Women Resrvation Bill: आगामी चुनावों से पहले केंद्र सरकार महिला आरक्षण कानून में संशोधन को तेजी से आगे बढ़ाने की तैयारी में है। सरकार का लक्ष्य इस कानून के लागू होने को 2027–28 में प्रस्तावित परिसीमन (डिलिमिटेशन) प्रक्रिया से अलग करना है। सूत्रों के मुताबिक, सरकार मौजूदा बजट सत्र को 2 अप्रैल के बाद भी बढ़ा सकती है ताकि इस अहम विधेयक को प्राथमिकता दी जा सके।
महिला आरक्षण विधेयक।
दो दिन का विशेष सत्र संभव
उच्चस्तरीय बैठकों—जिनमें गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता वाली बैठकें भी शामिल हैं—के बाद सरकार अगले दो हफ्तों में दो दिन का विशेष सत्र बुलाने पर विचार कर रही है। इस सत्र में महिला आरक्षण को लागू करने के लिए आवश्यक संवैधानिक संशोधन पर चर्चा और उसे पारित करने की योजना है। सूत्रों का कहना है कि 2 अप्रैल तक सभी प्रक्रियाएं पूरी करना संभव नहीं है, क्योंकि कई तकनीकी और संरचनात्मक मुद्दों पर स्पष्टता जरूरी है।
प्रस्तावित ढांचे की मुख्य बातें
सरकार जिन अहम बदलावों पर विचार कर रही है, उनमें शामिल हैं:
•सीटों में बढ़ोतरी, राज्यों को नुकसान नहीं:
लोकसभा सीटों में 50% तक वृद्धि का प्रस्ताव, ताकि किसी राज्य की मौजूदा सीटें कम न हों।
•रोटेशन सिस्टम:
महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें तीन चुनावों तक स्थिर रहेंगी, उसके बाद रोटेशन लागू होगा।
•कोटा में कोटा:
एससी/एसटी आरक्षित सीटों में भी 33% महिला आरक्षण लागू किया जाएगा।
•जनगणना आधार:
सीटों का आवंटन 2011 की जनगणना के आधार पर किया जाएगा, ताकि देरी से बचा जा सके।
जल्दबाजी क्यों?
सरकारी सूत्रों के अनुसार, पूरी प्रक्रिया में कम से कम दो साल लग सकते हैं। अगर इसे अगली जनगणना से जोड़ा गया, तो 2029 लोकसभा चुनाव तक भी लागू होना मुश्किल हो सकता है। इसलिए 2011 की जनगणना को आधार बनाकर इसे समय पर लागू करने की रणनीति बनाई जा रही है।
राजनीतिक गणित भी अहम
संवैधानिक संशोधन के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होगा, ऐसे में सरकार विपक्षी दलों से भी समर्थन जुटाने की कोशिश में है। सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस के साथ अनौपचारिक बातचीत शुरू हो चुकी है, हालांकि समर्थन को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। वहीं तृणमूल कांग्रेस ने भी अपना रुख साफ नहीं किया है। ओबीसी कोटे की मांग एक बड़ा मुद्दा बन सकती है, लेकिन सरकार फिलहाल इसे शामिल करने के पक्ष में नहीं दिख रही है।
बड़े राज्यों को फायदा
लोकसभा सीटों में प्रस्तावित बढ़ोतरी से बड़े राज्यों को ज्यादा फायदा मिल सकता है:
•उत्तर प्रदेश: 80 → 120
•महाराष्ट्र: 48 → 72
•पश्चिम बंगाल: 42 → 63
•बिहार: 40 → 60
•तमिलनाडु: 39 → 59
इसके अलावा मध्य प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, गुजरात और आंध्र प्रदेश में भी सीटें बढ़ेंगी।
नॉर्थ–साउथ बहस फिर तेज
सीटों की कुल हिस्सेदारी में बदलाव नहीं होगा, लेकिन आबादी के आधार पर उत्तरी राज्यों में सीटों की संख्या ज्यादा बढ़ेगी, जिससे दक्षिणी राज्यों में प्रतिनिधित्व को लेकर बहस फिर तेज हो सकती है।
चुनाव से पहले रणनीतिक कदम
इस पूरे कदम को पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के आगामी विधानसभा चुनावों से जोड़कर देखा जा रहा है, जहां महिला सशक्तिकरण एक बड़ा मुद्दा बन सकता है।
अगर यह योजना सफल होती है, तो चुनावी मैदान में बीजेपी को बड़ा राजनीतिक फायदा मिल सकता है।
