैदान में उतरे और जीत हासिल की। इस तरह वह उस पार्टी में लौटे,जिसके साथ उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी। लेकिन अब पार्टी के साथ उनका टकराव सामने आया है। जेडीयू ने 24 अक्टूबर 2026 को अनंत सिंह और उनकी पत्नी नीलम देवी को छह साल के लिए निष्कासित करने की घोषणा की।पार्टी का आरोप है कि अनंत सिंह ने पार्टी नेतृत्व के निर्देशों की अनदेखी करते हुए एमएलसी चुनाव में दूसरी पार्टी के उम्मीदवार जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार अनुज सिंह का न सिर्फ समर्थन किया, बल्कि प्रचार भी किया। साथ ही कई बार पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया। चुनाव प्रचार के दौरान अनंत सिंह ने जेडीयू के विधान परिषद सदस्य प्रत्याशी नीरज कुमार को न सिर्फ हराने की बात कही, बल्कि उनके खिलाफ दूसरी पार्टी के उम्मीदवार का समर्थन भी किया। जिसके बाद पार्टी ने उनके खिलाफ ये कार्रवाई की। साथ ही साथ जेडीयू ने विधानसभा अध्यक्ष से अनंत सिंह की सदस्यता समाप्त करने की सिफारिश भी की है।
अनंत सिंह को जेडीयू ने पार्टी से निकाला।
2015 से चली आ रही है नीरज कुमार से प्रतिद्वंद्विता
बता दें कि जिन नीरज कुमार को लेकर अनंत सिंह विवाद 2015 के मोकामा विधानसभा चुनाव से शुरू हुआ था,जब अनंत सिंह ने एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और तत्कालीन जेडीयू उम्मीदवार नीरज कुमार को हराया था। तब से उनके बीच मतभेद बार-बार सामने आते रहे हैं। खबरों के मुताबिक,पार्टी नेताओं ने परिषद चुनावों से पहले सुलह कराने की कोशिश की,लेकिन प्रयास विफल रहे।
जब मर्सिडीज छोड़ घोड़ा-बग्घी से विधानसभा पहुंचे
अनंत सिंह को घोड़ों से खास लगाव रहा है। उनके शौक का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दिसंबर 2013 में वह बिहार विधानसभा के सत्र में घोड़ा-बग्घी से पहुंचे थे। उस समय उनका यह अंदाज काफी चर्चा में रहा था। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इससे पहले अनंत सिंह अपनी मर्सिडीज कार को लेकर भी सुर्खियों में रहे थे। बाद में घोड़ा-बग्घी से विधानसभा पहुंचने का उनका फैसला लोगों के लिए कौतूहल का विषय बन गया। उनकी बग्घी में लाइट और म्यूजिक सिस्टम भी लगाया गया था। उनके करीबी लोगों ने बताया था कि उन्हें घोड़ों की सवारी और बग्घी से घूमना पसंद था।
अनंत सिंह
क्या है अनंत सिंह की ताकत का राज?
अनंत सिंह की राजनीति को समझने के लिए मोकामा के स्थानीय समीकरणों को देखना जरूरी है। उनके परिवार की पुरानी राजनीतिक मौजूदगी, क्षेत्र में व्यक्तिगत संपर्क, समर्थकों का नेटवर्क और उनकी दबंग छवि ने उन्हें चुनावी राजनीति में अलग पहचान दी। उनके समर्थक उन्हें स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली नेता मानते हैं, जबकि आलोचक उनकी राजनीति को बाहुबल और विवादों से जोड़ते हैं। चुनावों में उनकी जीत यह दिखाती रही है कि मोकामा में उनका व्यक्तिगत प्रभाव कई बार पार्टी की पहचान से भी अधिक महत्वपूर्ण साबित हुआ।
